जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में
- दिवाकर राही
आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़'
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए
- फ़िराक़ गोरखपुरी
दिल थामता कि चश्म पर करता तेरी निगाह,
सागर को देखता कि मैं शीशा संभालता।
- हकीम सनाउल्लाह फिराक़
मुस्कराते हुए यूं आए वो मयख़ाने में,
रुक गयी सांस छलकते हुए पैमानों की।
- जोश मलीहाबादी
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