Thursday, May 7, 2020

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में

अब तो उतनी भी मयस्सर नहीं मय-ख़ाने में 
जितनी हम छोड़ दिया करते थे पैमाने में 
- दिवाकर राही

आए थे हँसते खेलते मय-ख़ाने में 'फ़िराक़' 
जब पी चुके शराब तो संजीदा हो गए 
- फ़िराक़ गोरखपुरी
दिल थामता कि चश्म पर करता तेरी निगाह,
सागर को देखता कि मैं शीशा संभालता। 
- हकीम सनाउल्लाह फिराक़
मुस्कराते हुए यूं आए वो मयख़ाने में,
रुक गयी सांस छलकते हुए पैमानों की। 
- जोश मलीहाबादी 

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