उस के होंटों पे रख के होंट अपने
बात ही हम तमाम कर रहे हैं
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
उस के होंटों पे रख के होंट अपने
बात ही हम तमाम कर रहे हैं
तुम्हें जफ़ा से न यूँ बाज़ आना चाहिए था,
अभी कुछ और मिरा दिल दुखाना चाहिए था.
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मैं कब से अपनी तलाश में हूँ मिला नहीं हूँ
सवाल ये है कि मैं कहीं हूँ भी या नहीं हूँ
ये मेरे होने से और न होने से मुन्कशिफ़ है
कि रज़्म-ए-हस्ती में क्या हूँ मैं और क्या नहीं हूँ
मैं शब निज़ादों में सुब्ह-ए-फ़र्दा की आरज़ू हूँ
मैं अपने इम्काँ में रौशनी हूँ सबा नहीं हूँ
गुलाब की तरह इश्क़ मेरा महक रहा है
मगर अभी उस की किश्त-ए-दिल में खिला नहीं हूँ
न जाने कितने ख़ुदाओं के दरमियाँ हूँ लेकिन
अभी मैं अपने ही हाल में हूँ ख़ुदा नहीं हूँ
कभी तो इक़बाल-मंद होगी मिरी मोहब्बत
नहीं है इम्काँ कोई मगर मानता नहीं हूँ
हवाओं की दस्तरस में कब हूँ जो बुझ रहूँगा
मैं इस्तिआरा हूँ रौशनी का दिया नहीं हूँ
मैं अपनी ही आरज़ू की चश्म-ए-मलाल में हूँ
खुला है दर ख़्वाब का मगर देखता नहीं हूँ
उधर तसलसुल से शब की यलग़ार है इधर मैं
बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ
बहुत ज़रूरी है अहद-ए-नौ को जवाब देना
सो तीखे लहजे में बोलता हूँ ख़फ़ा नहीं हूँ
वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है,
मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है।
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दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे।
जो रंज की घडी भी ख़ुशी से गुजार दे।
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मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है।
मेरी जां दिल से चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है।
दया कर दान विद्या का,
हमें परमात्मा देना,दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्यपूर्वक सब सहो।
होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।
- मैथिलीशरण गुप्त
इतनी अदाएं कम थीं जो एक और शामिल है,
कातिल सूरत पहले ही थी अब तो तेरी नजर भी कातिल है.
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कातिल सूरत पहले ही थी, अब तो कयामत ढा रही है,
तेरी सादगी भी अब, दिल पर खंजर चला रही है।मलाल नहीं दर्द की इन्तेहाँ से ,
दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी ...
हम ने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं
तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया
आसी राम नगरी
गहरे समंदरों की भला क्या खबर उन्हें..
आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी ।।
पन्नों की तरह दिन बदलते जा रहे हैं,
खबर नहीं है कि आ रहे हैं या जा रहे हैं ।
बहुत कुछ सिखाया जिंदगी ने अनजाने में,
किताबों में नहीं था वो सबक सिखाया ज़माने ने।