Tuesday, April 14, 2026

THE MEAL PRAYER

अन्नपूर्णे सदापूर्णे शङ्करप्राणवल्लभे ।

ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं भिक्षां देहि च पार्वति ॥

Annapūrṇe sadāpūrṇe śaṅkaraprāṇavallabhe |
jñānavairāgyasidhyarthaṃ bhikṣāṃ dehi ca pārvati ||

"हे माता अन्नपूर्णा! आप सदा पूर्ण हैं और भगवान शिव की प्राणप्रिय हैं। हे माता पार्वती! मुझे ज्ञान (आध्यात्मिक बोध) और वैराग्य (सांसारिक मोह से मुक्ति) की सिद्धि के लिए भिक्षा प्रदान करें।"

"O Annapoorna, who is always full (of nourishment) and is the beloved life-breath of Lord Shankara; O Parvati, grant me the alms of wisdom and renunciation so that I may attain perfection."

ॐ ब्रह्मार्पणं ब्रह्म हविर्ब्रह्माग्नौ ब्रह्मणा हुतम्।

ब्रह्मैव तेन गन्तव्यं ब्रह्मकर्मसमाधिना॥ (Bhagavad Gita 4.24)


Brahmārpaṇam brahma haviḥ brahmāgnau brahmaṇā hutam. Brahmāiva tena gantavyaṁ brahmakarmasamādhinā.

'Brahman is the offering, Brahman is the oblation poured out by Brahman into the fire of Brahman, Brahman is to be attained by him who always sees Brahman in action.'



THE MEAL PRAYER: “ANNA POORNE”

OM Annapoorne Sadhaapoorne
Shankara Praana Vallabhe
Jnaana Vairaagya Siddhyartham
Bhikshaam Dhehee Cha Paarvati

Mathaa Cha Paarvathee Devee
Pithaa Devo Maheshwaraha
Baandhavaah Siva Bhaktaaha
Swadeso Bhuvana Trayam
Hari Om Tat Sat Brahmaarpanamastu
Lokaa Samastaah Sukhino Bhavantu

OM Beloved Mother Nature,
You are here on our table as our food.
You are endlessly bountiful,  benefactress of all.
Please grant us health and strength, wisdom and dispassion,
to find permanent Peace and Joy, and to share this Peace and Joy
with one and all.

Mother Nature is my mother,
My father is the Lord of All,
The whole creation is my family.
The entire universe is my home.
I offer this unto OM, that Truth which is universal.
May the entire universe be filled with peace and joy, love and light.

Jai Sree Sadguru Mahaaraaj Ki Jai!
May the Light of Truth overcome all darkness. Victory to that Light!

Thursday, April 2, 2026

बिछड़कर मुझे तुम मुद्दत हुई

बिछड़कर मुझे तुम मुद्दत हुई है।

तुम्हें क्या ख़बर कैसी हालात हुई है।

मुझे शायरी की जो चाहत हुई है।

ज़माने को क्यूं इस पे हैरत हुई है।

कहां तुमको मिलने की फुर्सत हुई है।

जो यादों में अब इतनी शिद्दत हुई है ।

जो बेचैनियों में भी आराम पाया,

वो कब ख्वाबे-गफलत से राहत हुई है।

तुम्हारा ही इक नाम है मेरे दिल में,

तुम्हें याद करने की आदत हुई है।

Tuesday, March 31, 2026

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

 

*

दोस्त बन कर भी नहीं साथ निभाने वाला

वही अंदाज़ है ज़ालिम का ज़माने वाला

 

अब उसे लोग समझते हैं गिरफ़्तार मिरा

सख़्त नादिम है मुझे दाम में लाने वाला

 

सुब्ह-दम छोड़ गया निकहत--गुल की सूरत

रात को ग़ुंचा--दिल में सिमट आने वाला

 

क्या कहें कितने मरासिम थे हमारे उस से

वो जो इक शख़्स है मुँह फेर के जाने वाला

 

तेरे होते हुए जाती थी सारी दुनिया

आज तन्हा हूँ तो कोई नहीं आने वाला

 

मुंतज़िर किस का हूँ टूटी हुई दहलीज़ पे मैं

कौन आएगा यहाँ कौन है आने वाला

 

क्या ख़बर थी जो मिरी जाँ में घुला है इतना

है वही मुझ को सर--दार भी लाने वाला

 

मैं ने देखा है बहारों में चमन को जलते

है कोई ख़्वाब की ताबीर बताने वाला

 

तुम तकल्लुफ़ को भी इख़्लास समझते हो 'फ़राज़'

दोस्त होता नहीं हर हाथ मिलाने वाला

-अहमद फ़राज़

*

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

 

कैफ़ी आज़मी

*

मिरी ज़िंदगी पे मुस्कुरा मुझे ज़िंदगी का अलम नहीं

जिसे तेरे ग़म से हो वास्ता वो ख़िज़ाँ बहार से कम नहीं

 

शकील बदायूनी

*

मेरी आँखों में हैं आँसू तेरे दामन में बहार

गुल बना सकता है तू शबनम बना सकता हूँ मैं

 

नुशूर वाहिदी

*

शग़ुफ़्तगी--दिल--कारवाँ को क्या समझे

वो इक निगाह जो उलझी हुई बहार में है

 

शकील बदायूनी

*

जब से छूटा है गुलिस्ताँ हम से

रोज़ सुनते हैं बहार आई है

 

जलील मानिकपूरी

*

ग़ुरूर से जो ज़मीं पर क़दम नहीं रखती

ये किस गली से नसीम--बहार आती है

 

जलील मानिकपूरी

 

*

तिनकों से खेलते ही रहे आशियाँ में हम

आया भी और गया भी ज़माना बहार का

 

फ़ानी बदायुनी


अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी न सकूँ

 


अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी सकूँ

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी सकूँ

*

तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पे वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो

*

ये सहारा जो नहीं हो तो परेशां हो जायें

मुश्किलें जान ही ले लें अगर आसां हो जायें..

*

ये जो कुछ लोग फरिश्तों से बने फिरते हैं

मेरे हथ्ते कभी चढ़ जायें तो इनसां हो जायें...

-राहत इंदौरी

**

अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को

मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं

आसी उल्दनी

*

जितने अपने थेसब पराये थे,
हम हवा को गले लगाए थे.

जितनी कसमे थीसब थी शर्मिंदा,
जितने वादे थे
सर झुकाये थे.

जितने आंसू थेसब थे बेगाने,
जितने मेहमां थे
बिन बुलाए थे.

सब किताबें पढ़ी-पढ़ाई थीं,
सारे किस्से सुने-सुनाए थे.


एक बंजर जमीं के सीने में,
मैने कुछ आसमां उगाए थे.

सिर्फ दो घूंट प्यास कि खातिर,
उम्र भर धूप मे नहाए थे.

हाशिए पर खड़े हूए है हम,
हमने खुद हाशिए बनाए थे.

मैं अकेला उदास बैठा था,
सामने कहकहे लगाए थे.

है गलत उसको बेवफा कहना,
हम कौन सा धुले-धुलाए थे.

आज कांटो भरा मुकद्दर है,
हमने गुल भी बहुत खिलाए थे.
डॉ राहत इंदौरी

*

जितने अपने थे, सब पराये थे,

हम हवा को गले लगाये थे,

है तेरा कर्ज मेरी आँखों पर,

तूने सपने बहुत दिखाए थे। 

*

अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो, जान थोड़ी है 
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है 

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में 
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है 

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन 
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है 

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है 
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है 

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है 

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

 

*

सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए

-राहत इंदौरी

 

Sunday, February 22, 2026

Divine

सब कुछ सुनना कुछ ना कहना 

कितना मुश्किल है।

तुमसे बिछड़ के जिंदा रहना 

आदतन कितना मुश्किल है।।


एक आदत सी बन गई है तू,

और आदत कभी नहीं जाती!

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वो चेहरा ख़ूबसूरत है वो आँखें बात करती हैं

जब उतरे चाँद आँगन में तो रातें बात करती हैं .

मिरी आँखों से नींदें ले के तुम ने रतजगे बख़्शे 

मिरे तकिए मिरे बिस्तर से रातें बात करती हैं.


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दिल में तू आया है तेरे कदमों की आहट से जान लेते हैं

तुझे ए गुलबदन हम तेरी खुशबू से पहचान लेते हैं


तू जो कहे दिन है तो दिन है तू जो कहे रात है तो रात है

तुझ में कुछ तो बात है जो हम तेरा हर कहा मान लेते हैं


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घीरे से तुम्हें मुस्कुराते देखा है,

दिल से तुम्हे अपना कर देखा है.

जिंदगी खिलखिलाने लगती है मेरे,

कुछ लम्हें तुम्हारे साथ बिता कर देखा है.


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तुम रोको न अपने दीवाने को,

दिल तड़प रहा कुछ सुनाने को,

बीते कुछ ख़ास लम्हों को गुनगुनाने को,

कुछ याद आने को कुछ याद दिलाने को.


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I asked the stars for signs of something Divine.

Every wish I whispered softly felt suddenly mine.

Hope cracked the dark wide open, taught my fears to shine.

We munched our meal with laughter, chose love as we dine.

Gathering to dine beneath the clock at nine.

We'd feast on dreams where moments taste so fine.

In wee hours, my heart became a small shrine.

Each memory climbed slowly up the fragile spine.

My pulse betrayed me, spelled out pure andreline.

And still moments spent escapes every wall meant to confine!

#Mumbai #Khargar #MarineDrive #Vikhroli #Jogeshwari #CST #DivineLove


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*काश फिर मिलने की वजह मिल जाए!*

*साथ जितना भी बिताया वो पल मिल जाए!*

*चलो अपनी अपनी आँखें बंद कर लें!*

*क्या पता ख़्वाबों में गुज़रा हुआ कल मिल जाए!*



Sunday, February 8, 2026

उस के होंटों पे रख के होंट अपने

उस के होंटों पे रख के होंट अपने

बात ही हम तमाम कर रहे हैं

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मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को

--

तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो

मैं तुम्हारे ही दम से ज़िंदा हूँ
मर ही जाऊँ जो तुम से फ़ुर्सत हो

तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और उतनी ही बे-मुरव्वत हो

तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
या'नी ऐसा है जैसे फ़ुर्क़त हो

तुम हो अंगड़ाई रंग-ओ-निकहत की
कैसे अंगड़ाई से शिकायत हो

किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मिरी ज़िंदगी की आदत हो

किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो

दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मिरी आख़री मोहब्बत हो


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हाल ये है कि ख़्वाहिश-ए-पुर्सिश-ए-हाल भी नहीं
उस का ख़याल भी नहीं अपना ख़याल भी नहीं

ऐ शजर-ए-हयात-ए-शौक़ ऐसी ख़िज़ाँ-रसीदगी
पोशिश-ए-बर्ग-ओ-गुल तो क्या जिस्म पे छाल भी नहीं

मुझ में वो शख़्स हो चुका जिस का कोई हिसाब था
सूद है क्या ज़ियाँ है क्या इस का सवाल भी नहीं

मस्त हैं अपने हाल में दिल-ज़दगान-ओ-दिलबराँ
सुल्ह-ओ-सलाम तो कुजा बहस-ओ-जिदाल भी नहीं

तू मिरा हौसला तो देख दाद तो दे कि अब मुझे
शौक़-ए-कमाल भी नहीं ख़ौफ़-ए-ज़वाल भी नहीं

ख़ेमा-गाह-ए-निगाह को लूट लिया गया है क्या
आज उफ़ुक़ के दोष पर गर्द की शाल भी नहीं

उफ़ ये फ़ज़ा-ए-एहतियात ता कहीं उड़ न जाएँ हम
बाद-ए-जुनूब भी नहीं बाद-ए-शिमाल भी नहीं

वजह-ए-म'आश-ए-बे-दिलाँ यास है अब मगर कहाँ
उस के वरूद का गुमाँ फ़र्ज़-ए-मुहाल भी नहीं

ग़ारत-ए-रोज़-ओ-शब तो देख वक़्त का ये ग़ज़ब तो देख
कल तो निढाल भी था मैं आज निढाल भी नहीं

मेरे ज़मान-ओ-ज़ात का है ये मु'आमला कि अब
सुब्ह-ए-फ़िराक़ भी नहीं शाम-ए-विसाल भी नहीं

पहले हमारे ज़ेहन में हुस्न की इक मिसाल थी
अब तो हमारे ज़ेहन में कोई मिसाल भी नहीं

मैं भी बहुत 'अजीब हूँ इतना 'अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

--

सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं

दिल-ए-बर्बाद ये ख़याल रहे
उस ने गेसू नहीं सँवारे हैं

उन रफ़ीक़ों से शर्म आती है
जो मिरा साथ दे के हारे हैं

और तो हम ने क्या किया अब तक
ये किया है कि दिन गुज़ारे हैं

उस गली से जो हो के आए हों
अब तो वो राह-रौ भी प्यारे हैं

'जौन' हम ज़िंदगी की राहों में
अपनी तन्हा-रवी के मारे हैं

--

कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे

शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं
मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे

वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे

उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा
यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे

यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे

मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे
या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

--

तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारे बा'द भला क्या हैं वअदा-ओ-पैमाँ
बस अपना वक़्त गँवा लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारे हिज्र की शब-हा-ए-कार में जानाँ
कोई चराग़ जला लूँ अगर इजाज़त हो

जुनूँ वही है वही मैं मगर है शहर नया
यहाँ भी शोर मचा लूँ अगर इजाज़त हो

किसे है ख़्वाहिश-ए-मरहम-गरी मगर फिर भी
मैं अपने ज़ख़्म दिखा लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी
कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो


--

जौन एलिया



अभी कुछ और मिरा दिल दुखाना चाहिए था

तुम्हें जफ़ा से न यूँ बाज़ आना चाहिए था,

अभी कुछ और मिरा दिल दुखाना चाहिए था.

--

मैं कब से अपनी तलाश में हूँ मिला नहीं हूँ

सवाल ये है कि मैं कहीं हूँ भी या नहीं हूँ


ये मेरे होने से और न होने से मुन्कशिफ़ है

कि रज़्म-ए-हस्ती में क्या हूँ मैं और क्या नहीं हूँ


मैं शब निज़ादों में सुब्ह-ए-फ़र्दा की आरज़ू हूँ

मैं अपने इम्काँ में रौशनी हूँ सबा नहीं हूँ


गुलाब की तरह इश्क़ मेरा महक रहा है

मगर अभी उस की किश्त-ए-दिल में खिला नहीं हूँ


न जाने कितने ख़ुदाओं के दरमियाँ हूँ लेकिन

अभी मैं अपने ही हाल में हूँ ख़ुदा नहीं हूँ


कभी तो इक़बाल-मंद होगी मिरी मोहब्बत

नहीं है इम्काँ कोई मगर मानता नहीं हूँ


हवाओं की दस्तरस में कब हूँ जो बुझ रहूँगा

मैं इस्तिआरा हूँ रौशनी का दिया नहीं हूँ


मैं अपनी ही आरज़ू की चश्म-ए-मलाल में हूँ

खुला है दर ख़्वाब का मगर देखता नहीं हूँ


उधर तसलसुल से शब की यलग़ार है इधर मैं

बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ


बहुत ज़रूरी है अहद-ए-नौ को जवाब देना

सो तीखे लहजे में बोलता हूँ ख़फ़ा नहीं हूँ

--

बे-दिली से हँसने को ख़ुश-दिली न समझा जाए
ग़म से जलते चेहरों को रौशनी न समझा जाए

गाह गाह वहशत में घर की सम्त जाता हूँ
इस को दश्त-ए-हैरत से वापसी न समझा जाए

लाख ख़ुश-गुमाँ दुनिया बाहमी तअ'ल्लुक़ को
दोस्ती कहें लेकिन दोस्ती न समझा जाए

हम तो बस ये कहते हैं रोज़ जीने मरने को
आप चाहें कुछ समझें ज़िंदगी न समझा जाए

ख़ाक करने वालों की क्या अजीब ख़्वाहिश थी
ख़ाक होने वालों को ख़ाक भी न समझा जाए
---**
-पीरज़ादा क़ासिम


Friday, January 30, 2026

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे

वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है,

मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है।  

*

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे। 

जो रंज की घडी भी ख़ुशी से गुजार दे। 

*

मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है। 

मेरी जां दिल से चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है। 

Wednesday, January 28, 2026

दया कर दान विद्या का (प्रार्थना)

दया कर दान विद्या का,

हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में,
शुद्धता देना।


हमारे ध्यान में आओ,
प्रभु आँखों में बस जाओ,
अँधेरे दिल में आकर के,
प्रभु ज्योति जगा देना।

बहा दो प्रेम[] की गंगा,
दिलों में प्रेम का सागर,
हमें आपस में मिल-जुल के,
प्रभु रहना सीखा देना।

हमारा धर्म हो सेवा,
हमारा कर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा,
व सेवक जन बना देना।

वतन के वास्ते जीना,
वतन के वास्ते मरना,
वतन पर जाँ फिदा करना,
प्रभु हमको सीखा देना।

दया कर दान विद्या का,
हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में,
शुद्धता देना।

होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो

दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्यपूर्वक सब सहो।

होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।

- मैथिलीशरण गुप्त