Sunday, February 22, 2026

Divine

सब कुछ सुनना कुछ ना कहना 

कितना मुश्किल है।

तुमसे बिछड़ के जिंदा रहना 

आदतन कितना मुश्किल है।।


एक आदत सी बन गई है तू,

और आदत कभी नहीं जाती!

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वो चेहरा ख़ूबसूरत है वो आँखें बात करती हैं

जब उतरे चाँद आँगन में तो रातें बात करती हैं .

मिरी आँखों से नींदें ले के तुम ने रतजगे बख़्शे 

मिरे तकिए मिरे बिस्तर से रातें बात करती हैं.


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दिल में तू आया है तेरे कदमों की आहट से जान लेते हैं

तुझे ए गुलबदन हम तेरी खुशबू से पहचान लेते हैं


तू जो कहे दिन है तो दिन है तू जो कहे रात है तो रात है

तुझ में कुछ तो बात है जो हम तेरा हर कहा मान लेते हैं


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घीरे से तुम्हें मुस्कुराते देखा है,

दिल से तुम्हे अपना कर देखा है.

जिंदगी खिलखिलाने लगती है मेरे,

कुछ लम्हें तुम्हारे साथ बिता कर देखा है.


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तुम रोको न अपने दीवाने को,

दिल तड़प रहा कुछ सुनाने को,

बीते कुछ ख़ास लम्हों को गुनगुनाने को,

कुछ याद आने को कुछ याद दिलाने को.


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I asked the stars for signs of something Divine.

Every wish I whispered softly felt suddenly mine.

Hope cracked the dark wide open, taught my fears to shine.

We munched our meal with laughter, chose love as we dine.

Gathering to dine beneath the clock at nine.

We'd feast on dreams where moments taste so fine.

In wee hours, my heart became a small shrine.

Each memory climbed slowly up the fragile spine.

My pulse betrayed me, spelled out pure andreline.

And still moments spent escapes every wall meant to confine!

#Mumbai #Khargar #MarineDrive #Vikhroli #Jogeshwari #CST #DivineLove


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*काश फिर मिलने की वजह मिल जाए!*

*साथ जितना भी बिताया वो पल मिल जाए!*

*चलो अपनी अपनी आँखें बंद कर लें!*

*क्या पता ख़्वाबों में गुज़रा हुआ कल मिल जाए!*



Sunday, February 8, 2026

उस के होंटों पे रख के होंट अपने

उस के होंटों पे रख के होंट अपने

बात ही हम तमाम कर रहे हैं

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मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को

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तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो

मैं तुम्हारे ही दम से ज़िंदा हूँ
मर ही जाऊँ जो तुम से फ़ुर्सत हो

तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और उतनी ही बे-मुरव्वत हो

तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
या'नी ऐसा है जैसे फ़ुर्क़त हो

तुम हो अंगड़ाई रंग-ओ-निकहत की
कैसे अंगड़ाई से शिकायत हो

किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मिरी ज़िंदगी की आदत हो

किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो

दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मिरी आख़री मोहब्बत हो


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हाल ये है कि ख़्वाहिश-ए-पुर्सिश-ए-हाल भी नहीं
उस का ख़याल भी नहीं अपना ख़याल भी नहीं

ऐ शजर-ए-हयात-ए-शौक़ ऐसी ख़िज़ाँ-रसीदगी
पोशिश-ए-बर्ग-ओ-गुल तो क्या जिस्म पे छाल भी नहीं

मुझ में वो शख़्स हो चुका जिस का कोई हिसाब था
सूद है क्या ज़ियाँ है क्या इस का सवाल भी नहीं

मस्त हैं अपने हाल में दिल-ज़दगान-ओ-दिलबराँ
सुल्ह-ओ-सलाम तो कुजा बहस-ओ-जिदाल भी नहीं

तू मिरा हौसला तो देख दाद तो दे कि अब मुझे
शौक़-ए-कमाल भी नहीं ख़ौफ़-ए-ज़वाल भी नहीं

ख़ेमा-गाह-ए-निगाह को लूट लिया गया है क्या
आज उफ़ुक़ के दोष पर गर्द की शाल भी नहीं

उफ़ ये फ़ज़ा-ए-एहतियात ता कहीं उड़ न जाएँ हम
बाद-ए-जुनूब भी नहीं बाद-ए-शिमाल भी नहीं

वजह-ए-म'आश-ए-बे-दिलाँ यास है अब मगर कहाँ
उस के वरूद का गुमाँ फ़र्ज़-ए-मुहाल भी नहीं

ग़ारत-ए-रोज़-ओ-शब तो देख वक़्त का ये ग़ज़ब तो देख
कल तो निढाल भी था मैं आज निढाल भी नहीं

मेरे ज़मान-ओ-ज़ात का है ये मु'आमला कि अब
सुब्ह-ए-फ़िराक़ भी नहीं शाम-ए-विसाल भी नहीं

पहले हमारे ज़ेहन में हुस्न की इक मिसाल थी
अब तो हमारे ज़ेहन में कोई मिसाल भी नहीं

मैं भी बहुत 'अजीब हूँ इतना 'अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं

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सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं

दिल-ए-बर्बाद ये ख़याल रहे
उस ने गेसू नहीं सँवारे हैं

उन रफ़ीक़ों से शर्म आती है
जो मिरा साथ दे के हारे हैं

और तो हम ने क्या किया अब तक
ये किया है कि दिन गुज़ारे हैं

उस गली से जो हो के आए हों
अब तो वो राह-रौ भी प्यारे हैं

'जौन' हम ज़िंदगी की राहों में
अपनी तन्हा-रवी के मारे हैं

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कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे

शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं
मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे

वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे

उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा
यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे

यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे

मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे
या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे

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तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारे बा'द भला क्या हैं वअदा-ओ-पैमाँ
बस अपना वक़्त गँवा लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारे हिज्र की शब-हा-ए-कार में जानाँ
कोई चराग़ जला लूँ अगर इजाज़त हो

जुनूँ वही है वही मैं मगर है शहर नया
यहाँ भी शोर मचा लूँ अगर इजाज़त हो

किसे है ख़्वाहिश-ए-मरहम-गरी मगर फिर भी
मैं अपने ज़ख़्म दिखा लूँ अगर इजाज़त हो

तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी
कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो


--

जौन एलिया



अभी कुछ और मिरा दिल दुखाना चाहिए था

तुम्हें जफ़ा से न यूँ बाज़ आना चाहिए था,

अभी कुछ और मिरा दिल दुखाना चाहिए था.

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मैं कब से अपनी तलाश में हूँ मिला नहीं हूँ

सवाल ये है कि मैं कहीं हूँ भी या नहीं हूँ


ये मेरे होने से और न होने से मुन्कशिफ़ है

कि रज़्म-ए-हस्ती में क्या हूँ मैं और क्या नहीं हूँ


मैं शब निज़ादों में सुब्ह-ए-फ़र्दा की आरज़ू हूँ

मैं अपने इम्काँ में रौशनी हूँ सबा नहीं हूँ


गुलाब की तरह इश्क़ मेरा महक रहा है

मगर अभी उस की किश्त-ए-दिल में खिला नहीं हूँ


न जाने कितने ख़ुदाओं के दरमियाँ हूँ लेकिन

अभी मैं अपने ही हाल में हूँ ख़ुदा नहीं हूँ


कभी तो इक़बाल-मंद होगी मिरी मोहब्बत

नहीं है इम्काँ कोई मगर मानता नहीं हूँ


हवाओं की दस्तरस में कब हूँ जो बुझ रहूँगा

मैं इस्तिआरा हूँ रौशनी का दिया नहीं हूँ


मैं अपनी ही आरज़ू की चश्म-ए-मलाल में हूँ

खुला है दर ख़्वाब का मगर देखता नहीं हूँ


उधर तसलसुल से शब की यलग़ार है इधर मैं

बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ बुझा नहीं हूँ


बहुत ज़रूरी है अहद-ए-नौ को जवाब देना

सो तीखे लहजे में बोलता हूँ ख़फ़ा नहीं हूँ

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बे-दिली से हँसने को ख़ुश-दिली न समझा जाए
ग़म से जलते चेहरों को रौशनी न समझा जाए

गाह गाह वहशत में घर की सम्त जाता हूँ
इस को दश्त-ए-हैरत से वापसी न समझा जाए

लाख ख़ुश-गुमाँ दुनिया बाहमी तअ'ल्लुक़ को
दोस्ती कहें लेकिन दोस्ती न समझा जाए

हम तो बस ये कहते हैं रोज़ जीने मरने को
आप चाहें कुछ समझें ज़िंदगी न समझा जाए

ख़ाक करने वालों की क्या अजीब ख़्वाहिश थी
ख़ाक होने वालों को ख़ाक भी न समझा जाए
---**
-पीरज़ादा क़ासिम


Friday, January 30, 2026

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे

वो जितनी दूर हो उतना ही मेरा होने लगता है,

मगर जब पास आता है तो मुझ से खोने लगता है।  

*

दिल दे तो इस मिजाज का परवरदिगार दे। 

जो रंज की घडी भी ख़ुशी से गुजार दे। 

*

मिलाते हो उसी को खाक में जो दिल से मिलता है। 

मेरी जां दिल से चाहने वाला बड़ी मुश्किल से मिलता है। 

Wednesday, January 28, 2026

दया कर दान विद्या का (प्रार्थना)

दया कर दान विद्या का,

हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में,
शुद्धता देना।


हमारे ध्यान में आओ,
प्रभु आँखों में बस जाओ,
अँधेरे दिल में आकर के,
प्रभु ज्योति जगा देना।

बहा दो प्रेम[] की गंगा,
दिलों में प्रेम का सागर,
हमें आपस में मिल-जुल के,
प्रभु रहना सीखा देना।

हमारा धर्म हो सेवा,
हमारा कर्म हो सेवा,
सदा ईमान हो सेवा,
व सेवक जन बना देना।

वतन के वास्ते जीना,
वतन के वास्ते मरना,
वतन पर जाँ फिदा करना,
प्रभु हमको सीखा देना।

दया कर दान विद्या का,
हमें परमात्मा देना,
दया करना हमारी आत्मा में,
शुद्धता देना।

होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो

दुख, शोक, जब जो आ पड़े, सो धैर्यपूर्वक सब सहो।

होगी सफलता क्यों नहीं, कर्तव्य पथ पर दृढ़ रहो।

- मैथिलीशरण गुप्त


Friday, January 23, 2026

अब तो तेरी नजर भी कातिल है


इतनी अदाएं कम थीं जो एक और शामिल है,

कातिल सूरत पहले ही थी अब तो तेरी नजर भी कातिल है.

**

कातिल सूरत पहले ही थी, अब तो कयामत ढा रही है,

तेरी सादगी भी अब, दिल पर खंजर चला रही है।

**
उसकी आँखों में रहूँ या दिल में उतर जाऊं,
उसकी बालों में उलझूं या होठों पे ठहर जाऊं.

**

मस्त नज़रों से देख लेना था अगर
तमन्ना थी आज़माने की,
हम तो बेहोश यूँ ही हो जाते क्या 
ज़रूरत थी मुस्कराने की..

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तुम रोको न अपने दीवाने को,
दिल तड़प रहा कुछ सुनने को,
बीते कुछ ख़ास लम्हों को गुनगुनाने को,
कुछ याद आने को कुछ याद दिलाने को.

*

घीरे से तुम्हें मुस्कुराते देखा है,
दिल से तुम्हे अपना कर देखा है.
जिंदगी खिलखिलाने लगती है मेरे,
कुछ लम्हें तुम्हारे साथ बिता कर देखा है.

**

मुझे नहीं मालूम तारीफ का हुनर बस ये जान लो तुम। 
मेरी नज़रों में सबसे खूबसूरत हो तुम। 
मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी जरुरत हो तुम..

...


आपकी हर एक अदा है दिल चुराने की,
तमना है हमारी इस अदा को दिल में बसाने की,
चाँद सा है चेहरा है आपका 
और हमारी ख्वाहिश है उस चाँद को पाने की..

Saturday, January 17, 2026

दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी

मलाल नहीं दर्द की इन्तेहाँ से ,

दर्द भी अपना है और दर्द देने वाला भी ...


तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया

हम ने पाला मुद्दतों पहलू में, हम कुछ भी नहीं

तुम ने देखा एक नज़र और दिल तम्हारा हो गया

आसी राम नगरी

आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी

गहरे समंदरों की भला क्या खबर उन्हें..

आंखों की झील में जो उतरे नहीं कभी ।।