उस के होंटों पे रख के होंट अपने
बात ही हम तमाम कर रहे हैं
--
मेरी बाँहों में बहकने की सज़ा भी सुन ले
अब बहुत देर में आज़ाद करूँगा तुझ को
--
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत हो
मैं तुम्हारे ही दम से ज़िंदा हूँ
मर ही जाऊँ जो तुम से फ़ुर्सत हो
तुम हो ख़ुशबू के ख़्वाब की ख़ुशबू
और उतनी ही बे-मुरव्वत हो
तुम हो पहलू में पर क़रार नहीं
या'नी ऐसा है जैसे फ़ुर्क़त हो
तुम हो अंगड़ाई रंग-ओ-निकहत की
कैसे अंगड़ाई से शिकायत हो
किस तरह छोड़ दूँ तुम्हें जानाँ
तुम मिरी ज़िंदगी की आदत हो
किस लिए देखती हो आईना
तुम तो ख़ुद से भी ख़ूब-सूरत हो
दास्ताँ ख़त्म होने वाली है
तुम मिरी आख़री मोहब्बत हो
--
हाल ये है कि ख़्वाहिश-ए-पुर्सिश-ए-हाल भी नहीं
उस का ख़याल भी नहीं अपना ख़याल भी नहीं
ऐ शजर-ए-हयात-ए-शौक़ ऐसी ख़िज़ाँ-रसीदगी
पोशिश-ए-बर्ग-ओ-गुल तो क्या जिस्म पे छाल भी नहीं
मुझ में वो शख़्स हो चुका जिस का कोई हिसाब था
सूद है क्या ज़ियाँ है क्या इस का सवाल भी नहीं
मस्त हैं अपने हाल में दिल-ज़दगान-ओ-दिलबराँ
सुल्ह-ओ-सलाम तो कुजा बहस-ओ-जिदाल भी नहीं
तू मिरा हौसला तो देख दाद तो दे कि अब मुझे
शौक़-ए-कमाल भी नहीं ख़ौफ़-ए-ज़वाल भी नहीं
ख़ेमा-गाह-ए-निगाह को लूट लिया गया है क्या
आज उफ़ुक़ के दोष पर गर्द की शाल भी नहीं
उफ़ ये फ़ज़ा-ए-एहतियात ता कहीं उड़ न जाएँ हम
बाद-ए-जुनूब भी नहीं बाद-ए-शिमाल भी नहीं
वजह-ए-म'आश-ए-बे-दिलाँ यास है अब मगर कहाँ
उस के वरूद का गुमाँ फ़र्ज़-ए-मुहाल भी नहीं
ग़ारत-ए-रोज़-ओ-शब तो देख वक़्त का ये ग़ज़ब तो देख
कल तो निढाल भी था मैं आज निढाल भी नहीं
मेरे ज़मान-ओ-ज़ात का है ये मु'आमला कि अब
सुब्ह-ए-फ़िराक़ भी नहीं शाम-ए-विसाल भी नहीं
पहले हमारे ज़ेहन में हुस्न की इक मिसाल थी
अब तो हमारे ज़ेहन में कोई मिसाल भी नहीं
मैं भी बहुत 'अजीब हूँ इतना 'अजीब हूँ कि बस
ख़ुद को तबाह कर लिया और मलाल भी नहीं
--
सारी दुनिया के ग़म हमारे हैं
और सितम ये कि हम तुम्हारे हैं
दिल-ए-बर्बाद ये ख़याल रहे
उस ने गेसू नहीं सँवारे हैं
उन रफ़ीक़ों से शर्म आती है
जो मिरा साथ दे के हारे हैं
और तो हम ने क्या किया अब तक
ये किया है कि दिन गुज़ारे हैं
उस गली से जो हो के आए हों
अब तो वो राह-रौ भी प्यारे हैं
'जौन' हम ज़िंदगी की राहों में
अपनी तन्हा-रवी के मारे हैं
--
कितने ऐश से रहते होंगे कितने इतराते होंगे
जाने कैसे लोग वो होंगे जो उस को भाते होंगे
शाम हुए ख़ुश-बाश यहाँ के मेरे पास आ जाते हैं
मेरे बुझने का नज़्ज़ारा करने आ जाते होंगे
वो जो न आने वाला है ना उस से मुझ को मतलब था
आने वालों से क्या मतलब आते हैं आते होंगे
उस की याद की बाद-ए-सबा में और तो क्या होता होगा
यूँही मेरे बाल हैं बिखरे और बिखर जाते होंगे
यारो कुछ तो ज़िक्र करो तुम उस की क़यामत बाँहों का
वो जो सिमटते होंगे उन में वो तो मर जाते होंगे
मेरा साँस उखड़ते ही सब बैन करेंगे रोएँगे
या'नी मेरे बा'द भी या'नी साँस लिए जाते होंगे
--
तुम्हारा हिज्र मना लूँ अगर इजाज़त हो
मैं दिल किसी से लगा लूँ अगर इजाज़त हो
तुम्हारे बा'द भला क्या हैं वअदा-ओ-पैमाँ
बस अपना वक़्त गँवा लूँ अगर इजाज़त हो
तुम्हारे हिज्र की शब-हा-ए-कार में जानाँ
कोई चराग़ जला लूँ अगर इजाज़त हो
जुनूँ वही है वही मैं मगर है शहर नया
यहाँ भी शोर मचा लूँ अगर इजाज़त हो
किसे है ख़्वाहिश-ए-मरहम-गरी मगर फिर भी
मैं अपने ज़ख़्म दिखा लूँ अगर इजाज़त हो
तुम्हारी याद में जीने की आरज़ू है अभी
कुछ अपना हाल सँभालूँ अगर इजाज़त हो
--
जौन एलिया
No comments:
Post a Comment