आखिरी ईंट तक, तुम दीवार चुनवाते रहे।
ईंट दर ईंट, उठाते रहे दीवार, और
जान छिड़कने की, तुम मुनादी करवाते रहे।
हर ईंट को, तेरी अदा समझते रहे,
हर अदा और मग़रूर हो, तुम दुआ करवाते रहे।
पत्थर तो बहुत थे पास हमारे भी,
दिल एक ही था, तुम उससे ईश्क करवाते रहे।
जाने ईंटें भी कितनी ली हैं हमीं से
मौके बे मौके उन्हें, हम पर ही तुम बरसाते रहे।
इन मजबूर अश्कों को अब थाम लो
हमारी यह गुज़ारिश सारी तुम बस ठुकराते रहे।
सैलाब ए आंसू का दायरा है अनजाना,
जद तुम्हारे गुलिस्तां की तुम अब तक बचाते रहे।
दीवार हर गिरेगी, खुशी दूर से दिखेगी
यही सोचकर हम हर सुबह जल्दी उठ जाते रहे।
लगने लगा है कि अब शाम हो आई है
सितारे, फलक पे दोपहर से ही टिमटिमाते रहे।
ख़ाक होगा गुलशन तेरा भी इक दिन
जो संतोष अपनी पलकों में यूं आंसू छुपाते रहे।
कोरोना नहीं आह है टूटे हुए दिल की
यही एक बात है, हम शुरू से तुम्हें जतलाते रहे।
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