ऐ ज़िंदगी वगरना ज़माने में क्या न था
- आज़ाद अंसा
जी ढूंढ़ता है फिर वही फ़ुर्सत कि रात दिन
बैठे रहें तसव्वुर-ए-जानां किए हुए
- मिर्ज़ा ग़ालिब
अगर ऐ नाख़ुदा तूफ़ान से लड़ने का दम-ख़म है
इधर कश्ती न ले आना यहां पानी बहुत कम है
- दिवाकर राही
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर
आदत इस की भी आदमी सी है
- गुलज़ार
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