Thursday, May 7, 2020

कल देखा मैंने एक सपना

कल देखा मैंने एक सपना,
जो जिंदगी की हकीकत से रूबरू
मुझे करा गया, रूबरू मुझे करा गया,
सूरज की पहली किरण के साथ,
आई एक नई सुबह एक नई उमंग के साथ।
जाने कब बीत गई दोपहर अब हो गई है शाम..
हो गई है शाम।।

बंद मुट्ठी से फिसल रही है रेत,
और अंजलि से बह रहा है पानी,
रोकना चाहुं पर रोक ना पाऊं,
कितनी हूं मजबूर क्या तुमको अब मैं बताऊं।।

जी हां ऐसा ही अपना जीवन है, ऐसा ही अपना जीवन है,
आया था बचपन स्कूल-कॉलेज में बीत गया,
आई थी जवानी जिम्मेदारियों में जाने कब वह भी बीत गई,
जाने बंद मुट्ठी से मेरी कैसे रेत वो फिसल गई,
जी भर जीने से पहले ही आंखों से ओझल, हो गए वह पल।

खड़ी हूं उम्र की उस दहलीज, जिसे पार करना मैं ना चाहूं,
खींच रहा अपनी और बुढ़ापा,
पर जाना उस ओर मैं ना चाहूं, जाना ओर मैं ना चाहूं।।

सुना है मैंने आता नहीं यह अकेले, सुना है मैंने आता नहीं यह अकेले,
लाता अपने साथ ये, दोस्त नए कई संग हैं अपने।
शुगर, बीपी, थायराइड हो जाते जीवन के अब नए साथी,
कभी-कभी हाथों में थम जाती है लकड़ी की एक लाठी।

धुंधला सा दिख रहा मुझको पूरा अख़बार,
जाने कहां रखकर भूल गई, मैं चश्मा अपना इस बार।
भूलने की लग गई है नई यह बीमारी,
पहले हुआ करती थी, मैं यादों की एक अलमारी।।
यादों की एक अलमारी।

2 दिन का था वो बचपन जाने कब वो बीत गया,
4 दिन थी वह जवानी, बन गई है अब वो एक बीती कहानी।
पर,दोस्तों! 100 दिन का होता है बुढ़ापा,
सबसे शाश्वत और निराला,
जीने का बस एक नया ढंग है,
अब एक्सपीरियंस और एटीट्यूड अपने संग है।

समय की सुई को पकड़ते पकड़ते सफेदी छा जाती है
बालों पर पर आजकल का नया ट्रेंड है,
कहलाती है यह सॉल्ट एंड पेपर।।
पड़ जाती है लकीरें धीरे-धीरे पूरे चेहरे पर,
लकीरे नहीं है यह ,रेखा है अनुभव की मेरे चेहरे पर।
रेखा है यह अनुभव की मेरे चेहरे पर।
सुनहरे है यह पल जो कोई अब ना छीन पाएगा,
साथ हमेशा रह जाएगा बुढ़ापा,
बुढ़ापा और बुढ़ापा।।

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