Sunday, May 10, 2020

वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमां जो बस गए
इंसां की शक्ल देखने को हम तरस गए


मेरा बचपन भी साथ ले आया
गाँव से जब भी आ गया कोई


रोज़ बढ़ता हूं जहां से आगे
फिर वहीं लौट के आ जाता हूं


बहार आए तो मेरा सलाम कह देना
मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने


बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें
मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले


अब जिस तरफ़ से चाहे गुज़र जाए कारवाँ
वीरानियाँ तो सब मिरे दिल में उतर गईं

पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था
जिस्म जल जाएँगे जब सर पे न साया होगा


जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क
यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

ख़ार-ओ-ख़स तो उठें रास्ता तो चले
मैं अगर थक गया क़ाफ़िला तो चले


तू अपने दिल की जवाँ धड़कनों को गिन के बता
मिरी तरह तिरा दिल बे-क़रार है कि नहीं

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