Saturday, May 9, 2020

ख़ुद की पहचान लिखूँगा

कठिन रास्तों पे
नयी दास्ताँ लिखूँगा
अकेला चलूँगा
मगर कारवाँ लिखूँगा
पैर जमीं पे होंगे
लेकिन सपनो में आसमाँ लिखूँगा
ख़ुद ही
ख़ुद की पहचान लिखूँगा

ना सपनों की तस्वीर बदलूँगा
ना चलने का तेवर बदलूँगा
घेरे चाहे प्रलय की घोर घटाए
रास्तों से ही
मंज़िल का पता पूछूँगा
अपनी राह ख़ुद बनाऊँगा
ख़ुद ही
ख़ुद की पहचान लिखूँगा

सतह तपे या पैरों में छालें पड़े
अपनी धुन में चलता जाऊँगा
ख़ुद ही हमसफ़र
और ख़ुद से ही आगे बढ़ता जाऊँगा
ख़ुद ही
ख़ुद की पहचान लिखूँगा

बुरे वक़्त का चेहरा बेनक़ाब करूँगा
अच्छे वक़्त का ख़ुद आइना हो जाऊँगा
भाग्य की रेखाओ को कर्म से बनाउंगा
क़िस्मत का सितारा ख़ुद ही बन जाऊँगा
ख़ुद ही
ख़ुद की पहचान लिखूँगा

अंतरद्वन्द से ख़ुद जीतूँगा
प्रगति या अगति का मापदण्ड बदलूँगा
ख़ुद से ख़ुद का परिचय करवाके
इतिहास पढ़ने वालों के लिए
नयी दास्ताँ लिखूँगा
ख़ुद ही
ख़ुद की पहचान लिखूँगा

संसाधनों की बुनियाद चाहे जैसी हो
नींव विश्वास की
ईंट हिम्मत की
नक़्क़ाशी ख़्वाहिशो की रखूँगा
नाम धर्म शोभा रखूँगा
ख़ुद ही
ख़ुद की पहचान लिखूँगा

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