पर चाहता हूं तुम्हें थोड़ा-थोड़ा, क्योंकि तेरे बह जाने का डर है।
इज़हार - इकरार हाथों में लेकर हाथ आशिकों सा प्यार,
तुम बाहर ढूंढती फिरती हो, ये ख्वाहिशें सारी अंदर है।
कभी-कभी खुश दिखता हूं मैं, हसीं सपने भी देख लेता हूं,
पर जिस तरह बढ़ें है फासलें, सोचकर घबराता दिल अक्सर है।
कुछ गलतियां हुई हैं मुझसे, कुछ खामी है तुम्हारे समझने में,
कुछ मेरी बर्बादी चाहने वालों की, बद् दुआओं का असर है।
तुम्हें देखे एक अरसा हुआ, गैरों से बताते फिरते हैं पर,
अक्सर मिलता हूं उस गली में मैं, जिसके दाहिने तेरा घर है।
उम्मीद बाकी है अब भी, शिकवे मिटाने की भी गुंजाइश है।
पर तन्हा कटी है जिंदगी, तन्हा गुजर जाए तो बेहतर है।
तो मिलते हैं इक ऐसी दुनियाँ में, अब तक जमाना जिससे बेख़बर है,
पर चाहता हूं तुम्हें थोड़ा- थोड़ा क्योंकि तेरे बह जाने का डर है।
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