Monday, May 11, 2020

नादान बचपन

नादान बचपन
नादान बचपन है उसका 
वो बेपरवाह सी रहती है।
इरादे चाहे जो भी हो लोगों के 
बदले में वो सबको मधुर मुस्कान ही देती है।

भोली सी है उसकी आजादी 
ना बंदिशों का पता है उसे।
ना सीमाओं की है पाबंदी

वो ज्यादा सोचती नहीं
बस विश्वास करना जानती है ।
मासूमियत से सबसे एक सवाल ही पूछती है
थोड़ा अनजाना सा भाव रहता है मुख पर

फिर हंस कर सबसे
वो दुबारा वहीं सवाल पूछती है।
कितनी नादान है ना वो
कभी - कभी सोचती हूं।

फिर याद आता है 
कि सबका बचपन ऐसा ही तो होता है।
कल वो अपनी गुड़िया को 
चलना सीखा रही थी।
कितनी निश्छलता से वो खुद को 
उसकी मम्मी बता रही थी।

वो खुद पर इतराना उसका
सबको भा रहा था।
वो खिलखिला कर छुप जाना उनका
हमे भी हंसा रहा था।

देख कर उसे लगता है ऐसा
संसार में सब कुछ अपना हो जैसा।
वो सबको अपना जो बताती है
मुझसे सुन कर, मुझे ही अपनी बाबू, सोना बुलाती है।

मेरी लाडली ,मेरी जान है वो
प्यार को अपने तोल नहीं सकती।
मगर जिसके लिए कर दूं कुर्बान 
हां , वहीं है वो ।

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