मैं एक औरत हूँ, प्रकृति का गौरव हूँ
और ये है मेरा सफर मेरी कहानी
कहानी शुरू जो हुई थी, एक औरत की कोख से
जाना जिसे मैंने अपनी माँ के रूप में
कोख से उसकी निकली तो कली बन गई
घर के आँगन की मैं उड़ती खिलखिलाती तितली बन गई
और बढ़ी तो
माँ ने मचलते हुए पाँवों को थामना सिखाया
जड़ों से अपनी ज़मीन को पकड़ना सिखाया
पर यह कैसी विडम्बना, गुड टच और बैड टच का फर्क भी बतलाया,
समय के पहिये को लेकिन कहाँ कोई थाम पाया।
और बढी़ तो़..
आकाश में उड़ने की चाहत जगी
पढ़ने की, आगे बढ़ने कुछ कर दिखा जाने की उम्मीद बनी
परिवार ने मेरे सपनों के पौधे को सींचा
जड़ें ज़मीन पर ही रहीं और मैं पेड़ की तरह बढ़ने लगी
और मैं आगे बढ़ती चली गई, इतिहास नए रचती चली गई
घर की चारदीवारी में छुपी मैं औरत
डॉक्टर, इन्जीनियर, पायलट, एक्टर और भी ना जाने कितने ही मुकाम हासिल करती चली गई।
और आगे बढ़ी तो,
उम्र ने अपने पड़ाव बताए, जिम्मेदारियों के नए आयाम दिखलाए
पर मैं भी थी कहाँ रुकने वाली
जिम्मेदारियों को मैं अपनी पूरा करती चली गई,
नए परिवार के सांचे में ढलती चली गई
नए परिवार ने मुझे रुकने नहीं दिया, मेरी जड़ों और लताओं को आगे बढ़ने का हौसला दिया
दोनों परिवारों की अब मैं इज्जत बन गई, उनका नाम रोशन कर सकूँ, ऐसी मेरी ज़िद बन गई।
उम्र के तजुर्बों ने क्या नही सिखलाया
माँ बेटी बहन पत्नी ननद भाभी सास कभी सहेली सभी कुछ तो बनाया
पर, अब कुछ थम जाने का सा मन करता है
अपनी जिम्मेदारियों को नई पीढ़ी के साथ बांटने का सा मन करता है
उन्हें आगे बढ़ता देख उनकी खुशियों में शामिल होने का मन करता है
इस बात से मगर यह ना समझ लेना कि रुक जाने का सोच लिया है मैंने??
क्योंकि अब कली से पौधा पौधे से पेड़ बन गई हूँ मैं
गाँव की चौपाल का वह पीपल का पेड़ और उसकी छाया बन गई हूँ मैं,
अपनी छाया में समेटे सम्पूर्ण प्रकृति का प्रतीक बन गई हूँ मैं..
सफर ये मेरा कभी खत्म ना होगा, एक नए सफर पर चलने को तत्पर हो गई हूँ मैं
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