सौ बार मैं फ़रेब से बीमार हो चुका
- अमीर मीनाई
तुम्हारे हिज्र में आंखें हमारी मुद्दत से
नहीं ये जानतीं दुनिया में ख़्वाब है क्या चीज़
- नज़ीर अकबराबादी
अदब लाख था फिर भी उन की तरफ़
नज़र मेरी अक्सर रही देखती
- अज्ञात
हम भटकते रहे अंधेरे में
रौशनी कब हुई नहीं मालूम
- बेकल उत्साही
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