Friday, April 10, 2020

इंसानियत, आदमियत शायरी

नई मंज़िल नया जादू उजाला ही उजाला
दूर तक इंसानियत का बोल-बाला
- मोहम्मद अली असर

क्या-क्या ग़ुबार उठाए नज़र के फ़साद ने
इंसानियत की लौ कभी मद्धम न हो सकी
- अज्ञात

तुम्हारे पास सब है मैं नहीं हूँ
सिसकती आदमियत बोलती है
-माजिद अली काविश

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं 
जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं 
- सुदर्शन फ़ाख़िर

ख़ुद को बिखरते देखते हैं कुछ कर नहीं पाते हैं 
फिर भी लोग ख़ुदाओं जैसी बातें करते हैं 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं 
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं 
- बशीर बद्र
आदमी है तो आदमी ही रह
आदमियत को दाग़दार न कर
- सहर महमूद

ज़ेहन जाग उठता है रूह जाग उठती है
नक़्श आदमियत के जगमगाने लगते हैं
- कैफ़ी आज़मी
ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़ 
डरते हैं ऐ ज़मीन तिरे आदमी से हम 
-अज्ञात

फ़रिश्ते से बढ़ कर है इंसान बनना 
मगर इस में लगती है मेहनत ज़ियादा 
- अल्ताफ़ हुसैन हाली

आदमिय्यत और शय है इल्म है कुछ और शय 
कितना तोते को पढ़ाया पर वो हैवाँ ही रहा 
- शेख़ इब्राहीम ज़ौक़
बुरा बुरे के अलावा भला भी होता है 
हर आदमी में कोई दूसरा भी होता है 
- अनवर शऊर

ये भी कोई बात है हर वक़्त दौलत का ख़याल
आदमी हैं आप अगर तो आदमियत देखिए
- जोश मलीहाबादी

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