तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं
नई ज़मीन नया आसमां नई दुनिया
अजीब शय ये तिलिस्म ख़याल होता है
तारा टूटते सब ने देखा ये नहीं देखा एक ने भी
किस की आँख से आँसू टपका किस का सहारा टूट गया
तो एक था मिरे अशआ'र में हज़ार हुआ
उस इक चराग़ से कितने चराग़ जल उठे
थी यूँ तो शाम-ए-हिज्र मगर पिछली रात को
वो दर्द उठा 'फ़िराक़' कि मैं मुस्कुरा दिया
चुपके चुपके उठ रहा है मध-भरे सीनों में दर्द
धीमे धीमे चल रही हैं इश्क़ की पुरवाइयाँ
सच तो ये है बड़े आराम से हूँ
तेरे हर लहज़ा सताने की क़सम
कहाँ हर एक से बार-ए-नशात उठता है
बलाएँ ये भी मोहब्बत के सर गई होंगी
मैं देर तक तुझे ख़ुद ही न रोकता लेकिन
तू जिस अदा से उठा है उसी का रोना है
ये माना ज़िंदगी है चार दिन की
बहुत होते हैं यारो चार दिन भी!
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