Tuesday, April 7, 2020

कवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री की कविताएँ

दुख को सुमुख बनाओ, गाओ !
काली घटा छंटेगी कैसे ?
रिमझिम-रिमझिम स्वर बरसाओ !

कौन सुने करुणा की वाणी ?
दीन दृगों के आँसू पानी !
पर अगीत संगीत अभी भी, -
इसका लयमय भेद बताओ !

असह सहो दृढ़ प्राण बनाओ,
अश्रुकणों को गान बनाओ,
जब सुख छिटके चन्द्रकिरण बन 
सजल नयन झुक, चुप हो जाओ !

जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !
जनम-जनम की पहचानी वह तान कहाँ से आई !
किसने बाँसुरी बजाई

अंग-अंग फूले कदंब साँस झकोरे झूले
सूखी आँखों में यमुना की लोल लहर लहराई !
किसने बाँसुरी बजाई

जटिल कर्म-पथ पर थर-थर काँप लगे रुकने पग
कूक सुना सोए-सोए हिय मे हूक जगाई !
किसने बाँसुरी बजाई

मसक-मसक रहता मर्मस्थल मरमर करते प्राण
कैसे इतनी कठिन रागिनी कोमल सुर में गाई !
किसने बाँसुरी बजाई

उतर गगन से एक बार फिर पी कर विष का प्याला
निर्मोही मोहन से रूठी मीरा मृदु मुस्काई !
किसने बाँसुरी बजाई
बना घोंसला पिंजरा पंछी !
बना घोंसला पिंजरा पंछी !

अब अनंत से कौन मिलाये 
जिससे तू खुद बिछड़ा पंछी !

सुखद स्वप्न लख किसी सुदिन का 
चुन-चुन पल-छिन तिनका-तिनका
रहा मूल से दूर-दूर, पर --
डाल-पात तो झगड़ा पंछी !

अग्नि जले तब विफल न इंधन
मुक्ति करम का मर्म, न बंधन 
उड़ा हाय !जो सबसे आगे 
वह अपने से बिछड़ा पंछी

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