Tuesday, April 7, 2020

ख़ुमार बाराबंकवी के कुछ चुनिंदा मशहूर शेर

ये वफ़ा की सख़्त राहें ये तुम्हारे पाँव नाज़ुक 
न लो इंतिक़ाम मुझ से मिरे साथ साथ चल के 

ख़ुदा बचाए तिरी मस्त मस्त आँखों से 
फ़रिश्ता हो तो बहक जाए आदमी क्या है


दूसरों पर अगर तब्सिरा कीजिए 
सामने आइना रख लिया कीजिए 

हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तों
सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं 

हटाए थे जो राह से दोस्तों की 
वो पत्थर मिरे घर में आने लगे हैं 

सुना है हमें वो भुलाने लगे हैं 
तो क्या हम उन्हें याद आने लगे हैं 

फूल कर ले निबाह काँटों से 
आदमी ही न आदमी से मिले 

रात बाक़ी थी जब वो बिछड़े थे 
कट गई उम्र रात बाक़ी है 

अक़्ल ओ दिल अपनी अपनी कहें जब 'ख़ुमार' 
अक़्ल की सुनिए दिल का कहा कीजिए 

रौशनी के लिए दिल जलाना पड़ा 
कैसी ज़ुल्मत बढ़ी तेरे जाने के बअ'द! 

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