Wednesday, August 27, 2025

बचपन (शेर, शायरी)

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मैंने मिट्टी भी जमा की, खिलौने भी लेकर देखे,
जिन्दगी में वो मुस्कुराहट नही आई जो बचपन में देखे

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बचपन के खुशियों वाला खेल कोई फिर से खिला दे,

मेरी दौलत-शोहरत ले ले और मुझे बच्चा बना दे.

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बचपन में पैसा जरूर कम था
पर यकीन मानों उस बचपन में दम था
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झूठ बोलते थे फिर भी कितने सच्चे थे हम ये उन दिनों की बात है जब बच्चे थे हम
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बचपन की दोस्ती सभी निभाते हैं, जरुरत पड़े तो बिन बुलाये आते है।
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महफ़िल तो जमी बचपन के दोस्तों के साथ,
पर अफ़सोस अब बचपन नहीं है किसी के पास.
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हंसते खेलते गुजर जाये ऐसी शाम नहीं आती,

होंठों पर अब वो बचपन वाली मुस्कान नहीं आती.

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ज़िन्दगी  जब  भी  सुकून  दे  जाती  है,

ऐ  बचपन  हमें  तेरी  याद  आती  है। 

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आसमान में उड़ती एक पतंग दिखाई दी,

आज फिर से मुझे मेरी बचपन दिखाई दी .

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ईमान बेचकर बेईमानी खरीद ली,

बचपन बेचकर जवानी खरीद ली। 

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