*
अपने हर हर लफ़्ज़
का ख़ुद आइना हो जाऊँगा
उस को छोटा कह के
मैं कैसे बड़ा हो जाऊँगा
तुम गिराने में लगे
थे तुम ने सोचा ही नहीं
मैं गिरा तो मसअला
बन कर खड़ा हो जाऊँगा
मुझ को चलने दो अकेला
है अभी मेरा सफ़र
रास्ता रोका गया तो क़ाफ़िला
हो जाऊँगा
सारी दुनिया की नज़र
में है मिरा अहद-ए-वफ़ा
इक तिरे कहने से क्या
मैं बेवफ़ा हो जाऊँगा
-वसीम बरेलवी
*
आते आते मिरा नाम
सा रह गया
उस के होंटों पे कुछ
काँपता रह गया
रात मुजरिम थी दामन बचा
ले गई
दिन गवाहों की सफ़ में
खड़ा रह गया
वो मिरे सामने ही गया
और मैं
रास्ते की तरह देखता
रह गया
झूट वाले कहीं से
कहीं बढ़ गए
और मैं था कि सच बोलता
रह गया
आँधियों के इरादे तो
अच्छे न थे
ये दिया कैसे जलता हुआ
रह गया
उस को काँधों पे ले जा
रहे हैं 'वसीम'
और वो जीने का हक़ माँगता
रह गया.
*
अपने चेहरे से जो
ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़
नज़र आएँ कैसे
घर सजाने का तसव्वुर
तो बहुत ब'अद का है
पहले ये तय हो कि इस
घर को बचाएँ कैसे
लाख तलवारें बढ़ी
आती हों गर्दन की तरफ़
सर झुकाना नहीं आता
तो झुकाएँ कैसे
क़हक़हा आँख का बरताव
बदल देता है
हँसने वाले तुझे आँसू
नज़र आएँ कैसे
फूल से रंग जुदा होना
कोई खेल नहीं
अपनी मिट्टी को कहीं
छोड़ के जाएँ कैसे
कोई अपनी ही नज़र से
तो हमें देखेगा
एक क़तरे को समुंदर नज़र
आएँ कैसे
जिस ने दानिस्ता किया
हो नज़र-अंदाज़ 'वसीम'
उस को कुछ याद दिलाएँ
तो दिलाएँ कैसे
*
मोहब्बत ना-समझ होती
है समझाना ज़रूरी है
जो दिल में है उसे
आँखों से कहलाना ज़रूरी है
उसूलों पर जहाँ आँच आए
टकराना ज़रूरी है
जो ज़िंदा हो तो फिर
ज़िंदा नज़र आना ज़रूरी है
नई उम्रों की ख़ुद-मुख़्तारियों
को कौन समझाए
कहाँ से बच के चलना है
कहाँ जाना ज़रूरी है
थके-हारे परिंदे जब बसेरे
के लिए लौटें
सलीक़ा-मंद शाख़ों का
लचक जाना ज़रूरी है
बहुत बेबाक आँखों में
त'अल्लुक़ टिक नहीं पाता
मोहब्बत में कशिश रखने
को शर्माना ज़रूरी है
सलीक़ा ही नहीं शायद
उसे महसूस करने का
जो कहता है ख़ुदा है
तो नज़र आना ज़रूरी है
मिरे होंटों पे अपनी
प्यास रख दो और फिर सोचो
कि इस के बा'द भी
दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है
*
क्या दुख है समुंदर
को बता भी नहीं सकता
आँसू की तरह आँख तक
आ भी नहीं सकता
तू छोड़ रहा है तो
ख़ता इस में तिरी क्या
हर शख़्स मिरा साथ
निभा भी नहीं सकता
प्यासे रहे जाते हैं
ज़माने के सवालात
किस के लिए ज़िंदा हूँ
बता भी नहीं सकता
घर ढूँड रहे हैं मिरा
रातों के पुजारी
मैं हूँ कि चराग़ों को
बुझा भी नहीं सकता
वैसे तो इक आँसू ही बहा
कर मुझे ले जाए
ऐसे कोई तूफ़ान हिला
भी नहीं सकता
*
मैं इस उमीद पे डूबा
कि तू बचा लेगा
अब इस के बा'द मिरा
इम्तिहान क्या लेगा
ये एक मेला है वा'दा
किसी से क्या लेगा
ढलेगा दिन तो हर इक अपना
रास्ता लेगा
मैं बुझ गया तो हमेशा
को बुझ ही जाऊँगा
कोई चराग़ नहीं हूँ
कि फिर जला लेगा
कलेजा चाहिए दुश्मन से
दुश्मनी के लिए
जो बे-अमल है वो बदला
किसी से क्या लेगा
मैं उस का हो नहीं सकता
बता न देना उसे
लकीरें हाथ की अपनी वो
सब जला लेगा
हज़ार तोड़ के आ जाऊँ
उस से रिश्ता 'वसीम'
मैं जानता हूँ वो जब
चाहेगा बुला लेगा
*
कुछ इतना ख़ौफ़ का
मारा हुआ भी प्यार न हो
वो ए'तिबार दिलाए
और ए'तिबार न हो
हवा ख़िलाफ़ हो मौजों
पे इख़्तियार न हो
ये कैसी ज़िद है कि दरिया
किसी से पार न हो
मैं गाँव लौट रहा
हूँ बहुत दिनों के बाद
ख़ुदा करे कि उसे
मेरा इंतिज़ार न हो
ज़रा सी बात पे घुट घुट
के सुब्ह कर देना
मिरी तरह भी कोई मेरा
ग़म-गुसार न हो
दुखी समाज में आँसू भरे
ज़माने में
उसे ये कौन बताए कि अश्क-बार
न हो
गुनाहगारों पे उँगली
उठाए देते हो
'वसीम' आज कहीं तुम भी
संगसार न हो
*
शाम तक सुब्ह की नज़रों
से उतर जाते हैं
इतने समझौतों पे जीते
हैं कि मर जाते हैं
फिर वही तल्ख़ी-ए-हालात
मुक़द्दर ठहरी
नश्शे कैसे भी हों कुछ
दिन में उतर जाते हैं
इक जुदाई का वो लम्हा
कि जो मरता ही नहीं
लोग कहते थे कि सब
वक़्त गुज़र जाते हैं
घर की गिरती हुई दीवारें
ही मुझ से अच्छी
रास्ता चलते हुए लोग
ठहर जाते हैं
हम तो बे-नाम इरादों
के मुसाफ़िर हैं 'वसीम'
कुछ पता हो तो बताएँ
कि किधर जाते हैं
वसीम बरेलवी
No comments:
Post a Comment