Wednesday, August 27, 2025

अश्क, आँसू (शेर, शायरी)

*

क्या दुख है समुंदर को बता भी नहीं सकता

आँसू की तरह आँख तक भी नहीं सकता

 

तू छोड़ रहा है तो ख़ता इस में तिरी क्या

हर शख़्स मिरा साथ निभा भी नहीं सकता

 

प्यासे रहे जाते हैं ज़माने के सवालात

किस के लिए ज़िंदा हूँ बता भी नहीं सकता

 

घर ढूँड रहे हैं मिरा रातों के पुजारी

मैं हूँ कि चराग़ों को बुझा भी नहीं सकता

 

वैसे तो इक आँसू ही बहा कर मुझे ले जाए

ऐसे कोई तूफ़ान हिला भी नहीं सकता

 

-वसीम बरेलवी

**

आँख कम-बख़्त से उस बज़्म में आँसू रुका

एक क़तरे ने डुबोया मुझे दरिया हो कर

 

हफ़ीज़ जालंधरी

*

एक आँसू भी हुकूमत के लिए ख़तरा है

तुम ने देखा नहीं आँखों का समुंदर होना

 

मुनव्वर राना

*

मुद्दत के बा' उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह

जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

 

कैफ़ी आज़मी

*

एक आँसू ने डुबोया मुझ को उन की बज़्म में

बूँद भर पानी से सारी आबरू पानी हुई

 

शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

*

शबनम ने रो के जी ज़रा हल्का तो कर लिया

ग़म उस का पूछिए जो आँसू बहा सके

 

सलाम संदेलवी

*

कोई मंज़िल नहीं मिलती तो ठहर जाते हैं

अश्क आँखों में मुसाफ़िर की तरह आते हैं

 

कफ़ील आज़र अमरोहवी 

No comments: