Wednesday, August 27, 2025

गुलज़ार (शेर, शायरी)

 

*

दिल पर दस्तक देने कौन निकला है

किस की आहट सुनता हूँ वीराने में

*

एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है

मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की

*

जब भी ये दिल उदास होता है

जाने कौन आस-पास होता है

*

अपने माज़ी की जुस्तुजू में बहार

पीले पत्ते तलाश करती है

*

दिन कुछ ऐसे गुज़ारता है कोई

जैसे एहसाँ उतारता है कोई

*

ज़िंदगी पर भी कोई ज़ोर नहीं

दिल ने हर चीज़ पराई दी है

*

उसी का ईमाँ बदल गया है

कभी जो मेरा ख़ुदा रहा था

*

ज़ख़्म कहते हैं दिल का गहना है

दर्द दिल का लिबास होता है

 

-गुलज़ार

*

कल का हर वाक़िआ तुम्हारा था

आज की दास्ताँ हमारी है

*

कितनी लम्बी ख़ामोशी से गुज़रा हूँ

उन से कितना कुछ कहने की कोशिश की

*

आदतन तुम ने कर दिए वादे

आदतन हम ने ए'तिबार किया

*

कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है

ज़िंदगी एक नज़्म लगती है

*

हाथ छूटें भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते

वक़्त की शाख़ से लम्हे नहीं तोड़ा करते

*

तुम्हारे ख़्वाब से हर शब लिपट के सोते हैं

सज़ाएँ भेज दो हम ने ख़ताएँ भेजी हैं

*

मैं चुप कराता हूँ हर शब उमडती बारिश को

मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है

*

ख़ुशबू जैसे लोग मिले अफ़्साने में

एक पुराना ख़त खोला अनजाने में

-गुलज़ार

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

No comments: