Wednesday, August 27, 2025

चराग़, अंधेरा, रौशनी, चिराग (शेर, शायरी)

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शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है

सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से


एहतिशाम अख्तर

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रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

कुछ दिए ऐसे जले हर-सू अंधेरा हो गया


आज़ाद गुलाटी

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इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया

जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है


नूह नारवी

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कुछ अँधेरा  सा  हर  तरफ  छाया  

खुल  गया  जब  बरस के  वो  बादल 

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रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा

एक आदत है जिए जाना भी


कैफ़ी आज़मी

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आ गए हो तो उजाला है मिरी दुनिया में

जाओगे तुम तो अंधेरा ही अंधेरा होगा


लैस क़ुरैशी

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अँधेरों की शिकायत क्या अँधेरे फिर अँधेरे हैं

उजाले भी सितम इस दौर में कुछ कम नहीं करते


आज़ाद गुरदासपुरी

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जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता


वसीम बरेलवी

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रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी

देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है


वसीम बरेलवी

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शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को

ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का


दाग़ देहलवी

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दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से

इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से


महताब राय ताबां

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इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं


ज़ेहरा निगाह

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रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़

कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है


इरफ़ान सिद्दीक़ी

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एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा

उस के बा'द तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है


इफ़्तिख़ार आरिफ़

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कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र

शहर के सारे चराग़ों को हवा जानती है


अहमद फ़राज़

































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