Wednesday, August 27, 2025

आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर

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आइना देख कर तसल्ली हुई

हम को इस घर में जानता है कोई


गुलज़ार

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आसमाँ अपने इरादों में मगन है लेकिन

आदमी अपने ख़यालात लिए फिरता है


अनवर मसूद

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देखा न कोहकन कोई फ़रहाद के बग़ैर

आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर


अज्ञात

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किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


अहमद फ़राज़

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किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को

काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के


आदिल मंसूरी

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