Wednesday, August 27, 2025

कैफ़ी आज़मी (शेर, शायरी, ग़ज़ल)

 *

इतना तो ज़िंदगी में किसी के ख़लल पड़े

हँसने से हो सुकून रोने से कल पड़े

 

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

 

इक तुम कि तुम को फ़िक्र--नशेब--फ़राज़ है

इक हम कि चल पड़े तो बहर-हाल चल पड़े

 

साक़ी सभी को है ग़म--तिश्ना-लबी मगर

मय है उसी की नाम पे जिस के उबल पड़े

 

मुद्दत के बा' उस ने जो की लुत्फ़ की निगाह

जी ख़ुश तो हो गया मगर आँसू निकल पड़े

*

गर डूबना ही अपना मुक़द्दर है तो सुनो

डूबेंगे हम ज़रूर मगर नाख़ुदा के साथ

-कैफ़ी आज़मी

*

जिस तरह हँस रहा हूँ मैं पी पी के गर्म अश्क

यूँ दूसरा हँसे तो कलेजा निकल पड़े

*

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले

उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

*

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे

फिर वहीं लौट के जाता हूँ

 

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे

फिर वहीं लौट के जाता हूँ

 

बार-हा तोड़ चुका हूँ जिन को

उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ

 

रोज़ बसते हैं कई शहर नए

रोज़ धरती में समा जाते हैं

 

ज़लज़लों में थी ज़रा सी गर्मी

वो भी अब रोज़ ही जाते हैं

 

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत

कहीं धूप साया सराब

 

कितने अरमान हैं किस सहरा में

कौन रखता है मज़ारों का हिसाब

 

नब्ज़ बुझती भी भड़कती भी है

दिल का मामूल है घबराना भी

 

रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा

एक आदत है जिए जाना भी

 

क़ौस इक रंग की होती है तुलू

एक ही चाल भी पैमाने की

 

गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद

शक्ल क्या हो गई मय-ख़ाने की

 

कोई कहता था समुंदर हूँ मैं

और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

 

ख़ैरियत अपनी लिखा करता हूँ

अब तो तक़दीर में ख़तरा भी नहीं

 

अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ

कभी क़ुरआँ कभी गीता की तरह

 

चंद रेखाओं में सीमाओं में

ज़िंदगी क़ैद है सीता की तरह

 

राम कब लौटेंगे मालूम नहीं

काश रावण ही कोई जाता

 

-कैफ़ी आज़मी

*

बेलचे लाओ खोलो ज़मीं की तहें

मैं कहाँ दफ़्न हूँ कुछ पता तो चले

*

बहार आए तो मेरा सलाम कह देना

मुझे तो आज तलब कर लिया है सहरा ने

*

जो इक ख़ुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यूँ

यहाँ तो कोई मिरा हम-ज़बाँ नहीं मिलता

-कैफ़ी आज़मी

 *

*

कोई कहता था समुंदर हूँ मैं

और मिरी जेब में क़तरा भी नहीं

*

बस इक झिजक है यही हाल--दिल सुनाने में

कि तेरा ज़िक्र भी आएगा इस फ़साने में

*

इंसाँ की ख़्वाहिशों की कोई इंतिहा नहीं

दो गज़ ज़मीं भी चाहिए दो गज़ कफ़न के बाद

*

झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं

दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं

*

बस्ती में अपनी हिन्दू मुसलमाँ जो बस गए

इंसाँ की शक्ल देखने को हम तरस गए

*

कोई तो सूद चुकाए कोई तो ज़िम्मा ले

उस इंक़लाब का जो आज तक उधार सा है

*

रहने को सदा दहर में आता नहीं कोई

तुम जैसे गए ऐसे भी जाता नहीं कोई

 

-कैफ़ी आज़मी

 

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