Wednesday, August 27, 2025

राहत इंदौरी (शेर, शायरी)

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अजनबी ख़्वाहिशें सीने में दबा भी सकूँ

ऐसे ज़िद्दी हैं परिंदे कि उड़ा भी सकूँ

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तूफ़ानों से आँख मिलाओ सैलाबों पे वार करो
मल्लाहों का चक्कर छोड़ो तैर के दरिया पार करो

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ये सहारा जो नहीं हो तो परेशां हो जायें

मुश्किलें जान ही ले लें अगर आसां हो जायें..

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ये जो कुछ लोग फरिश्तों से बने फिरते हैं

मेरे हथ्ते कभी चढ़ जायें तो इनसां हो जायें...

-राहत इंदौरी

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अपनी हालत का ख़ुद एहसास नहीं है मुझ को

मैं ने औरों से सुना है कि परेशान हूँ मैं

आसी उल्दनी

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जितने अपने थेसब पराये थे,
हम हवा को गले लगाए थे.

जितनी कसमे थीसब थी शर्मिंदा,
जितने वादे थे
सर झुकाये थे.

जितने आंसू थेसब थे बेगाने,
जितने मेहमां थे
बिन बुलाए थे.

सब किताबें पढ़ी-पढ़ाई थीं,
सारे किस्से सुने-सुनाए थे.


एक बंजर जमीं के सीने में,
मैने कुछ आसमां उगाए थे.

सिर्फ दो घूंट प्यास कि खातिर,
उम्र भर धूप मे नहाए थे.

हाशिए पर खड़े हूए है हम,
हमने खुद हाशिए बनाए थे.

मैं अकेला उदास बैठा था,
सामने कहकहे लगाए थे.

है गलत उसको बेवफा कहना,
हम कौन सा धुले-धुलाए थे.

आज कांटो भरा मुकद्दर है,
हमने गुल भी बहुत खिलाए थे.
डॉ राहत इंदौरी

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जितने अपने थे, सब पराये थे,

हम हवा को गले लगाये थे,

है तेरा कर्ज मेरी आँखों पर,

तूने सपने बहुत दिखाए थे। 

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अगर ख़िलाफ़ हैं होने दो, जान थोड़ी है 
ये सब धुआँ है कोई आसमान थोड़ी है 

लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में 
यहाँ पे सिर्फ़ हमारा मकान थोड़ी है 

मैं जानता हूँ के दुश्मन भी कम नहीं लेकिन 
हमारी तरहा हथेली पे जान थोड़ी है 

हमारे मुँह से जो निकले वही सदाक़त है 
हमारे मुँह में तुम्हारी ज़ुबान थोड़ी है 

जो आज साहिबे मसनद हैं कल नहीं होंगे
किराएदार हैं ज़ाती मकान थोड़ी है 

सभी का ख़ून है शामिल यहाँ की मिट्टी में 
किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोड़ी है

 

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सिर्फ़ ख़ंजर ही नहीं आँखों में पानी चाहिए

ऐ ख़ुदा दुश्मन भी मुझ को ख़ानदानी चाहिए

-राहत इंदौरी

 

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हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते

जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते

 

अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है

उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते

 

अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के

जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते

 

रेंगने की भी इजाज़त नहीं हम को वर्ना

हम जिधर जाते नए फूल खिलाते जाते

 

मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था

तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते

 

मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद

लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते

 

हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे

कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते

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जवान आँखों के जुगनू चमक रहे होंगे
अब अपने गाँव में अमरुद पक रहे होंगे

भुलादे मुझको मगर, मेरी उंगलियों के निशान
तेरे बदन पे अभी तक चमक रहे होंगे

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जनाज़े पर मिरे लिख देना यारो

मोहब्बत करने वाला जा रहा है

राहत इंदौरी

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मेरी सांसो में जो समाया बहुत लगता है,

 वही शख्स मुझे पराया भी बहुत लगता है,

 उनसे मिलने की तमन्ना तो बहुत है मगर,

 आने-जाने में किराया ही बहुत लगता है.

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राज जो कुछ हो इशारों में बता भी देना,

हाथ जबसे मिलाना तो दबा भी देना

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हम अपनी जान के दुश्मन को अपनी जान कहते हैं,

मोहब्बत की इसी मिट्टी को हिंदुस्तान कहते हैं।

जो ये दीवार का सुराख है, साजिश का हिस्सा है।

मगर हम इसको अपने घर का रोशनदान कहते हैं।

फिर उसके बाद चाहे ये जुबा क टती है कट जाए,

हमे जो कुछ भी कहना है अलल-एलान कहते हैं’।

 

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वजन ज्यादा है ताकत का उठाकर ही रहेंगे हम,

जो कहा कर दिया तुमसे निभाकर ही रहेंगे हम।

हमे तुमसे मोहब्बत है, तुम्हे हमसे मोहब्बत है।

मोहब्बत किसे कहते हैं बताकर रहेंगे’

-रुपेश सक्सेना

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‘बीमारी इश्क में दिल की दवा के साथ आयी हूं

मोहब्बत की अनोखी सी अदा के साथ आयी हूं।

महकने लग गई बनारस की हर गली,

क्योंकि मैं नैनीताल की ताजी हवा के साथ आयी हूं’।

- गौरी मिश्रा

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‘उसे पाने की ख्वाहिश जिहादियों की तरह,

मुहब्बत है मेरी मुकाम आंधियों की तरह।

है मेरी जान तो कश्मीर की कली जैसी,

उसके भाई है सब अलगाववादियों की तरह।’

- दमदार बनारसी

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जो दुनिया को सुनाई दे उसे कहते हैं ख़ामोशी
जो आँखों में दिखाई दे उसे तूफ़ान कहते हैं

-राहत इंदौरी

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