Wednesday, August 27, 2025

अहमद फ़राज़ (शेर, शायरी, ग़ज़ल)

*

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे

तू बहुत देर से मिला है मुझे


तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल

हार जाने का हौसला है मुझे


दिल धड़कता नहीं टपकता है

कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे


हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं

इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे


कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'

सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे


*

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते

वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते


शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था

अपने हिस्से की कोई शम्अ' जलाते जाते


कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते


जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी

पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते


इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था

तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते


*

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ


तू भी हीरे से बन गया पत्थर

हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ


तू कि यकता था बे-शुमार हुआ

हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ


हम भी मजबूरियों का उज़्र करें

फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ


हम अगर मंज़िलें न बन पाए

मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ


देर से सोच में हैं परवाने

राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ


इश्क़ भी खेल है नसीबों का

ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ


अब के गर तू मिले तो हम तुझ से

ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ


बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'

क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ


*

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा


इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी

तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा


डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ

मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा


ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला

तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा


ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'

ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा


*

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें


ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें


तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें


आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर

क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें


अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'

जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें


*

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ


कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ


पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ


किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ


इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम

ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ


अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्‌म को तुझ से हैं उमीदें

ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए आ


*

तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ

मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ


मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल

मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ


तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं

बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ


ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं

कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ


तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं

याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ


बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू

मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ


मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर

ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ


तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर

और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ


ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू

और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूँ

*

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं


सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से

सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं


सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की

सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं


सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़

सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं


सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं


सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है

सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं


सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं

सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं


सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें

सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं


सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की

सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं


सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है

सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं


सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं

सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं


सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की

जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं


सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में

मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं


सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में

पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं


सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं


वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं

कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं


बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का

सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं


सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त

मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं


रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं

चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं


किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे

कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं


कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही

अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं


अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ

'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

*

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

 

सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से

सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

 

सुना है दर्द की गाहक है चश्म--नाज़ उस की

सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं

 

सुना है उस को भी है शेर शाइरी से शग़फ़

सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं

 

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

 

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है

सितारे बाम--फ़लक से उतर के देखते हैं

 

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं

सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

 

सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें

सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

 

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की

सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं

 

सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है

सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं

 

सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं

सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं

 

सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की

जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं

 

सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में

मिज़ाज और ही लाल गुहर के देखते हैं

 

सुना है चश्म--तसव्वुर से दश्त--इम्काँ में

पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं

 

सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं

 

वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल--मुराद नहीं

कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

 

बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का

सो रह-रवान--तमन्ना भी डर के देखते हैं

 

सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त

मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं

 

रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं

चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं

 

किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे

कभी कभी दर दीवार घर के देखते हैं

 

कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही

अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

 

अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ

'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

*

तेरे क़रीब के बड़ी उलझनों में हूँ

मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ

 

मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल

मैं संग--राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ

 

तू चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं

बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ

 

यार--ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं

कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ

 

तू लूट कर भी अहल--तमन्ना को ख़ुश नहीं

याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ

 

बदला मेरे बाद भी मौज़ू--गुफ़्तुगू

मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ

 

मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर

ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ

 

तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर

और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ

 

ख़ुद ही मिसाल--लाला--सेहरा लहू लहू

और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूँ

*

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए

फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए

 

कुछ तो मिरे पिंदार--मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए

 

पहले से मरासिम सही फिर भी कभी तो

रस्म--रह--दुनिया ही निभाने के लिए

 

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए

 

इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त--गिर्या से भी महरूम

राहत--जाँ मुझ को रुलाने के लिए

 

अब तक दिल--ख़ुश-फ़ह् को तुझ से हैं उमीदें

ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए

*

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा

 

इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी

तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

 

डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ

मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

 

ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला

तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा

 

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'

ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा

*

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

 

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

 

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

 

तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

 

आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर

क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

 

अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'

जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें


 

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इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ

 

तू भी हीरे से बन गया पत्थर

हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

 

तू कि यकता था बे-शुमार हुआ

हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ

 

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें

फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ

 

हम अगर मंज़िलें न बन पाए

मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ

 

देर से सोच में हैं परवाने

राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ

 

इश्क़ भी खेल है नसीबों का

ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ

 

अब के गर तू मिले तो हम तुझ से

ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ

 

बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'

क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

*

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे

तू बहुत देर से मिला है मुझे

 

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल

हार जाने का हौसला है मुझे

 

दिल धड़कता नहीं टपकता है

कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे

 

हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं

इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

 

कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'

सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे

*

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते

वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते

 

शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था

अपने हिस्से की कोई शम्अ' जलाते जाते

 

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

 

जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी

पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते

 

इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था

तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते

-अहमद फ़राज़

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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