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क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो
तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो
आदिल मंसूरी
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यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली
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कटी हुई है ज़मीं कोह से समुंदर तक
मिला है घाव ये दरिया को रास्ता दे कर
अदीम हाशमी
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तू कभी इस शहर से हो कर गुज़र
रास्तों के जाल में उलझा हूँ मैं
आशुफ़्ता चंगेज़ी
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यक़ीनन रहबर-ए-मंज़िल कहीं पर रास्ता भूला
वगर्ना क़ाफ़िले के क़ाफ़िले गुम हो नहीं सकते
निसार इटावी
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मैं ख़ुद ही अपने तआक़ुब में फिर रहा हूँ अभी
उठा के तू मेरी राहों से रास्ता ले जा
लुत्फ़ुर्रहमान
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मैं उस की धुन में नए रास्ते पे जा निकली
दयार-ए-जाँ से मिरी रोज़ जो गुज़रता रहा
आबिदा करामत
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दिलचस्प हो गई तिरे चलने से रहगुज़र
उठ उठ के गर्द-ए-राह लिपटती है राह से
जलील मानिकपूरी
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