Wednesday, August 27, 2025

रास्ता, पथ, राह (शेर, शायरी)

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क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो

तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो


आदिल मंसूरी

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यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता

मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो


निदा फ़ाज़ली

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कटी हुई है ज़मीं कोह से समुंदर तक

मिला है घाव ये दरिया को रास्ता दे कर


अदीम हाशमी

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तू कभी इस शहर से हो कर गुज़र

रास्तों के जाल में उलझा हूँ मैं


आशुफ़्ता चंगेज़ी

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यक़ीनन रहबर-ए-मंज़िल कहीं पर रास्ता भूला

वगर्ना क़ाफ़िले के क़ाफ़िले गुम हो नहीं सकते


निसार इटावी

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मैं ख़ुद ही अपने तआक़ुब में फिर रहा हूँ अभी

उठा के तू मेरी राहों से रास्ता ले जा


लुत्फ़ुर्रहमान

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मैं उस की धुन में नए रास्ते पे जा निकली

दयार-ए-जाँ से मिरी रोज़ जो गुज़रता रहा


आबिदा करामत

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दिलचस्प हो गई तिरे चलने से रहगुज़र

उठ उठ के गर्द-ए-राह लिपटती है राह से


जलील मानिकपूरी








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