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जो जुर्म करते हैं, इतने बुरे नही होते,
सज़ा न देके अदालत बिगाड़ देती है |
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जुर्म आदम ने किया और नस्ल-ए-आदम को सज़ा
काटता हूँ ज़िंदगी भर मैं ने जो बोया नहीं
मुनीर नियाज़ी
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हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा
जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा
साहिर लुधियानवी
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क्या मौसमों के टूटते रिश्तों का ख़ौफ़ है
शीशे सजा लिए हैं सभी ने दुकान पर
सय्यद अारिफ़
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ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं
दाग़ देहलवी
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हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
आख़िर गुनाहगार हूँ काफ़र नहीं हूँ मैं
मिर्ज़ा ग़ालिब
*ते हैं, इतने बुरे नही होते, सज़ा न देके अ
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले
ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले
वो ताज़ा-दम हैं नए शो'बदे दिखाते हुए
अवाम थकने लगे तालियाँ बजाते हुए
ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा
मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था
मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं
इश्क़ में भी सियासतें निकलीं
क़ुर्बतों में भी फ़ासला निकला
मेरे सय्याद की तालीम की है धूम गुलशन में
यहां जो आज फंसता है वो कल सय्याद होता है
-अकबर इलाहाबादी
बागबां ने यह अनोखा सितम ईजाद किया
आशियां फूक के पानी को बहुत याद किया
-चकबस्त
शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं
-अदम
कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
-दुष्यंत कुमार
कच्चे मकान जिनके जले थे फसाद में
अफसोस उनका नाम ही बलवाइयों में था
-नईम 'जज्बी'
जंग में कत्ल सिपाही होंगे
सुर्खरू जिल्ले-इलाही होंगे
-'मौज' रामपुरी
यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा
-दुष्यंत कुमार
कैसे कैसे हैं रहबर हमारे
कभी इस किनारे, कभी उस किनारे
-'राज' इलाहाबादी
खैर हो उस मुसाफिर की जिसके लिए
आज हर राहजन पासबां बन गया
-वामिक जौनपुरी
मस्जिद की अजां हो कि शिवाले का गजर हो
अपनी तो ये हसरत है कि किसी तरह सहर हो
-कतील शिफाई
ऐ काफिले वालो, तुम इतना भी नहीं समझे
लूटा तुम्हें रहजन ने, रहबर के इशारे पर
-तरन्नुम कानपुरी
गर अम्न की खतिर हो तो जंग है बेहतर
गर जंग हो मकसद तो सियासत नहीं अच्छी
-राज नोमानी
जो बागबां फूलों का वफादार नहीं है
गुलशन की हिफाजत का वो हकदार नहीं
-फिरोज राहत
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
-बशीर 'बद्र'
जितने भी लफ्ज हैं वो महकते गुलाब हैं
लहजे के फर्क से इन्हें तलवार मत बना
-'कतील' शिफाई
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