Wednesday, August 27, 2025

किताब, पुष्तक (शेर, शायरी)

*

काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के

दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया


बशीर बद्र

*

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं

अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश


अज्ञात

*

तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू

किताब-ख़्वाँ है मगर साहिब-ए-किताब नहीं


अल्लामा इक़बाल

*

कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए

कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे


हस्तीमल हस्ती

*

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ

पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में


शकेब जलाली

*

खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी

किताब मेरी थी रंग-ए-किताब उस का था


वज़ीर आग़ा

*

जिस्म तो ख़ाक है और ख़ाक में मिल जाएगा

मैं बहर-हाल किताबों में मिलूँगा तुम को


होश नोमानी रामपुरी

*

चूम लूँ मैं वरक़ वरक़ उस का

तेरे चेहरे से जो किताब मिले


सदा अम्बालवी

*

भूखे  बच्चों  के  लिए  बेच  दिया  रद्दी  में , 

जिन  किताबों   से   मुझे  इल्मे  हुनर  आया  है.














No comments: