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काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
बशीर बद्र
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किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं
अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश
अज्ञात
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तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू
किताब-ख़्वाँ है मगर साहिब-ए-किताब नहीं
अल्लामा इक़बाल
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कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए
कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे
हस्तीमल हस्ती
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रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ
पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में
शकेब जलाली
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खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी
किताब मेरी थी रंग-ए-किताब उस का था
वज़ीर आग़ा
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जिस्म तो ख़ाक है और ख़ाक में मिल जाएगा
मैं बहर-हाल किताबों में मिलूँगा तुम को
होश नोमानी रामपुरी
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चूम लूँ मैं वरक़ वरक़ उस का
तेरे चेहरे से जो किताब मिले
सदा अम्बालवी
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भूखे बच्चों के लिए बेच दिया रद्दी में ,
जिन किताबों से मुझे इल्मे हुनर आया है.
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