Wednesday, August 27, 2025

मजरूह सुल्तानपुरी (शेर, शायरी)

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अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम

उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम


मजरूह सुल्तानपुरी

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बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने

ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके

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बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते

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देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

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दिल की तमन्ना थी मस्ती में मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता हम भी बहकते चलते चलते

मजरूह सुल्तानपुरी

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