आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
दिल की बेताबी नहीं ठहरने देती है मुझे दिन कहीं रात कहीं सुब्ह कहीं शाम कहीं!
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