Sunday, April 5, 2020

दीप जलाएँ

दीप जगमगा उठे हैं प्रेम और प्रीत के।
संयम-समर्पण के, अपनों की जीत के।
दंभ-द्वेष द्वार खड़ा दर्प को पुकारता, 
किन्तु मन का धैर्य धर्म नीति को संवारता,
भेदभाव भूल, भाव समझो मनमीत के।
दीप जगमगा उठे हैं प्रेम और प्रीत के ।
- शीतल वाजपेयी

हर एक दर पे सितारों को चल बिछाते हैं,
हर एक छत पे नए चांद चल उगाते हैं,
मशाल हौसलों की मिल के सब उठाते हैं,
घने तिमिर को दिलों से चलो हटाते हैं,
वतन पुकारता अपने तुझे बुलाते हैं,
दिये उम्मीद के आओ कि अब जलाते है।
- मनीष मीत

आ गई है विश्व में संध्या शिथिल सी
हर्ष की मृदु लालिमा अवसाद में भीगी हुई है
मुक्ति की अवधारणा आ कर खड़ी है द्वार पर फिर
प्राण है संशय में कि किस वाद में भीगी हुई है
विचारों के वृक्ष का फलना ज़रूरी हो गया है 
इसलिए फिर दीप का जलना ज़रूरी हो गया है

दीप जो कि नेह राशि के तरल से
कालिमा को फिर चुनोती दे सकेगा
स्वयं के तल में तिमिर को कैद कर के
धरा को इक धवल ज्योती दे सकेगा
अंधेरों के अस्त्र का गलना ज़रूरी हो गया है
इसलिए फिर दीप का जलना ज़रूरी हो गया है

विश्व के बन्धुत्व में हम बद्ध हो कर
मनुजता को बचा कर बचते रहेंगे
राष्ट्र ने हमको सिखाया है यही कि
युगों तक इतिहास को रचते रहेंगे
पर नीतिवश इस युद्ध से टलना ज़रूरी हो गया है
इसलिए फिर दीप का जलना ज़रूरी हो गया है
- अशोक चारण

मन हार गया तन हार गया
मधुवन का चंदन हार गया 
इन झंझावातों में फँस कर
मानव का जीवन हार गया 
नवसंचार प्राण वायु का अब तो ईश्वर को करना होगा
तीन लोक का जो तम हर ले, उस दीपक को जलना होगा 
दूजे का दुख तुम हर के देखो
खुशियों का दीपक धर के देखो 
चलो दिखायें संग हैं हम सब
कल्याण भाव मन भर के देखो
प्रेमभाव, सुख, स्वास्थ्य को अब जन जन के मन में पलना होगा
तीन लोक का जो तम हर ले, उस दीपक को जलना होगा

- शिखा सिंह ऊर्जिता

छाया है चारों ओर अंधेरा दुनिया में।
फैला मौतों का शोर पूरी दुनिया में।।
अविश्वास,अज्ञानता है दुनिया में।
टूट रही सांसों की डोर दुनिया में।।
मानव जीवन बच जाए इस दुनिया में।
भारत करता है ऐलान दुनिया में।।
पूरा भारत रौशन हो इन दीपों से।
मिट जाए सारा अंधकार दुनिया में।
- भारतेंदु पुरी

सब जन मिलकर दीप जलाओ
 कोई छुटी ना देहरी हो
 कोना कोना उज्जवल हो जाए
 ये लौ बहुत घनघोरी हो
 दिवाली सी चहुओर मन जाए
 इतनी श्रद्धा सबूरी हो
 समय का सबको ध्यान रहे
 इसमें तनिक ना देरी हो
- शिवानी सोलंकी

हम अभी हारे नहीं हैं
माना तिमिर घनघोर है
पर हम अभी हारे नहीं हैं

ज्ञात पर चिंतन करें अज्ञात से भयभीत कब हम 
आत्मा की शक्ति संचित करके हैं विचलित नहीं हम 
कोटि दीपक हम जलाकर काल को ऐसे भगाएंँ 
भूमि क्या पाताल में भी तमस् के कण रह न पाएं

है घड़ी संकट की फिर भी
नयन जल खारे नहीं हैं

आज राजा ने हमारे मन में फिर शक्ति जगाई 
हम हुए एकांँतवासी इसलिए ज्योति जलाई
दीप छोटे ही सही प्रभु की कृपा से जोड़ देंगे
रोशनी की इस नदी में आचमन नौ ग्रह करेंगे

हैं सभी सन्नद्ध रण में
अवसाद के मारे नहीं हैं

देवदूतों से बने यह डॉक्टर ,नर्सें ,पुलिस हैं 
ले हथेली जान अपनी पत्रकारी जन हुलिस हैं
हो अकेले तुम नहीं उल्लास भर संदेश देकर 
राष्ट्र गौरव गान गायें हाथ अनगिन दीप लेकर

देह से होकर पृथक भी मन से हम न्यारे नहीं हैं

- डॉ मंजु लता श्रीवास्तव 

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