Sunday, April 5, 2020

इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं

एक तारा एक दीपक एक जुगनू ही सही
रात की दीवार में कोई तो दर बाक़ी रहे
- शफ़ीक़ सलीमी

इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
- बशीर बद्र

दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है
चले आओ जहाँ तक रौशनी मा'लूम होती है
- नुशूर वाहिदी

शब को मय ख़ूब सी पी सुब्ह को तौबा कर ली
रिंद के रिंद रहे हाथ से जन्नत न गई
- जलील मानिकपूरी

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