लाख भुलाना चाहा, मगर भूला न सके!
ये गम नहीं कि हुए हम, इस कदर रुसवा,
मलाल ये है कि, जगह तुम्हारे दिल में पा न सके!
तुम मिल गए थे, मगर मिलके क्या हुआ हासिल,
दिल से दिल मिले, रूह से रूह मिला न सके!!
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं
सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो
वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो
- द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी