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Friday, July 31, 2020

अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं 
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं 

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं 

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की 
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं 


आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे 
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं 

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ 
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं 

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें 
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं! 

Sunday, April 17, 2011

बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

- द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

Monday, August 16, 2010

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है


वक्त आने दे बता देंगे तुझे ए आसमान,
हम अभी से क्या बतायें क्या हमारे दिल में है


करता नहीं क्यूँ दूसरा कुछ बातचीत,
देखता हूँ मैं जिसे वो चुप तेरी महफ़िल में है


रहबरे राहे मुहब्बत, रह न जाना राह में
लज्जते-सेहरा न वर्दी दूरिए-मंजिल में है


अब न अगले वलवले हैं और न अरमानों की भीड़
एक मिट जाने की हसरत अब दिले-बिस्मिल में है ।


ए शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तेरे ऊपर निसार,
अब तेरी हिम्मत का चरचा गैर की महफ़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


खैंच कर लायी है सब को कत्ल होने की उम्मीद,
आशिकों का आज जमघट कूचा-ए-कातिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


है लिये हथियार दुशमन ताक में बैठा उधर,
और हम तैय्यार हैं सीना लिये अपना इधर,
खून से खेलेंगे होली गर वतन मुश्किल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


हाथ जिन में हो जुनून कटते नही तलवार से,
सर जो उठ जाते हैं वो झुकते नहीं ललकार से,
और भड़केगा जो शोला-सा हमारे दिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


हम तो घर से निकले ही थे बाँधकर सर पे कफ़न,
जान हथेली पर लिये लो बढ चले हैं ये कदम.
जिन्दगी तो अपनी मेहमान मौत की महफ़िल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


यूँ खड़ा मकतल में कातिल कह रहा है बार-बार,
क्या तमन्ना-ए-शहादत भी किसी के दिल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


दिल में तूफ़ानों की टोली और नसों में इन्कलाब,
होश दुश्मन के उड़ा देंगे हमें कोई रोको ना आज
दूर रह पाये जो हमसे दम कहाँ मंज़िल में है
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है


वो जिस्म भी क्या जिस्म है जिसमें ना हो खून-ए-जुनून
तूफ़ानों से क्या लड़े जो कश्ती-ए-साहिल में है,
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ुए कातिल में है |

- राम प्रसाद बिस्मिल


Wednesday, September 16, 2009

Dunia Meri

ऊपर अम्बर नीचे जमीन है,
इतना बड़ा घर कोई नहीं है.
फूल पवन और बादल पंछी,
दुनिया मेरी नयी नयी है..

Sunday, August 9, 2009

बूँदें

गुनगुनाती हुई आती है फ़लक से बूँदें |
शायद कोई बदली तेरे पाजेब से टकराई है ||

Thursday, July 9, 2009

Daali Daali

डाली डाली पे नजर डाली,
किसी ने अच्छी तो किसी ने बुरी डाली.
मगर जिस डाली पे मैंने नज़र डाली,
कमबख्त माली ने काट डाली !!

Tuesday, July 7, 2009

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है..

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है |

मैं तुझसे दूर कैसा हुँ तू मुझसे दूर कैसी है,

ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है ||



समुन्दर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता,

ये आसूँ प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता |

मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले,

जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता ||



मुहब्बत एक एह्सासों की पावन सी कहानी है,

कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है |

यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूँ हैं,

जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है ||



भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हँगामा,

हमारे दिल में कोई ख्वाब पला बैठा तो हँगामा |

अभी तक डूब कर सुनते थे हम किस्सा मुहब्बत का,

मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हँगामा ||

- डॉ कुमार विश्वास