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Friday, July 31, 2020

अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं 
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं 

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं 

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की 
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं 


आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे 
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं 

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ 
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं 

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें 
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं! 

Thursday, March 19, 2020

शेर गजल शायरी

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए 
- जाँ निसार अख़्तर

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में 
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता 
- बशीर बद्र

छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में 
ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता 
- प्रेम भण्डारी

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए 
शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी 
- निदा फ़ाज़ली

मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने 
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया 
- मीर तक़ी मीर
डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

ज़िंदगी भर की कमाई यही मिसरे दो-चार 
इस कमाई पे तो इज़्ज़त नहीं मिलने वाली 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
इश्क़ जिस से न हो सका उस ने
शायरी में अजब सियासत की
- सलीम कौसर

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए 
मगर सितम है कि सब को सुनाना पड़ता है 
- अज़हर इनायती

'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी 
जो हुस्न है बुतों में जो मस्ती शराब में 
- असग़र गोंडवी
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर 
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

जागीर अपनी शायरी पहले से थी मगर
इक उम्र जब रियाज़ किया साहिरी मिली
- साहिर होशियारपुरी

तुम्हारा 'नुशूर' और तुम्हारा तख़य्युल
मोहब्बत तुम्हारी तो शायर तुम्हारा
- नुशूर वाहिदी
कभी शराब कभी शायरी कभी महफ़िल
फिर इस के बाद धड़कता हुआ अकेला दिल
- जावेद नासिर

शायरी करते रहो लेकिन रहे इतना ख़याल
दुश्मनों से दोस्ती का हौसला बाक़ी रहे
- सरवर उस्मानी
शायर थे बंद एक सिनेमा के हाल में
पंछी फँसे हुए थे शिकारी के जाल में
- दिलावर फ़िगार

किसी खिड़की का शीशा भी नहीं टूटता
शायर अपना काम जारी रखते हैं मगर
- ज़ीशान साहिल

शेर गजल शायरी

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए 
- जाँ निसार अख़्तर

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में 
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता 
- बशीर बद्र

छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में 
ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता 
- प्रेम भण्डारी

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए 
शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी 
- निदा फ़ाज़ली

मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने 
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया 
- मीर तक़ी मीर
डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

ज़िंदगी भर की कमाई यही मिसरे दो-चार 
इस कमाई पे तो इज़्ज़त नहीं मिलने वाली 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
इश्क़ जिस से न हो सका उस ने
शायरी में अजब सियासत की
- सलीम कौसर

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए 
मगर सितम है कि सब को सुनाना पड़ता है 
- अज़हर इनायती

'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी 
जो हुस्न है बुतों में जो मस्ती शराब में 
- असग़र गोंडवी
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर 
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

जागीर अपनी शायरी पहले से थी मगर
इक उम्र जब रियाज़ किया साहिरी मिली
- साहिर होशियारपुरी

तुम्हारा 'नुशूर' और तुम्हारा तख़य्युल
मोहब्बत तुम्हारी तो शायर तुम्हारा
- नुशूर वाहिदी
कभी शराब कभी शायरी कभी महफ़िल
फिर इस के बाद धड़कता हुआ अकेला दिल
- जावेद नासिर

शायरी करते रहो लेकिन रहे इतना ख़याल
दुश्मनों से दोस्ती का हौसला बाक़ी रहे
- सरवर उस्मानी
शायर थे बंद एक सिनेमा के हाल में
पंछी फँसे हुए थे शिकारी के जाल में
- दिलावर फ़िगार

किसी खिड़की का शीशा भी नहीं टूटता
शायर अपना काम जारी रखते हैं मगर
- ज़ीशान साहिल

Wednesday, May 27, 2009

पुष्प की अभिलाषा

पुष्प की अभिलाषा

चाह नहीं मैं सुरबाला के
गहनों में गूथा जाऊँ
चाह नहीं प्रेमी माला में
बिंध प्यारी को ललचाऊँ

चाह नहीं सम्राटों के
शव पर हे हरि डाला जाऊँ
चाह नहीं देवों के सिर पर
चढूँ भाग्य पर इतराऊँ

मुझे तोड़ लेना बनमाली
उस पथ पर तुम देना फेंक
मातृभूमि पर शीश चढ़ाने
जिस पथ जाएँ वीर अनेक

- माखनलाल चतुर्वेदी

Wednesday, February 4, 2009

सोचा न tha

सोचा न था दिलको कुछ हो जाएगा,
संभाला था जिसे अब तक वो खो जायेगा.
इस तरह से जिंदगी में आओगी तुम,
मदहोश हो के दिल तुझमें ही खो जाएगा..