वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा,
निशान जिसका अक़्सा-ए-आलम में पहुँचा।मुज़ाहिम हुआ कोई ख़तरा न जिसका,
न ओमान में ठिटका, न क़ुल्ज़ुम में झिझका।
किए पार जिसने सातों समंदर,
वो डूबा दहाने में गंगा के आकर।
-अल्ताफ़ हुसैन हाली
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
वो दीने-हिजाज़ी का बेबाक बेड़ा,
निशान जिसका अक़्सा-ए-आलम में पहुँचा।