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Sunday, April 17, 2011

बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

साथ में ध्वजा रहे
बाल दल सजा रहे
ध्वज कभी झुके नहीं
दल कभी रुके नहीं

सामने पहाड़ हो
सिंह की दहाड़ हो
तुम निडर,हटो नहीं
तुम निडर,डटो वहीं

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

प्रात हो कि रात हो
संग हो न साथ हो
सूर्य से बढ़े चलो
चन्द्र से बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो
धीर तुम बढ़े चलो

- द्वारिकाप्रसाद माहेश्वरी

Sunday, August 9, 2009

बूँदें

गुनगुनाती हुई आती है फ़लक से बूँदें |
शायद कोई बदली तेरे पाजेब से टकराई है ||

Tuesday, July 7, 2009

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है..

कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है,

मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है |

मैं तुझसे दूर कैसा हुँ तू मुझसे दूर कैसी है,

ये मेरा दिल समझता है या तेरा दिल समझता है ||



समुन्दर पीर का अंदर है लेकिन रो नहीं सकता,

ये आसूँ प्यार का मोती है इसको खो नहीं सकता |

मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना मगर सुन ले,

जो मेरा हो नहीं पाया वो तेरा हो नहीं सकता ||



मुहब्बत एक एह्सासों की पावन सी कहानी है,

कभी कबीरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है |

यहाँ सब लोग कहते है मेरी आँखों में आसूँ हैं,

जो तू समझे तो मोती है जो न समझे तो पानी है ||



भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हँगामा,

हमारे दिल में कोई ख्वाब पला बैठा तो हँगामा |

अभी तक डूब कर सुनते थे हम किस्सा मुहब्बत का,

मैं किस्से को हक़ीक़त में बदल बैठा तो हँगामा ||

- डॉ कुमार विश्वास