Wednesday, March 18, 2020

दिल मिले शायरी

दिल की बात न दिल में रखना
कह देना गर दिल मिले तो
- हबीब कैफ़ी


किसी घराने किसी ज़ात से नहीं मतलब
ये हम भी जानते हैं दिल मिले ख़याल मिले
- कविता किरन

मसल सुनी है कि मिलने से कोई मिलता है
मिलो तो आँख मिले दिल मिले निगाह मिले
- दाग़ देहलवी


वैसे तो आसान नहीं था खुलना बंद किवाड़ों का
दाख़िल होना दिल में लेकिन दस्तक से आसान हुआ
- देवमणि पांडेय

हर एक शख़्स से मिलना कहाँ मुनासिब था
मिले उन्हीं से जहाँ दिल मिले ख़याल मिले
- सलीम शुजाअ अंसारी


इन पुतलियों का क़र्ज़ चुकाता हूं क्या करूं
बस दिल से दिल मिलाता हूं जब देखता हूं मैं
- शाहीन अब्बास

दिल में लाते नहीं दुश्मन से भी नफ़रत का ख़याल
इस से कम कोई इबादत नहीं हम कर सकते
- जलील ’आली’


दिल में लाखों दाग़ रौशन हो गए
इश्क़ को शमाएं जलानी आ गईं
- नूह नारवी

जब दिल से दिल मिल जाते हैं तो क्या क्या गुल खिल जाते हैं
कुछ ग़ैर गले लग जाते हैं कुछ अपनों से अन-बन होती है
- अख़्तर आज़ाद


जब दिल से दिल मिल जाता है वो दौर-ए-मोहब्बत आह न पूछ
कुछ और ही दिन हो जाते हैं कुछ और ही रातें होती हैं
- शमीम जयपुरी

ये सब कहने की बातें हैं कि ऐसा हो नहीं सकता
मोहब्बत में जो दिल मिल जाए फिर क्या हो नहीं सकता
- हफ़ीज़ जौनपुरी


नज़र मिलाते नहीं मुस्कुराए जाते हैं
बताओ यूँ भी कहीं दिल मिलाए जाते हैं
- रियासत अली ताज

इश्क़, खामोशी,आंखें और जुदाई शायरी

चले आओ जहां तक रौशनी मालूम होती है... 
दिया ख़ामोश है लेकिन किसी का दिल तो जलता है 
चले आओ जहां तक रौशनी मालूम होती है 

नुशूर वाहिदी
कोई काम भी नहीं आता...
करूंगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम 
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता 
ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर
तरसे हैं पानी के लिए... 
टूट पड़ती थीं घटाएं जिन की आंखें देख कर 
वो भरी बरसात में तरसे हैं पानी के लिए 

सज्जाद बाक़र रिज़वी
जो उतरने वाले थे... 
तमाम रात नहाया था शहर बारिश में 
वो रंग उतर ही गए जो उतरने वाले थे 

जमाल एहसानी
इबादत में ख़लल पड़ता है...
उस की याद आई है सांसो ज़रा आहिस्ता चलो 
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है 
राहत इंदौरी
को निभाते हुए मर जाते हैं... 
हम हैं सूखे हुए तालाब पे बैठे हुए हंस 
जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं 

अब्बास ताबिश
कुछ कांपता रह गया...
आते आते मिरा नाम सा रह गया 
उसके होंठों पे कुछ कांपता रह गया 
वसीम बरेलवी
ख़ुदा भी नहीं...
किसी के तुम हो किसी का ख़ुदा है दुनिया में 
मिरे नसीब में तुम भी नहीं ख़ुदा भी नहीं 
अख़्तर सईद ख़ान
मिरे नाम से जल जाते हैं... 
जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ 
जाने क्यूं लोग मिरे नाम से जल जाते हैं 
क़तील शिफ़ाई
 
सिर्फ़ उस के होंठ काग़ज़ पर बना देता हूँ मैं 
ख़ुद बना लेती है होंठों पर हंसी अपनी जगह 
अनवर शऊर

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है

बा-हज़ारां इज़्तिराब ओ सद-हज़ारां इश्तियाक़
तुझ से वो पहले-पहल दिल का लगाना याद है

बार बार उठना उसी जानिब निगाह-ए-शौक़ का
और तिरा ग़ुर्फ़े से वो आंखें लड़ाना याद है

तुझ से कुछ मिलते ही वो बेबाक हो जाना मिरा
और तिरा दांतों में वो उंगली दबाना याद है

खींच लेना वो मिरा पर्दे का कोना दफ़अ'तन
और दुपट्टे से तिरा वो मुंह छुपाना याद है

जब सिवा मेरे तुम्हारा कोई दीवाना न था
सच कहो कुछ तुम को भी वो कार-ख़ाना याद है

ग़ैर की नज़रों से बच कर सब की मर्ज़ी के ख़िलाफ़
वो तिरा चोरी-छुपे रातों को आना याद है

आ गया गर वस्ल की शब भी कहीं ज़िक्र-ए-फ़िराक़
वो तिरा रो रो के मुझ को भी रुलाना याद है

दोपहर की धूप में मेरे बुलाने के लिए
वो तिरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है

आज तक नज़रों में है वो सोहबत-ए-राज़-ओ-नियाज़
अपना जाना याद है तेरा बुलाना याद है

मीठी मीठी छेड़ कर बातें निराली प्यार की
ज़िक्र दुश्मन का वो बातों में उड़ाना याद है

देखना मुझ को जो बरगश्ता तो सौ सौ नाज़ से
जब मना लेना तो फिर ख़ुद रूठ जाना याद है

बेरुखी के साथ सुनना दर्द-ए-दिल की दास्तां
और कलाई में तेरी वो कंगन घुमाना याद है

चोरी चोरी हम से तुम आ कर मिले थे जिस जगह
मुद्दतें गुज़रीं पर अब तक वो ठिकाना याद है

शौक़ में मेहंदी के वो बे-दस्त-ओ-पा होना तिरा
और मिरा वो छेड़ना वो गुदगुदाना याद है

बावजूद-ए-इद्दिया-ए-इत्तिक़ा 'हसरत' मुझे
आज तक अहद-ए-हवस का वो फ़साना याद है! 

Tuesday, March 17, 2020

धरती शायरी

प्यासी धरती जलती है
सूख गए बहते दरिया
- नासिर काज़मी

तुम हो फ़लक कब समझोगे
धरती क्या कुछ सहती है
- बिल्क़ीस ख़ान

पूछा जो सवाल आसमाँ से
धरती से जवाब आ रहा है
- करामत अली करामत


कहाँ जलता रहा धरती का सीना
कहाँ होती रही बरसात लिखना
- कँवल ज़ियाई
हिस्सा-बख़रे बाँट लिए हैं लोगों ने
बेचारे क्या करते धरती एक ही थी
- मुनीर सैफ़ी


फट रही है ये फिर से धरती क्यूँ
फिर से यज़्दाँ का क़हर आया है
- उज़ैर रहमान

पानियों और हवा पे लिख न सके
हम ने धरती पे नाम लिक्खा है
- हैरत फ़र्रुख़ाबादी


ख़ारज़ारों पे चलूँ नंगे पाँव
ख़ुश्क धरती की दुआ लूँ पानी
- अता आबिदी

पहले जो थी मेहरबाँ हम सब की माँ
अब वही धरती है बिकती दाम पर
- नासिर शहज़ाद


अँधेरे नोच रहे थे जमाल धरती का
मिरी ज़मीन का सूरज कहीं गया हुआ था
- मुमताज़ गुर्मानी

Monday, March 16, 2020

इश्क़ और हौसलों की हलचल शायरी

शहरयार 
शदीद प्यास थी फिर भी छुआ न पानी को 
मैं देखता रहा दरिया तिरी रवानी को 


सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का 
यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का 
आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा... 
तेरे वादे को कभी झूट नहीं समझूँगा 
आज की रात भी दरवाज़ा खुला रक्खूँगा 

सीने में जलन आँखों में तूफ़ान सा क्यूँ है 
इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यूँ है 
या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को... 
या तेरे अलावा भी किसी शय की तलब है 
या अपनी मोहब्बत पे भरोसा नहीं हम को 
मोहम्मद रफ़ी सौदा
जब यार ने उठा कर ज़ुल्फ़ों के बाल बाँधे 
तब मैं ने अपने दिल में लाखों ख़याल बाँधे 

न कर 'सौदा' तू शिकवा हम से दिल की बे-क़रारी का 
मोहब्बत किस को देती है मियाँ आराम दुनिया में 
 
लहू में ग़र्क़ सफ़ीना हो आश्नाई का... 
गिला लिखूँ मैं अगर तेरी बेवफ़ाई का 
लहू में ग़र्क़ सफ़ीना हो आश्नाई का 

साक़ी गई बहार रही दिल में ये हवस 
तू मिन्नतों से जाम दे और मैं कहूँ कि बस 
आग़ाज़ का अंजाम क्या होगा... 
तिरा ख़त आने से दिल को मेरे आराम क्या होगा 
ख़ुदा जाने कि इस आग़ाज़ का अंजाम क्या होगा 
राहत इंदौरी
शाख़ों से टूट जाएँ वो पत्ते नहीं हैं हम 
आँधी से कोई कह दे कि औक़ात में रहे 


आँख में पानी रखो होंटों पे चिंगारी रखो 
ज़िंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो
मगर नाटक पुराना चल रहा है... 
बहुत ग़ुरूर है दरिया को अपने होने पर 
जो मेरी प्यास से उलझे तो धज्जियाँ उड़ जाएँ  

नए किरदार आते जा रहे हैं 
मगर नाटक पुराना चल रहा है 
अँधेरे में निकल पड़ता है... 
रोज़ तारों को नुमाइश में ख़लल पड़ता है 
चाँद पागल है अँधेरे में निकल पड़ता है 
 
वसीम बरेलवी
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता 
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता 

तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों 
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है 
हर शख़्स तुम्हारी ही तरफ़ देख रहा है... 
तुम मेरी तरफ़ देखना छोड़ो तो बताऊँ 
हर शख़्स तुम्हारी ही तरफ़ देख रहा है 

तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं 
कि तू मिल भी अगर जाए तो अब मिलने का ग़म होगा 
चराग़ों का सफ़र कितना है... 
रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी 
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है 
शकील बदायुनी
चाहिए ख़ुद पे यक़ीन-ए-कामिल 
हौसला किस का बढ़ाता है कोई 

उन का ज़िक्र उन की तमन्ना उन की याद 
वक़्त कितना क़ीमती है आज कल 
गिरफ़्तार कर के छोड़ दिया... 
मुझे तो क़ैद-ए-मोहब्बत अज़ीज़ थी लेकिन 
किसी ने मुझ को गिरफ़्तार कर के छोड़ दिया 

जब हुआ ज़िक्र ज़माने में मोहब्बत का 'शकील' 
मुझ को अपने दिल-ए-नाकाम पे रोना आया
कुछ बात है जो शाम पे रोना आया...  
यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है 
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया  

Sunday, March 15, 2020

हिम्मत, हौसला शायरी

हिम्मत वाले पल में बदल देते हैं दुनिया को 
सोचने वाला दिल तो बैठा सोचा करता है 
-अकबर हैदराबादी

हिम्मत है तो बुलंद कर आवाज़ का अलम
चुप बैठने से हल नहीं होने का मसअला
- ज़िया जालंधरी

हार हो जाती है जब मान लिया जाता है 
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है 
- शकील आज़मी

नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर 
तू शाहीं है बसेरा कर पहाड़ों की चटानों में 
- अल्लामा इक़बाल

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से 
वो और थे जो हार गए आसमान से 
- फ़हीम जोगापुरी

लोग जिस हाल में मरने की दुआ करते हैं 
मैं ने उस हाल में जीने की क़सम खाई है 
- अमीर क़ज़लबाश
साहिल के सुकूँ से किसे इंकार है लेकिन 
तूफ़ान से लड़ने में मज़ा और ही कुछ है 
- आल-ए-अहमद सूरूर

कठिन है काम तो हिम्मत से काम ले ऐ दिल
बिगाड़ काम न मुश्किल समझ के मुश्किल को
- वहशत रज़ा अली कलकत्वी
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार 
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख 
- मजरूह सुल्तानपुरी

ज़रा दरिया की तह तक तो पहुँच जाने की हिम्मत कर
तो फिर ऐ डूबने वाले किनारा ही किनारा है
- बासित भोपाली

उसे गुमाँ है कि मेरी उड़ान कुछ कम है 
मुझे यक़ीं है कि ये आसमान कुछ कम है 
- नफ़स अम्बालवी
वक़्त की गर्दिशों का ग़म न करो 
हौसले मुश्किलों में पलते हैं 
- महफूजुर्रहमान आदिल

सिवाए मेरे किसी को जलने का होश कब था
चराग़ की लौ बुलंद थी और रात कम थी
- मुज़फ़्फ़र हनफ़ी
अपनी ही रवानी में बहता नज़र आता है
ये शहर बुलंदी से दरिया नज़र आता है
- इनाम नदीम

हाँ आसमान अपनी बुलंदी से होशियार
अब सर उठा रहे हैं किसी आस्ताँ से हम
- जोश मलीहाबादी

मैं कुछ बतलाऊँ - विरह की कविता


मैं कुछ बतलाऊँ.
इस व्यथित मन की
अपंग अभिलाषा तुम संग बैठ दोहराऊँ.
मेरे निस्तेज नयनों में
यूँ चमक का आ जाना
क्या इशारा नहीं कुछ पाने का
इन निस्पंदन अधरों पर आहट
और कलियों का यूँ चटक जाना
क्या संकेत नहीं तेरे आने का
है उड़ती धूल तुम्हारी ही
कहकर मैं इस मन को बहलाऊँ.
साँझ ढ़ले वो तारे हुए तो
हर भोर का वो फूल बने
मेरा अतरंग साथी वो ही
अब मेरे ह्रदय का शूल बने
विरह-वेदना के दंश
हर पल मैं चुपचाप सहलाऊँ.

Saturday, March 14, 2020

अधूरी सिसकियों में व्यक्त कर लेते है तुम्हें...

अधूरी सिसकियों में व्यक्त कर लेते है तुम्हें...
बात ये है कि बयाँ कैसे करूँ
एक औरत भी छिपी है मुझमें
अब किसी हाथ मे पत्थर भी नही?
और इक नेकी बची है मुझमें??
मेरे दिन भी कटते हैं स्याह रातों की तरह
मुझे सुरज से कोई ख़ास फायदा नहीं मिलता
कटोचती हिचकियों में अभ्यस्त कर लेते है तुम्हें,
अधूरी सिसकियों में व्यक्त कर लेते है तुम्हें।

मलहम सी कोई आवाज़ होती है
ख्याले दर्द महकने लगता है
बरखा मित्तल 
हुआ किस्सा है तमाम करीब सनम के...
वादी ए ज़ीस्त में किस्से आलम के
हम ही से है सिलसिले रंजो ग़म के
!!
पाई भी हमने औऱ खोई भी जिंदगी
कूचे में आकर बारहा अपने हमदम के
!!
पूछो न हमसे सिला वक़्त का कभी
हुआ किस्सा है तमाम करीब सनम के
!!
टुकड़े है वो मेरे ही दिल के यहां वहां
बने है जो गुल आज उनके चमन के
बरखा मित्तल 
स्त्री काया नही ह्रदय है...
स्त्रीत्व को छूना भी एक कला है,,,
स्त्री काया नही ह्रदय है,,,
हो सके तो स्त्रीत्व को छूना,,,,
बरखा मित्तल 
याद करते करते…
काश मुझे भी
सिखा देते तुम
भूल जाने का हुनर,
मैं थक गयी हूं
हर लम्हा हर सांस
तुम्हें
याद करते करते…
बरखा मित्तल 
शायद अब जिन्दगी भी समझ गई...
ऊंगलियों से उलझी ऊंगलियां 
और हर उलझन सुलझ गई
करती रही शिकायत जिन्दगी 
शायद अब जिन्दगी भी समझ गई
अजय सिंह 
कुछ रिश्ते ज़िन्दगी में...
रह गया बाक़ी बहुत
जो कह नहीं पाए।
था बहुत बाक़ी अभी
जिसे सुन नहीं पाए।
अनकहे और अनसुने,
संग साथ में चलते रहे।
कुछ रिश्ते ज़िन्दगी में,
हमने यूँ भी हैं,निभाए।।
नीति राठौर 
बस देखते रहना...
उसको देखना ,
और फिर ,
बस देखते रहना..।
ख़ुदा जाने कि,
ख़ैरियत अब,
कहते किसको हैं...?
नीति राठौर 
फ़ासला चलता रहा...
दरमियाँ उसके मेरे, एक,
फ़ासला चलता रहा।
पर सफ़र, उसका मेरा,
साथ में ,चलता रहा।
थी उसकी ,अपनी मंज़िलें ,
जो गुजरी ,मेरी राह से।
राब्ता,उसका मेरा,
बस फ़क़त ,इतना रहा।
एक सुकून की चाह में,
पल भर किसी एक,छाँव में।
हैं अक्सर, झुलसती ख्वाहिशें,
अजनबी ,एक राह में।
वो छूकर के ,बस गुज़र गया...
कोई, उसमें पूरा ढल गया,
वो छूकर के ,बस गुज़र गया ।
एक बेख़बर एहसास सा,
फिर,अपने जहाँ में रम गया।
जा के भी ,जाता नहीं ,
बाँधती ,कोई कशिश तो है।
वो कहे,या ना कहे,
जज़्बातों में ,जुम्बिश तो है।
पलकों के कोरों में नम,
लम्हा ,वो जो ठहरा रहा।
दरकी हुई, एक आस पर,
बूँद बूँद रिसता रहा।
बूँद बूँद रिसता रहा।।
नीति राठौर 
बूँद बूँद रिसता रहा...
लम्हा ,वो जो ठहरा रहा।
दरकी हुई, एक आस पर,
बूँद बूँद रिसता रहा।
बूँद बूँद रिसता रहा।।
नीति राठौर

कैसे मुझको भुला पाओगे

कभी तन्हाँ खामोश बैठोगे कभी मरस्थली आंखों से रो रो कर आंसू बहाओगे
रूह में उतर गया तेरे बेइंतहा मेरा इश्के दर्द का जहर अब कैसे मुझको भुला पाओगे

पूछेगा जब अपना तेरा कोई सबब हसीन सूरते हालात बदलने का
यकीनन उल्फत की वो गुजरी दास्ता मुस्कुरा मुस्करा कर भी खुद से ना छिपा पाओगे

अजीब सी चाहत होगी तेरी जिंदगी में जिंदा रह कर बार-बार जीने मरने की
एक तरफा होता नहीं है प्यार यह बात बावफा दिल के मेरे टुकड़े देखकर समझ जाओगे

तेरे तसव्वुर में होगी तस्वीरें यार जज्बातों में होगा उठते इश्के समुद्र का तूफान
थरथराते होठों से चाह कर भी मेरे नाम की चीखती सदा को न रोक पाओगे

हजारों खामियां नजर आती हैं मेरी इश्क दास्तान में यह माना मैने
सोचता हूं मुझे भूल जाने को एहसास ए मोहब्बत के चंद लम्हों की यादें कैसे जुदा कर पाओगे

गुलजार शायरी

कोई साया नहीं है आँखों में... 
साँस लेना भी कैसी आदत है 
जिए जाना भी क्या रिवायत है 
कोई आहट नहीं बदन में कहीं 
कोई साया नहीं है आँखों में 
जिए जाते हैं जिए जाते हैं... 
पाँव बेहिस हैं चलते जाते हैं 
इक सफ़र है जो बहता रहता है 
कितने बरसों से कितनी सदियों से 
जिए जाते हैं जिए जाते हैं 
रात-भर हम ने अलाव तापा... 
आदतें भी अजीब होती हैं 
रात-भर सर्द हवा चलती रही 
रात-भर हम ने अलाव तापा 
मैंने माज़ी से कई ख़ुश्क सी शाख़ें काटीं 
तुम ने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले... 
तुम ने भी गुज़रे हुए लम्हों के पत्ते तोड़े 
मैंने जेबों से निकालीं सभी सूखी नज़्में 
तुम ने भी हाथों से मुरझाए हुए ख़त खोले 
अपनी इन आँखों से मैंने कई माँजे तोड़े 
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे... 
और हाथों से कई बासी लकीरें फेंकीं 
तुम ने पलकों पे नमी सूख गई थी सो गिरा दी 
रात भर जो भी मिला उगते बदन पर हम को 
काट के डाल दिया जलते अलाव में उसे 
रात-भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हम ने... 
रात-भर फूँकों से हर लौ को जगाए रक्खा 
और दो जिस्मों के ईंधन को जलाए रक्खा 
रात-भर बुझते हुए रिश्ते को तापा हम ने 
फिर उभरता है, फिर से बहता है... 
आदमी बुलबुला है पानी का 
और पानी की बहती सतह पर 
टूटता भी है डूबता भी है 
फिर उभरता है, फिर से बहता है 
आदमी बुलबुला है पानी का... 
न समुंदर निगल सका इसको 
न तवारीख़ तोड़ पाई है 
वक़्त की हथेली पर बहता 
आदमी बुलबुला है पानी का 
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं... 
किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो 
न किसी शाख़ का साया है, न दीवार की टेक 
न किसी आँख की आहट, न किसी चेहरे का शोर 
दूर तक कोई नहीं, कोई नहीं, कोई नहीं 
अपनी तन्हाई लिए आप चलो, तन्हा अकेले... 
चंद क़दमों के निशाँ हाँ कभी मिलते हैं कहीं 
साथ चलते हैं जो कुछ दूर फ़क़त चंद क़दम 
और फिर टूट के गिर जाते हैं ये कहते हुए 
अपनी तन्हाई लिए आप चलो, तन्हा अकेले 
साफ़ है रस्ता देखो... 
साथ आए जो यहाँ कोई नहीं, कोई नहीं 
किस क़दर सीधा, सहल, साफ़ है रस्ता देखो 
बहकी बहकी सी बातें करता था... 
वो जो शाएर था, चुप सा रहता था 
बहकी बहकी सी बातें करता था 
आँखें कानों पे रख के सुनता था 
गीली गीली सी नूर की बूँदें... 
गूँगी ख़ामोशियों की आवाज़ें! 
जम्अ करता था चाँद के साए 
गीली गीली सी नूर की बूँदें 
ओक में भर के खड़खड़ाता था 
वक़्त के इस घनेरे जंगल में... 
रूखे रूखे से रात के पत्ते 
वक़्त के इस घनेरे जंगल में 
कच्चे पक्के से लम्हे चुनता था 
हाँ, वही, वो अजीब सा शाएर 
चाँद की ठोड़ी चूमा करता है... 
रात को उठ के कुहनियों के बल 
चाँद की ठोड़ी चूमा करता है!! 
चाँद से गिर के मर गया है वो 
लोग कहते हैं ख़ुद-कुशी की है