Friday, July 31, 2020

अशआर मेरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं

अशआ'र मिरे यूँ तो ज़माने के लिए हैं 
कुछ शेर फ़क़त उन को सुनाने के लिए हैं 

अब ये भी नहीं ठीक कि हर दर्द मिटा दें 
कुछ दर्द कलेजे से लगाने के लिए हैं 

सोचो तो बड़ी चीज़ है तहज़ीब बदन की 
वर्ना ये फ़क़त आग बुझाने के लिए हैं 


आँखों में जो भर लोगे तो काँटों से चुभेंगे 
ये ख़्वाब तो पलकों पे सजाने के लिए हैं 

देखूँ तिरे हाथों को तो लगता है तिरे हाथ 
मंदिर में फ़क़त दीप जलाने के लिए हैं 

ये इल्म का सौदा ये रिसाले ये किताबें 
इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं! 

Wednesday, July 29, 2020

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए

फिर सावन रुत की पवन चली तुम याद आए
फिर पत्तों की पाज़ेब बजी तुम याद आए

फिर कूजें बोलीं घास के हरे समुंदर में
रुत आई पीले फूलों की तुम याद आए

फिर कागा बोला घर के सूने आंगन में
फिर अमृत रस की बूँद पड़ी तुम याद आए

पहले तो मैं चीख़ के रोया और फिर हंसने लगा
बादल गरजा बिजली चमकी तुम याद आए

दिन भर तो मैं दुनिया के धंधों में खोया रहा
जब दीवारों से धूप ढली तुम याद आए



पत्थर शायरी

आज कुआं भी चीख़ उठा है
किसी ने पत्थर मारा होगा
- साहिल अहमद


इस दर का हो या उस दर का हर पत्थर पत्थर है लेकिन
कुछ ने मेरा सर फोड़ा हैं कुछ पर मैं ने सर फोड़ा है
- ज़ुबैर अली ताबिश


मारो पत्थर भी तो नहीं हिलता
जम चुका है अब इस क़दर पानी
- नीना सहर


कितने दिल थे जो हो गए पत्थर
कितने पत्थर थे जो सनम ठहरे
- शायर लखनवी


एक ख़बर है तेरे लिए
दिल पर पत्थर भारी रख
- अमीर क़ज़लबाश


पहला पत्थर याद हमेशा रहता है
दुख से दिल आबाद हमेशा रहता है
- साबिर वसीम

पत्थर होता जाता हूं
हंसने दो या रोने दो
- नज़ीर क़ैसर


पत्थर न बना दे मुझे मौसम की ये सख़्ती
मर जाएं मिरे ख़्वाब न ताबीर के डर से
- पिन्हां

पथराए पथराए चेहरे
आंखें पत्थर आंसू पत्थर
- यज़दानी जालंधरी


चांद भी पत्थर झील भी पत्थर
पानी भी पत्थर लगता था
- नासिर काज़मी

धूप को देता हूँ तन अपना झुलसने के लिए

जो भी मिल जाता है घर-बार को दे देता हूँ 
या किसी और तलबगार को दे देता हूँ 

धूप को देता हूँ तन अपना झुलसने के लिए 
और साया किसी दीवार को दे देता हूँ 

Monday, July 27, 2020

अली सरदार जाफरी शायरी

और सारा जमाना देखेगा, 
हर किस्सा मेरा अफसाना है. 
हर आशिक सरदार यहाँ, 
हर माशूका सुल्ताना है. 


तू मुझे इतने प्यार से मत देख 

तू मुझे इतने प्यार से मत देख 
तेरी पलकों के नर्म साए में 
धूप भी चाँदनी सी लगती है 
और मुझे कितनी दूर जाना है 
रेत है गर्म पाँव के छाले 
यूँ दहकते हैं जैसे अंगारे 
प्यार की ये नज़र रहे न रहे 
कौन दश्त-ए-वफ़ा में जलता है 
तेरे दिल को ख़बर रहे न रहे 
तू मुझे इतने प्यार से मत देख 

दिल पे जब होती है यादों की सुनहरी बारिश 

दिल पे जब होती है यादों की सुनहरी बारिश 
सारे बीते हुए लम्हों के कँवल खिलते हैं 
फैल जाती है तिरे हर्फ़-ए-वफ़ा की ख़ुश्बू 
कोई कहता है मगर रूह की गहराई से 
शिद्दत-ए-तिश्ना-लबी भी है तिरे प्यार का नाम 
 

प्यास भी एक समुंदर है

प्यास भी एक समुंदर है समुंदर की तरह 
जिस में हर दर्द की धार 
जिस में हर ग़म की नदी मिलती है 
और हर मौज 
लपकती है किसी चाँद से चेहरे की तरफ़ 

Sunday, July 26, 2020

जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा

जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा

समझौता कोई ख़्वाब के बदले नहीं होगा


अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी
ये काम मगर मुझ से अकेले नहीं होगा

ख़ुश-फ़हमी अभी तक थी यही कार-ए-जुनूं में
जो मैं नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा

तदबीर नई सोच कोई ऐ दिल-ए-सादा
माइल-ब-करम तुझ पे वो ऐसे नहीं होगा

बे-नाम से इक ख़ौफ़ से दिल क्यूं है परेशां
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा

-शहरयार 

ये लम्हा ख़ास मेरा, ओढ़ूं या बिछाऊं

ये लम्हा ख़ास मेरा, ओढ़ूं या बिछाऊं
कुछ गज़ ही दूर होगा, जाऊं या बुलाऊं
वो बन के इक समंदर, आगे तो बढ़ा है
मुश्किल में पड़ गया हूं, डूबूं या डुबाऊं
मिसरी की ये डली है, धीरे ही घुली है
कैसा है स्वाद इसका, कह दूं या छुपाऊं
सुन के ही खो गये सब, मेरी ये कहानी
इस मंज़र को संभाले, फूला ना समाऊं
लम्हें ने मात देकर , पूछा वक़्त से यूं
तूने जो भी लिखा है , काटूं या मिटाऊं

दुष्यंत कुमार शायरी

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं,
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए

कहाँ तो तय था चराग़ाँ हर एक घर के लिये
कहाँ चराग़ मयस्सर नहीं शहर के लिये

तुम्हारे पाँव के नीचे कोई ज़मीन नहीं
कमाल ये है कि फिर भी तुम्हें यक़ीन नहीं

कैसे आकाश में सूराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो

इस नदी की धार में ठंडी हवा आती तो है,
नाव जर्जर ही सही, लहरों से टकराती तो है।

एक चिनगारी कही से ढूँढ लाओ दोस्तों,
इस दिए में तेल से भीगी हुई बाती तो है।

इस सिरे से उस सिरे तक सब शरीके—जुर्म हैं
आदमी या तो ज़मानत पर रिहा है या फ़रार

पक गई हैं आदतें बातों से सर होंगी नहीं
कोई हंगामा करो ऐसे गुज़र होगी नहीं

न हो क़मीज़ तो घुटनों से पेट ढक लेंगे
ये लोग कितने मुनासिब हैं इस सफ़र के लिये

रौशन हुए चराग तो आँखें नहीं रहीं
अंधों को रौशनी का गुमाँ और भी ख़राब

सोचा था उनके देश में मँहगी है ज़िंदगी
पर ज़िंदगी का भाव वहाँ और भी ख़राब

ये सारा जिस्म झुक कर बोझ से दोहरा हुआ होगा
मैं सज्दे में नहीं था आप को धोका हुआ होगा

आज मेरा साथ दो वैसे मुझे मालूम है
पत्थरों में चीख़ हर्गिज़ कारगर होगी नहीं

यों मुझको ख़ुद पे बहुत ऐतबार है लेकिन
ये बर्फ आंच के आगे पिघल न जाए कहीं

यहाँ तक आते आते सूख जाती है कई नदियाँ
मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा

आज सड़कों पर लिखे हैं सैकड़ों नारे न देख,
पर अन्धेरा देख तू आकाश के तारे न देख ।

मेले में भटके होते तो कोई घर पहुँचा जाता
हम घर में भटके हैं कैसे ठौर-ठिकाने आएँगे

अब किसी को भी नज़र आती नहीं कोई दरार
घर की हर दीवार पर चिपके हैं इतने इश्तहार

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को सँभालो यारो

मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ पर कहता नहीं
बोलना भी है मना सच बोलना तो दरकिनार

वो मुतमइन हैं कि पत्थर पिघल नहीं सकता
मैं बेक़रार हूँ आवाज़ में असर के लिये

लहू-लुहान नज़ारों का ज़िक्र आया तो
शरीफ़ लोग उठे दूर जा के बैठ गए

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर
हर हथेली ख़ून से तर और ज़्यादा बेक़रार

कल नुमाइश में मिला वो चीथड़े पहने हुए,
मैंने पूछा नाम तो बोला कि हिन्दुस्तान है।

हालाते जिस्म, सूरते-जाँ और भी ख़राब
चारों तरफ़ ख़राब यहाँ और भी ख़राब

आप दीवार गिराने के लिए आए थे
आप दीवार उठाने लगे, ये तो हद है

अब सब से पूछता हूं बताओ तो कौन था
वो बदनसीब शख़्स जो मेरी जगह जिया

यहाँ दरख़्तों के साये में धूप लगती है
चलो यहाँ से चले और उम्र भर के लिये

तमाम रात तेरे मैकदे में मय पी है
तमाम उम्र नशे में निकल न जाए कहीं

एक आदत सी बन गई है तू
और आदत कभी नहीं जाती

ज़िंदगी जब अज़ाब होती है
आशिक़ी कामयाब होती है

Saturday, July 25, 2020

रहो हमेशा सच्चाई के तुम संग

सच्चाई के संग

रहो हमेशा सच्चाई के तुम संग
काम करो इतने सच्चे , देख दुनिया हो जाए दंग
साथ उनके हमेशा रहो जो रखते अपनी बात सही

कभी न छोड़ो तुम अपना उचित अधिकार
वह सच्चा कहलाता है जो न सहे कभी अत्याचार
साथ उनके हमेशा रहो जो रखते अपनी बात सही

न ही झुकना न ही करना है तुमको समझौता
कभी न देना झूठे सपनों को तुम न्योता
साथ उनके हमेशा रहो जो रखते अपनी बात सही

किसी भी कार्य को करने से पहले जानो बूझो
करो सही गलत की तुम हमेशा पहले पहचान
साथ उनके हमेशा रहो जो रखते अपनी बात सही

चाहे हो अकेले या हो भारी भीड़
बात कहो हमेशा सही ,सीधी रखो अपनी रीढ़
साथ उनके हमेशा रहो जो रखते अपनी बात सही

सच्चाई का संग हमेशा हमको भाता है ,
यह सच्चाई ही तो सबके जीवन में ख़ुशियां लाता है
साथ उनके हमेशा रहो जो रखते अपनी बात सही

जिन बातों को कहना मुश्किल होता है

जिन बातों को कहना मुश्किल होता है,
उन बातों को सहना मुश्किल होता है।

इस दुनिया में रह कर हमने ये जाना,
इस दुनिया में रहना मुश्किल होता है।

जिस धारा में बहना सबसे आसां हो,
उस धारा में बहना मुश्किल होता है।

उसके साथ हमें आसानी है कितनी,
उससे ये भी कहना मुश्किल होता है।

उसके ताने, उसके ताने होते हैं !
मुश्किल से भी सहना मुश्किल होता है।

वो बातें जो कहने में आसान लगें, 
उन बातों का कहना मुश्किल होता है


वो सब बातें जो तुम अक्सर कहते हो,
उन बातों का सहना मुश्किल होता है।

माज़ी की यादें भी ऐसा सूरज हैं,
जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है।
मैं अपनी दुनिया का ऐसा सूरज हूँ,
जिस सूरज का गहना मुश्किल होता है।

लगती है ये बहर बहुत आसान मगर,
इसमें ग़ज़लें कहना मुश्किल होता है।