Wednesday, August 27, 2025

बदन, हुस्न, जवानी (शेर, शायरी)

*

हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं

उन की सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं


उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन

देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं


वो तिरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़

पंखुड़ी को जो तिरे लब का बदल कहते हैं


पड़ गई पाँव में तक़दीर की ज़ंजीर तो क्या

हम तो उस को भी तिरी ज़ुल्फ़ का बल कहते हैं

-क़तील शिफ़ाई

*

किसी कली किसी गुल में किसी चमन में नहीं

वो रंग है ही नहीं जो तिरे बदन में नहीं


फ़रहत एहसास

*

तुझ सा कोई जहान में नाज़ुक-बदन कहाँ

ये पंखुड़ी से होंट ये गुल सा बदन कहाँ


लाला माधव राम जौहर

*

कौन बदन से आगे देखे औरत को

सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में


हमीदा शाहीन

*

इक बूँद ज़हर के लिए फैला रहे हो हाथ

देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के


शहरयार

*

ख़ुदा के वास्ते गुल को न मेरे हाथ से लो

मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी


नज़ीर अकबराबादी

*

रास्ता दे कि मोहब्बत में बदन शामिल है

मैं फ़क़त रूह नहीं हूँ मुझे हल्का न समझ


साक़ी फ़ारुक़ी






























वफ़ा, जफ़ा (शेर, शायरी)

*

वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे

तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था


दाग़ देहलवी

*

ढूँड उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें


अहमद फ़राज़

-

उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो

हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो


अमीर मीनाई

*

दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद

अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद


जिगर मुरादाबादी

*

मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा

मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा


हफ़ीज़ जालंधरी

*

वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहे हैं

मैं क्या कर रहा हूँ वो क्या कर रहे हैं


बहज़ाद लखनवी

*

बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता

ये उठते बैठते ज़िक्र-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता


आशुफ़्ता चंगेज़ी

*

ये वफ़ा की सख़्त राहें ये तुम्हारे पाँव नाज़ुक

न लो इंतिक़ाम मुझ से मिरे साथ साथ चल के


ख़ुमार बाराबंकवी

*







































बचपन (शेर, शायरी)

 *

मैंने मिट्टी भी जमा की, खिलौने भी लेकर देखे,
जिन्दगी में वो मुस्कुराहट नही आई जो बचपन में देखे

*

बचपन के खुशियों वाला खेल कोई फिर से खिला दे,

मेरी दौलत-शोहरत ले ले और मुझे बच्चा बना दे.

*

बचपन में पैसा जरूर कम था
पर यकीन मानों उस बचपन में दम था
*
झूठ बोलते थे फिर भी कितने सच्चे थे हम ये उन दिनों की बात है जब बच्चे थे हम
*
बचपन की दोस्ती सभी निभाते हैं, जरुरत पड़े तो बिन बुलाये आते है।
*
महफ़िल तो जमी बचपन के दोस्तों के साथ,
पर अफ़सोस अब बचपन नहीं है किसी के पास.
*

हंसते खेलते गुजर जाये ऐसी शाम नहीं आती,

होंठों पर अब वो बचपन वाली मुस्कान नहीं आती.

*

ज़िन्दगी  जब  भी  सुकून  दे  जाती  है,

ऐ  बचपन  हमें  तेरी  याद  आती  है। 

*

आसमान में उड़ती एक पतंग दिखाई दी,

आज फिर से मुझे मेरी बचपन दिखाई दी .

*

ईमान बेचकर बेईमानी खरीद ली,

बचपन बेचकर जवानी खरीद ली। 

रास्ता, पथ, राह (शेर, शायरी)

 *

क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो

तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो


आदिल मंसूरी

*

यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता

मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो


निदा फ़ाज़ली

*

कटी हुई है ज़मीं कोह से समुंदर तक

मिला है घाव ये दरिया को रास्ता दे कर


अदीम हाशमी

*

तू कभी इस शहर से हो कर गुज़र

रास्तों के जाल में उलझा हूँ मैं


आशुफ़्ता चंगेज़ी

*

यक़ीनन रहबर-ए-मंज़िल कहीं पर रास्ता भूला

वगर्ना क़ाफ़िले के क़ाफ़िले गुम हो नहीं सकते


निसार इटावी

*

मैं ख़ुद ही अपने तआक़ुब में फिर रहा हूँ अभी

उठा के तू मेरी राहों से रास्ता ले जा


लुत्फ़ुर्रहमान

*

मैं उस की धुन में नए रास्ते पे जा निकली

दयार-ए-जाँ से मिरी रोज़ जो गुज़रता रहा


आबिदा करामत

*

दिलचस्प हो गई तिरे चलने से रहगुज़र

उठ उठ के गर्द-ए-राह लिपटती है राह से


जलील मानिकपूरी








चराग़, अंधेरा, रौशनी, चिराग (शेर, शायरी)

*

शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है

सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से


एहतिशाम अख्तर

*

रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया

कुछ दिए ऐसे जले हर-सू अंधेरा हो गया


आज़ाद गुलाटी

*

इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया

जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है


नूह नारवी

*

कुछ अँधेरा  सा  हर  तरफ  छाया  

खुल  गया  जब  बरस के  वो  बादल 

*

रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा

एक आदत है जिए जाना भी


कैफ़ी आज़मी

*

आ गए हो तो उजाला है मिरी दुनिया में

जाओगे तुम तो अंधेरा ही अंधेरा होगा


लैस क़ुरैशी

*

अँधेरों की शिकायत क्या अँधेरे फिर अँधेरे हैं

उजाले भी सितम इस दौर में कुछ कम नहीं करते


आज़ाद गुरदासपुरी

*

जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा

किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता


वसीम बरेलवी

*

रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी

देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है


वसीम बरेलवी

*

शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को

ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का


दाग़ देहलवी

*

दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से

इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से


महताब राय ताबां

*

इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं

आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं


ज़ेहरा निगाह

*

रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़

कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है


इरफ़ान सिद्दीक़ी

*

एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा

उस के बा'द तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है


इफ़्तिख़ार आरिफ़

*

कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र

शहर के सारे चराग़ों को हवा जानती है


अहमद फ़राज़

































आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर

*

आइना देख कर तसल्ली हुई

हम को इस घर में जानता है कोई


गुलज़ार

*

आसमाँ अपने इरादों में मगन है लेकिन

आदमी अपने ख़यालात लिए फिरता है


अनवर मसूद

*

देखा न कोहकन कोई फ़रहाद के बग़ैर

आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर


अज्ञात

*

किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल

कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा


अहमद फ़राज़

*

किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को

काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के


आदिल मंसूरी

किताब, पुष्तक (शेर, शायरी)

*

काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के

दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया


बशीर बद्र

*

किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं

अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश


अज्ञात

*

तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू

किताब-ख़्वाँ है मगर साहिब-ए-किताब नहीं


अल्लामा इक़बाल

*

कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए

कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे


हस्तीमल हस्ती

*

रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ

पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में


शकेब जलाली

*

खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी

किताब मेरी थी रंग-ए-किताब उस का था


वज़ीर आग़ा

*

जिस्म तो ख़ाक है और ख़ाक में मिल जाएगा

मैं बहर-हाल किताबों में मिलूँगा तुम को


होश नोमानी रामपुरी

*

चूम लूँ मैं वरक़ वरक़ उस का

तेरे चेहरे से जो किताब मिले


सदा अम्बालवी

*

भूखे  बच्चों  के  लिए  बेच  दिया  रद्दी  में , 

जिन  किताबों   से   मुझे  इल्मे  हुनर  आया  है.














जुर्म, सज़ा, ख़ता (शेर, शायरी)

 *

जो जुर्म करते हैं, इतने बुरे नही होते, 

सज़ा न देके अदालत बिगाड़ देती है |

*

जुर्म आदम ने किया और नस्ल-ए-आदम को सज़ा

काटता हूँ ज़िंदगी भर मैं ने जो बोया नहीं


मुनीर नियाज़ी

*

हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा

जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा


साहिर लुधियानवी

*

क्या मौसमों के टूटते रिश्तों का ख़ौफ़ है

शीशे सजा लिए हैं सभी ने दुकान पर


सय्यद अारिफ़

*

ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा

मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं


दाग़ देहलवी

*

हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते

आख़िर गुनाहगार हूँ काफ़र नहीं हूँ मैं


मिर्ज़ा ग़ालिब

*ते हैं, इतने बुरे नही होते, सज़ा न देके अ

हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी

जिस को भी देखना हो कई बार देखना

निदा फ़ाज़ली


इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले

ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले

नादिम नदीम


वो ताज़ा-दम हैं नए शो'बदे दिखाते हुए

अवाम थकने लगे तालियाँ बजाते हुए

अज़हर इनायती


ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा

मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था

अम्बर बहराईची



मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए

कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं

बशीर बद्र


इश्क़ में भी सियासतें निकलीं

क़ुर्बतों में भी फ़ासला निकला


मेरे सय्याद की तालीम की है धूम गुलशन में 

यहां जो आज फंसता है वो कल सय्याद होता है

-अकबर इलाहाबादी 


बागबां ने यह अनोखा सितम ईजाद किया

आशियां फूक के पानी को बहुत याद किया

-चकबस्त


शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप 

महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं

-अदम


कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए 

कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए 

-दुष्यंत कुमार 


कच्चे मकान जिनके जले थे फसाद में

अफसोस उनका नाम ही बलवाइयों में था

-नईम 'जज्बी' 

 

जंग में कत्ल सिपाही होंगे 

सुर्खरू जिल्ले-इलाही होंगे

-'मौज' रामपुरी


यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं

खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा 

-दुष्यंत कुमार 


कैसे कैसे हैं रहबर हमारे

कभी इस किनारे, कभी उस किनारे

-'राज' इलाहाबादी 


खैर हो उस मुसाफिर की जिसके लिए

आज हर राहजन पासबां बन गया

-वामिक जौनपुरी


मस्जिद की अजां हो कि शिवाले का गजर हो 

अपनी तो ये हसरत है कि किसी तरह सहर हो 

-कतील शिफाई


ऐ काफिले वालो, तुम इतना भी नहीं समझे 

लूटा तुम्हें रहजन ने, रहबर के इशारे पर 

-तरन्नुम कानपुरी 


गर अम्न की खतिर हो तो जंग है बेहतर 

गर जंग हो मकसद तो सियासत नहीं अच्छी

-राज नोमानी 


जो बागबां फूलों का वफादार नहीं है 

गुलशन की हिफाजत का वो हकदार नहीं 

-फिरोज राहत 


घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे

बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला 

-बशीर 'बद्र'


जितने भी लफ्ज हैं वो महकते गुलाब हैं

लहजे के फर्क से इन्हें तलवार मत बना

-'कतील' शिफाई


दोस्त दुश्मन (शेर, शायरी)

 *

दोस्तों और दुश्मनों में किस तरह तफ़रीक़ हो

दोस्तों और दुश्मनों की बे-रुख़ी है एक सी


जान काश्मीरी

*

बहारों की नज़र में फूल और काँटे बराबर हैं

मोहब्बत क्या करेंगे दोस्त दुश्मन देखने वाले


कलीम आजिज़

*

दोस्तों से इस क़दर सदमे उठाए जान पर

दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा


हैदर अली आतिश

*

मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ

यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे


राहत इंदौरी

*

मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है

मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ


बशीर बद्र

*

जो दोस्त हैं वो माँगते हैं सुल्ह की दुआ

दुश्मन ये चाहते हैं कि आपस में जंग हो


लाला माधव राम जौहर

*

सच कहते हैं कि नाम मोहब्बत का है बड़ा

उल्फ़त जता के दोस्त को दुश्मन बना लिया


जोश लखनवी






मजरूह सुल्तानपुरी (शेर, शायरी)

 *

अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम

उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम


मजरूह सुल्तानपुरी

*

बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने

ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके

*
बहाने और भी होते जो ज़िंदगी के लिए
हम एक बार तिरी आरज़ू भी खो देते

*
देख ज़िंदाँ से परे रंग-ए-चमन जोश-ए-बहार
रक़्स करना है तो फिर पाँव की ज़ंजीर न देख

*
दिल की तमन्ना थी मस्ती में मंज़िल से भी दूर निकलते
अपना भी कोई साथी होता हम भी बहकते चलते चलते

मजरूह सुल्तानपुरी

जोश (शेर, शायरी)

 *

कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता

एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो


दुष्यंत कुमार

*

जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं

वही दुनिया बदलते जा रहे हैं


जिगर मुरादाबादी

*

हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं

हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं


जिगर मुरादाबादी

*

हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें

वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं


साहिर लुधियानवी

*

अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला

जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा


महशर बदायुनी

*

हार हो जाती है जब मान लिया जाता है

जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है


शकील आज़मी

*

वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से

वो और थे जो हार गए आसमान से


फ़हीम जोगापुरी

*

सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का

यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का


शहरयार

*

वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ

हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है


बिस्मिल अज़ीमाबादी

*

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है

देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है


ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार

ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है


वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं

कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है


रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में

लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है


शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले

इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है


आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार बार

आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है


मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से

ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है


माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब

कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है


मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर

सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है


वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ

हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है


अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़

सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है


























मुनव्वर राना (ग़ज़ल)

 *

भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है

मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है


अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है तो क़ैदी है

परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है


चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं

उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है


लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में

जिधर से भी गुज़रता हूँ मैं रस्ता याद रहता है


हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं 'राना'

हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है

*
हम कुछ ऐसे तिरे दीदार में खो जाते हैं
जैसे बच्चे भरे बाज़ार में खो जाते हैं

मुस्तक़िल जूझना यादों से बहुत मुश्किल है
रफ़्ता रफ़्ता सभी घर-बार में खो जाते हैं

इतना साँसों की रिफ़ाक़त पे भरोसा न करो
सब के सब मिट्टी के अम्बार में खो जाते हैं

मेरी ख़ुद्दारी ने एहसान किया है मुझ पर
वर्ना जो जाते हैं दरबार में खो जाते हैं

ढूँढने रोज़ निकलते हैं मसाइल हम को
रोज़ हम सुर्ख़ी-ए-अख़बार में खो जाते हैं

क्या क़यामत है कि सहराओं के रहने वाले
अपने घर के दर-ओ-दीवार में खो जाते हैं

कौन फिर ऐसे में तन्क़ीद करेगा तुझ पर
सब तिरे जुब्बा-ओ-दस्तार में खो जाते हैं
*

मुझ को गहराई में मिट्टी की उतर जाना है
ज़िंदगी बाँध ले सामान-ए-सफ़र जाना है

घर की दहलीज़ पे रौशन हैं वो बुझती आँखें
मुझ को मत रोक मुझे लौट के घर जाना है

मैं वो मेले में भटकता हुआ इक बच्चा हूँ
जिस के माँ बाप को रोते हुए मर जाना है

ज़िंदगी ताश के पत्तों की तरह है मेरी
और पत्तों को बहर-हाल बिखर जाना है

एक बे-नाम से रिश्ते की तमन्ना ले कर
इस कबूतर को किसी छत पे उतर जाना है
*

जो हुक़्म देता है वो इल्तिजा (अनुरोध) भी करता है
ये आसमान कहीं पर झुका भी करता है


मैं अपनी हार पे नादिम (शर्मिंदा) हूँ इस यक़ीन के साथ
कि अपने घर की हिफ़ाज़त (सुरक्षा) ख़ुदा भी करता है

तू बेवफ़ा है तो इक बुरी ख़बर सुन ले
कि इंतज़ार मेरा दूसरा भी करता है


हसीन लोगों से मिलने पे एतराज़ न कर
ये जुर्म वो है जो शादीशुदा भी करता है


हमेशा ग़ुस्से में नुक़सान ही नहीं होता
कहीं -कहीं ये बहुत फ़ायदा भी करता है

*
इश्क़ है तो इश्क़ का इज़हार होना चाहिए
आप को चेहरे से भी बीमार होना चाहिए

आप दरिया हैं तो फिर इस वक़्त हम ख़तरे में हैं
आप कश्ती हैं तो हम को पार होना चाहिए

ऐरे-ग़ैरे लोग भी पढ़ने लगे हैं इन दिनों
आप को औरत नहीं अख़बार होना चाहिए

ज़िंदगी तू कब तलक दर-दर फिराएगी हमें
टूटा-फूटा ही सही घर-बार होना चाहिए

अपनी यादों से कहो इक दिन की छुट्टी दे मुझे
इश्क़ के हिस्से में भी इतवार होना चाहिए

-मुनव्वर राना





गुनाह, गुनाहगार, अमल, खता (शेर, शायरी)

 *

अपने किसी अमल पे नदामत नहीं मुझे

था नेक-दिल बहुत जो गुनहगार मुझ में था


हिमायत अली शाएर

*

गुनाहगार तो रहमत को मुँह दिखा न सका

जो बे-गुनाह था वो भी नज़र मिला न सका


नुशूर वाहिदी

*

देखा तो सब के सर पे गुनाहों का बोझ था

ख़ुश थे तमाम नेकियाँ दरिया में डाल कर


मोहम्मद अल्वी

*

गुनह-गारों में शामिल हैं गुनाहों से नहीं वाक़िफ़

सज़ा को जानते हैं हम ख़ुदा जाने ख़ता क्या है


चकबस्त बृज नारायण

*

मुझे गुनाह में अपना सुराग़ मिलता है

वगरना पारसा-ओ-दीन-दार मैं भी था


साक़ी फ़ारुक़ी

*

लज़्ज़त कभी थी अब तो मुसीबत सी हो गई

मुझ को गुनाह करने की आदत सी हो गई


बेख़ुद मोहानी

*

महसूस भी हो जाए तो होता नहीं बयाँ

नाज़ुक सा है जो फ़र्क़ गुनाह ओ सवाब में


नरेश कुमार शाद

*

आज मैं जहाँ हूँ कल कोई और था
ये भी एक दौर है वो भी एक दौर था

*

अगर तुम जान जाओ तकलीफ मेरी, तो तुम्हें मेरे मुस्कुराने पर भी तरस आयेगा

*

इंसान का अगर मन बेचैन हो ना तो फिर उसे खुद के घर में भी सुकून नहीं मिलता !!

*

मुझसे नाराज़ नहीं हुआ जाता, मैं बस खामोश हो जाता हूं. !!

*

मुझसे मिलना हो तो खुद के किरदार में आना,

चेहरे परख लेने की बुरी आदत है मुझे..!
































अहमद फ़राज़ (शेर, शायरी, ग़ज़ल)

*

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे

तू बहुत देर से मिला है मुझे


तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल

हार जाने का हौसला है मुझे


दिल धड़कता नहीं टपकता है

कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे


हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं

इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे


कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'

सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे


*

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते

वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते


शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था

अपने हिस्से की कोई शम्अ' जलाते जाते


कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते


जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी

पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते


इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था

तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते


*

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ


तू भी हीरे से बन गया पत्थर

हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ


तू कि यकता था बे-शुमार हुआ

हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ


हम भी मजबूरियों का उज़्र करें

फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ


हम अगर मंज़िलें न बन पाए

मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ


देर से सोच में हैं परवाने

राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ


इश्क़ भी खेल है नसीबों का

ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ


अब के गर तू मिले तो हम तुझ से

ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ


बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'

क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ


*

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा


इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी

तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा


डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ

मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा


ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला

तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा


ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'

ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा


*

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें


ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें


ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें


तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें


आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर

क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें


अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'

जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें


*

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ


कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ


पहले से मरासिम न सही फिर भी कभी तो

रस्म-ओ-रह-ए-दुनिया ही निभाने के लिए आ


किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए आ


इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त-ए-गिर्या से भी महरूम

ऐ राहत-ए-जाँ मुझ को रुलाने के लिए आ


अब तक दिल-ए-ख़ुश-फ़ह्‌म को तुझ से हैं उमीदें

ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए आ


*

तेरे क़रीब आ के बड़ी उलझनों में हूँ

मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ


मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल

मैं संग-ए-राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ


तू आ चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं

बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ


ऐ यार-ए-ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं

कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ


तू लूट कर भी अहल-ए-तमन्ना को ख़ुश नहीं

याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ


बदला न मेरे बाद भी मौज़ू-ए-गुफ़्तुगू

मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ


मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर

ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ


तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर

और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ


ख़ुद ही मिसाल-ए-लाला-ए-सेहरा लहू लहू

और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूँ

*

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं


सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से

सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं


सुना है दर्द की गाहक है चश्म-ए-नाज़ उस की

सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं


सुना है उस को भी है शेर ओ शाइरी से शग़फ़

सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं


सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं


सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है

सितारे बाम-ए-फ़लक से उतर के देखते हैं


सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं

सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं


सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें

सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं


सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की

सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं


सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है

सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं


सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं

सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं


सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की

जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं


सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में

मिज़ाज और ही लाल ओ गुहर के देखते हैं


सुना है चश्म-ए-तसव्वुर से दश्त-ए-इम्काँ में

पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं


सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं


वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल-ए-मुराद नहीं

कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं


बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का

सो रह-रवान-ए-तमन्ना भी डर के देखते हैं


सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त

मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं


रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं

चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं


किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे

कभी कभी दर ओ दीवार घर के देखते हैं


कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही

अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं


अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ

'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

*

सुना है लोग उसे आँख भर के देखते हैं

सो उस के शहर में कुछ दिन ठहर के देखते हैं

 

सुना है रब्त है उस को ख़राब-हालों से

सो अपने आप को बरबाद कर के देखते हैं

 

सुना है दर्द की गाहक है चश्म--नाज़ उस की

सो हम भी उस की गली से गुज़र के देखते हैं

 

सुना है उस को भी है शेर शाइरी से शग़फ़

सो हम भी मो'जिज़े अपने हुनर के देखते हैं

 

सुना है बोले तो बातों से फूल झड़ते हैं

ये बात है तो चलो बात कर के देखते हैं

 

सुना है रात उसे चाँद तकता रहता है

सितारे बाम--फ़लक से उतर के देखते हैं

 

सुना है दिन को उसे तितलियाँ सताती हैं

सुना है रात को जुगनू ठहर के देखते हैं

 

सुना है हश्र हैं उस की ग़ज़ाल सी आँखें

सुना है उस को हिरन दश्त भर के देखते हैं

 

सुना है रात से बढ़ कर हैं काकुलें उस की

सुना है शाम को साए गुज़र के देखते हैं

 

सुना है उस की सियह-चश्मगी क़यामत है

सो उस को सुरमा-फ़रोश आह भर के देखते हैं

 

सुना है उस के लबों से गुलाब जलते हैं

सो हम बहार पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं

 

सुना है आइना तिमसाल है जबीं उस की

जो सादा दिल हैं उसे बन-सँवर के देखते हैं

 

सुना है जब से हमाइल हैं उस की गर्दन में

मिज़ाज और ही लाल गुहर के देखते हैं

 

सुना है चश्म--तसव्वुर से दश्त--इम्काँ में

पलंग ज़ाविए उस की कमर के देखते हैं

 

सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है

कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं

 

वो सर्व-क़द है मगर बे-गुल--मुराद नहीं

कि उस शजर पे शगूफ़े समर के देखते हैं

 

बस इक निगाह से लुटता है क़ाफ़िला दिल का

सो रह-रवान--तमन्ना भी डर के देखते हैं

 

सुना है उस के शबिस्ताँ से मुत्तसिल है बहिश्त

मकीं उधर के भी जल्वे इधर के देखते हैं

 

रुके तो गर्दिशें उस का तवाफ़ करती हैं

चले तो उस को ज़माने ठहर के देखते हैं

 

किसे नसीब कि बे-पैरहन उसे देखे

कभी कभी दर दीवार घर के देखते हैं

 

कहानियाँ ही सही सब मुबालग़े ही सही

अगर वो ख़्वाब है ताबीर कर के देखते हैं

 

अब उस के शहर में ठहरें कि कूच कर जाएँ

'फ़राज़' आओ सितारे सफ़र के देखते हैं

*

तेरे क़रीब के बड़ी उलझनों में हूँ

मैं दुश्मनों में हूँ कि तिरे दोस्तों में हूँ

 

मुझ से गुरेज़-पा है तो हर रास्ता बदल

मैं संग--राह हूँ तो सभी रास्तों में हूँ

 

तू चुका है सत्ह पे कब से ख़बर नहीं

बेदर्द मैं अभी उन्हीं गहराइयों में हूँ

 

यार--ख़ुश-दयार तुझे क्या ख़बर कि मैं

कब से उदासियों के घने जंगलों में हूँ

 

तू लूट कर भी अहल--तमन्ना को ख़ुश नहीं

याँ लुट के भी वफ़ा के इन्ही क़ाफ़िलों में हूँ

 

बदला मेरे बाद भी मौज़ू--गुफ़्तुगू

मैं जा चुका हूँ फिर भी तिरी महफ़िलों में हूँ

 

मुझ से बिछड़ के तू भी तो रोएगा उम्र भर

ये सोच ले कि मैं भी तिरी ख़्वाहिशों में हूँ

 

तू हँस रहा है मुझ पे मिरा हाल देख कर

और फिर भी मैं शरीक तिरे क़हक़हों में हूँ

 

ख़ुद ही मिसाल--लाला--सेहरा लहू लहू

और ख़ुद 'फ़राज़' अपने तमाशाइयों में हूँ

*

रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए

फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए

 

कुछ तो मिरे पिंदार--मोहब्बत का भरम रख

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए

 

पहले से मरासिम सही फिर भी कभी तो

रस्म--रह--दुनिया ही निभाने के लिए

 

किस किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम

तू मुझ से ख़फ़ा है तो ज़माने के लिए

 

इक 'उम्र से हूँ लज़्ज़त--गिर्या से भी महरूम

राहत--जाँ मुझ को रुलाने के लिए

 

अब तक दिल--ख़ुश-फ़ह् को तुझ से हैं उमीदें

ये आख़िरी शम'एँ भी बुझाने के लिए

*

आँख से दूर न हो दिल से उतर जाएगा

वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जाएगा

 

इतना मानूस न हो ख़ल्वत-ए-ग़म से अपनी

तू कभी ख़ुद को भी देखेगा तो डर जाएगा

 

डूबते डूबते कश्ती को उछाला दे दूँ

मैं नहीं कोई तो साहिल पे उतर जाएगा

 

ज़िंदगी तेरी अता है तो ये जाने वाला

तेरी बख़्शिश तिरी दहलीज़ पे धर जाएगा

 

ज़ब्त लाज़िम है मगर दुख है क़यामत का 'फ़राज़'

ज़ालिम अब के भी न रोएगा तो मर जाएगा

*

अब के हम बिछड़े तो शायद कभी ख़्वाबों में मिलें

जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

 

ढूँढ उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती

ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें

 

ग़म-ए-दुनिया भी ग़म-ए-यार में शामिल कर लो

नश्शा बढ़ता है शराबें जो शराबों में मिलें

 

तू ख़ुदा है न मिरा इश्क़ फ़रिश्तों जैसा

दोनों इंसाँ हैं तो क्यूँ इतने हिजाबों में मिलें

 

आज हम दार पे खींचे गए जिन बातों पर

क्या अजब कल वो ज़माने को निसाबों में मिलें

 

अब न वो मैं न वो तू है न वो माज़ी है 'फ़राज़'

जैसे दो शख़्स तमन्ना के सराबों में मिलें


 

*

इस से पहले कि बे-वफ़ा हो जाएँ

क्यूँ न ऐ दोस्त हम जुदा हो जाएँ

 

तू भी हीरे से बन गया पत्थर

हम भी कल जाने क्या से क्या हो जाएँ

 

तू कि यकता था बे-शुमार हुआ

हम भी टूटें तो जा-ब-जा हो जाएँ

 

हम भी मजबूरियों का उज़्र करें

फिर कहीं और मुब्तला हो जाएँ

 

हम अगर मंज़िलें न बन पाए

मंज़िलों तक का रास्ता हो जाएँ

 

देर से सोच में हैं परवाने

राख हो जाएँ या हवा हो जाएँ

 

इश्क़ भी खेल है नसीबों का

ख़ाक हो जाएँ कीमिया हो जाएँ

 

अब के गर तू मिले तो हम तुझ से

ऐसे लिपटें तिरी क़बा हो जाएँ

 

बंदगी हम ने छोड़ दी है 'फ़राज़'

क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ

*

ज़िंदगी से यही गिला है मुझे

तू बहुत देर से मिला है मुझे

 

तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल

हार जाने का हौसला है मुझे

 

दिल धड़कता नहीं टपकता है

कल जो ख़्वाहिश थी आबला है मुझे

 

हम-सफ़र चाहिए हुजूम नहीं

इक मुसाफ़िर भी क़ाफ़िला है मुझे

 

कोहकन हो कि क़ैस हो कि 'फ़राज़'

सब में इक शख़्स ही मिला है मुझे

*

सिलसिले तोड़ गया वो सभी जाते जाते

वर्ना इतने तो मरासिम थे कि आते जाते

 

शिकवा-ए-ज़ुल्मत-ए-शब से तो कहीं बेहतर था

अपने हिस्से की कोई शम्अ' जलाते जाते

 

कितना आसाँ था तिरे हिज्र में मरना जानाँ

फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते जाते

 

जश्न-ए-मक़्तल ही न बरपा हुआ वर्ना हम भी

पा-ब-जौलाँ ही सही नाचते गाते जाते

 

इस की वो जाने उसे पास-ए-वफ़ा था कि न था

तुम 'फ़राज़' अपनी तरफ़ से तो निभाते जाते

-अहमद फ़राज़