“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.
(कवि बलवीर सिंह करुण)
सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
“सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से.
(कवि बलवीर सिंह करुण)
सीमा नहीं बना करतीं हैं काग़ज़ खींची लकीरों से,
ये घटती-बढ़ती रहती हैं वीरों की शमशीरों से।
उन्हें अब शायद याद कुछ आती नहीं मेरी।
लगता है चाहत के दिन अब पूरे हो चले।
मन समर्पित तन समर्पित और यह जीवन समर्पित
चाहता हूँ देश की धरती तुझे अभी कुछ और भी दूँ
माँ तुम्हारा ऋण बहुत है मैं अकिंचन
किन्तु इतना कर रहा फिर भी निवेदन
थाल में लाऊँ सजाकर भाल जब
स्वीकार कर लेना दयाकर यह समर्पण
गान अर्पित प्राण अर्पित रक्त का कण-कण समर्पित
माँज दो तलवार को लाओ न देरी
बाँध दो कसकर कमर पर ढाल मेरी
भाल पर मल दो चरण की धूल थोड़ी
शीष पर आशीष की छाया घनेरी
स्वप्न अर्पित प्रश्न अर्पित आयु का क्षण-क्षण समर्पित
तोड़ता हूँ मोह का बन्धन क्षमा दो
गाँव मेरा द्वार घर आँगन क्षमा दो
आज सीधे हाथ में तलवार दे दो
और बाएँ हाथ में ध्वज को थमा दो
ये सुमन लो ये चमन लो नीड़ का तृण-तृण समर्पित.
- रामावतार त्यागी
तेरे नखरे भी कमाल हैं जिंदगी
बिना बात के बवाल है जिंदगी।
कुरबतें हो हमसफ़र से अगर
फिर तो बस धमाल है जिंदगी।
हर अदा जिंदगी की कातिलना
अनसुलझा सवाल है जिंदगी।
आखिरी मंजिल तो मौत ही है
क्यूं फिर इक जंजाल है जिंदगी।
ठहर जाए ग़म जब आकर यहां
मानो बात बस पामाल है जिंदगी।
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
गोशे गोशे में तज़ईन-ओ-ज़ेबाई
साफ़ करें हर दिल की मैली अँगनाई
फ़ितरत ने भी मस्ती में ली अंगड़ाई
ख़ुशियों का संगीत सुनाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
आशाओं की मंज़िल पर सब कॉमन हो
नफ़रत जाए प्यार की ज्योति रौशन हो
प्रेम नगर में चाहे दाव पे जीवन हो
भेद-भाव पे तीर चलाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
रौशनियों के जाल भी कितने सुंदर हैं
दीपक मालाएँ घर घर का ज़ेवर हैं
फुल-झड़ियों जैसे चेहरों पर तेवर हैं
हर ज़ुल्मत को आज मिटाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
हार चुके हर बाज़ी अब रावन वाले
लक्ष्मी की पूजा करते हैं धन वाले
अपनी दुनिया हम बेचारे मन वाले
आतिश-बाज़ी चमकाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
सब के लिए ख़ुश-हाली का ये साल रहे
हर इंसाँ की क़िस्मत में ज़र माल रहे
न कोई अब इस धरती पर कंगाल रहे
हर क़िस्मत पर नूर बनाएँ आ जाओ
दीवाली के दीप जलाएँ आ जाओ
रौशन रौशन गीत सुनाएँ आ जाओ
अबरार किरतपुरी
तुम हक़ीक़त नहीं हो हसरत हो
जो मिले ख़्वाब में वो दौलत होथोड़ा सा माहौल बनाना होता है
वर्ना किसी के साथ ज़माना होता है
सच्चा शेर सुनाने वाले ख़त्म हुए
अब तो ख़ाली खेल दिखाना होता है
आँसू पहली शर्त है इस समझौते की
ग़म तो साँसों का जुर्माना होता है
लाल-क़िले की दीवारों पर लिखवा दो
दिल सब से महफ़ूज़ ठिकाना होता है
दुनिया में भर-मार है नक़ली लोगों की
सौ में कोई एक दिवाना होता है
रात हमारे घर जल्दी आ जाया कर
हमें सवेरे काम पे जाना होता है
ऐसी कोई बात नहीं मायूसी की
सच में थोड़ा सा अफ़्साना होता है
सब की अपनी एक इकाई होती है
सब का अपना एक ज़माना होता है
हम ने तो उन को भी लुटते देखा है
जिन के चार-क़दम पर थाना होता है
आज बिछड़ते वक़्त मुझे मालूम हुआ
लोगों में एहसास का ख़ाना होता है
शकील जमाली
आग़ाज़-ए-इश्क़ उम्र का अंजाम हो गया
नाकामियों के ग़म में मिरा काम हो गयाचाँदनी था कि ग़ज़ल था कि सबा था क्या था
मैं ने इक बार तिरा नाम सुना था क्या था
अब के बिछड़े हैं तो लगता है कि कुछ टूट गया
मेरा दिल था कि तिरा अहद-ए-वफ़ा था क्या था
ख़ुद-कुशी कर के भी बिस्तर से उठा हूँ ज़िंदा
मैं ने कल रात को जो ज़हर पिया था क्या था
तुम तो कहते थे ख़ुदा तुम से ख़फ़ा है 'क़ैसर'
डूबते वक़्त वो जो इक हाथ बढ़ा था क्या था
क़ैसर-उल जाफ़री
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बहुत बार आई-गई यह दिवाली
मगर तम जहां था वहीं पर खड़ा है,
बहुत बार लौ जल-बुझी पर अभी तक
कफन रात का हर चमन पर पड़ा है,
न फिर सूर्य रूठे, न फिर स्वप्न टूटे
उषा को जगाओ, निशा को सुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
सृजन शान्ति के वास्ते है जरूरी
कि हर द्वार पर रोशनी गीत गाये
तभी मुक्ति का यज्ञ यह पूर्ण होगा,
कि जब प्यार तलावार से जीत जाये,
घृणा बढ रही है, अमा चढ़ रही है
मनुज को जिलाओ, दनुज को मिटाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
बड़े वेगमय पंख हैं रोशनी के
न वह बंद रहती किसी के भवन में,
किया क़ैद जिसने उसे शक्ति छल से
स्वयं उड़ गया वह धुंआ बन पवन में,
न मेरा-तुम्हारा सभी का प्रहर यह
इसे भी बुलाओ, उसे भी बुलाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
मगर चाहते तुम कि सारा उजाला
रहे दास बनकर सदा को तुम्हारा,
नहीं जानते फूस के गेह में पर
बुलाता सुबह किस तरह से अंगारा,
न फिर अग्नि कोई रचे रास इससे
सभी रो रहे आँसुओं को हंसाओ!
दिये से मिटेगा न मन का अंधेरा
धरा को उठाओ, गगन को झुकाओ!
गोपालदास "नीरज"
उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ
ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ
डाल के ख़ाक मेरे ख़ून पे क़ातिल ने कहा
कुछ ये मेहंदी नहीं मेरी कि छुपा भी न सकूँ
ज़ब्त कम-बख़्त ने याँ आ के गला घोंटा है
कि उसे हाल सुनाऊँ तो सुना भी न सकूँ
नक़्श-ए-पा देख तो लूँ लाख करूँगा सज्दे
सर मिरा अर्श नहीं है जो झुका भी न सकूँ
बेवफ़ा लिखते हैं वो अपने क़लम से मुझ को
ये वो क़िस्मत का लिखा है जो मिटा भी न सकूँ
इस तरह सोए हैं सर रख के मिरे ज़ानू पर
अपनी सोई हुई क़िस्मत को जगा भी न सकूँ
अमीर मीनाई
मोम के पास कभी आग को लाकर देखूँ
सोचता हूँ के तुझे हाथ लगा कर देखूँ
कभी चुपके से चला आऊँ तेरी खिलवत में
और तुझे तेरी निगाहों से बचा कर देखूँ
मैने देखा है ज़माने को शराबें पी कर
दम निकल जाये अगर होश में आकर देखूँ
दिल का मंदिर बड़ा वीरान नज़र आता है
सोचता हूँ तेरी तस्वीर लगा कर देखूँ
तेरे बारे में सुना ये है के तू सूरज है
मैं ज़रा देर तेरे साये में आ कर देखूँ
याद आता है के पहले भी कई बार यूं ही
मैने सोचा था के मैं तुझको भुला कर देखूँ
.
ख़्वाब ही ख़्वाब कब तलक देखूँ
काश तुझ को भी इक झलक देखूँ
चाँदनी का समाँ था और हम तुम
अब सितारे पलक पलक देखूँ
जाने तू किस का हम-सफ़र होगा
मैं तुझे अपनी जाँ तलक देखूँ
बंद क्यूँ ज़ात में रहूँ अपनी
मौज बन जाऊँ और छलक देखूँ
सुब्ह में देर है तो फिर इक बार
शब के रुख़्सार से ढलक देखूँ
उन के क़दमों तले फ़लक और मैं
सिर्फ़ पहनाई-ए-फ़लक देखूँ
उबैदुल्लाह अलीम
*
हुस्न को चाँद जवानी को कँवल कहते हैं
उन की सूरत नज़र आए तो ग़ज़ल कहते हैं
उफ़ वो मरमर से तराशा हुआ शफ़्फ़ाफ़ बदन
देखने वाले उसे ताज-महल कहते हैं
वो तिरे हुस्न की क़ीमत से नहीं हैं वाक़िफ़
पंखुड़ी को जो तिरे लब का बदल कहते हैं
पड़ गई पाँव में तक़दीर की ज़ंजीर तो क्या
हम तो उस को भी तिरी ज़ुल्फ़ का बल कहते हैं
-क़तील शिफ़ाई
*
किसी कली किसी गुल में किसी चमन में नहीं
वो रंग है ही नहीं जो तिरे बदन में नहीं
फ़रहत एहसास
*
तुझ सा कोई जहान में नाज़ुक-बदन कहाँ
ये पंखुड़ी से होंट ये गुल सा बदन कहाँ
लाला माधव राम जौहर
*
कौन बदन से आगे देखे औरत को
सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में
हमीदा शाहीन
*
इक बूँद ज़हर के लिए फैला रहे हो हाथ
देखो कभी ख़ुद अपने बदन को निचोड़ के
शहरयार
*
ख़ुदा के वास्ते गुल को न मेरे हाथ से लो
मुझे बू आती है इस में किसी बदन की सी
नज़ीर अकबराबादी
*
रास्ता दे कि मोहब्बत में बदन शामिल है
मैं फ़क़त रूह नहीं हूँ मुझे हल्का न समझ
साक़ी फ़ारुक़ी
*
वफ़ा करेंगे निबाहेंगे बात मानेंगे
तुम्हें भी याद है कुछ ये कलाम किस का था
दाग़ देहलवी
*
ढूँड उजड़े हुए लोगों में वफ़ा के मोती
ये ख़ज़ाने तुझे मुमकिन है ख़राबों में मिलें
अहमद फ़राज़
-
उल्फ़त में बराबर है वफ़ा हो कि जफ़ा हो
हर बात में लज़्ज़त है अगर दिल में मज़ा हो
अमीर मीनाई
*
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद
जिगर मुरादाबादी
*
मुझ से क्या हो सका वफ़ा के सिवा
मुझ को मिलता भी क्या सज़ा के सिवा
हफ़ीज़ जालंधरी
*
वफ़ाओं के बदले जफ़ा कर रहे हैं
मैं क्या कर रहा हूँ वो क्या कर रहे हैं
बहज़ाद लखनवी
*
बुरा मत मान इतना हौसला अच्छा नहीं लगता
ये उठते बैठते ज़िक्र-ए-वफ़ा अच्छा नहीं लगता
आशुफ़्ता चंगेज़ी
*
ये वफ़ा की सख़्त राहें ये तुम्हारे पाँव नाज़ुक
न लो इंतिक़ाम मुझ से मिरे साथ साथ चल के
ख़ुमार बाराबंकवी
*
*
मैंने मिट्टी भी जमा की, खिलौने भी लेकर देखे,
जिन्दगी में वो मुस्कुराहट नही आई जो बचपन में देखे
*
बचपन के खुशियों वाला खेल कोई फिर से खिला दे,
मेरी दौलत-शोहरत ले ले और मुझे बच्चा बना दे.
*
हंसते खेलते गुजर जाये ऐसी शाम नहीं आती,
होंठों पर अब वो बचपन वाली मुस्कान नहीं आती.
*
ज़िन्दगी जब भी सुकून दे जाती है,
ऐ बचपन हमें तेरी याद आती है।
*
आसमान में उड़ती एक पतंग दिखाई दी,
आज फिर से मुझे मेरी बचपन दिखाई दी .
*
ईमान बेचकर बेईमानी खरीद ली,
बचपन बेचकर जवानी खरीद ली।
*
क्यूँ चलते चलते रुक गए वीरान रास्तो
तन्हा हूँ आज मैं ज़रा घर तक तो साथ दो
आदिल मंसूरी
*
यहाँ किसी को कोई रास्ता नहीं देता
मुझे गिरा के अगर तुम सँभल सको तो चलो
निदा फ़ाज़ली
*
कटी हुई है ज़मीं कोह से समुंदर तक
मिला है घाव ये दरिया को रास्ता दे कर
अदीम हाशमी
*
तू कभी इस शहर से हो कर गुज़र
रास्तों के जाल में उलझा हूँ मैं
आशुफ़्ता चंगेज़ी
*
यक़ीनन रहबर-ए-मंज़िल कहीं पर रास्ता भूला
वगर्ना क़ाफ़िले के क़ाफ़िले गुम हो नहीं सकते
निसार इटावी
*
मैं ख़ुद ही अपने तआक़ुब में फिर रहा हूँ अभी
उठा के तू मेरी राहों से रास्ता ले जा
लुत्फ़ुर्रहमान
*
मैं उस की धुन में नए रास्ते पे जा निकली
दयार-ए-जाँ से मिरी रोज़ जो गुज़रता रहा
आबिदा करामत
*
दिलचस्प हो गई तिरे चलने से रहगुज़र
उठ उठ के गर्द-ए-राह लिपटती है राह से
जलील मानिकपूरी
*
शहर के अंधेरे को इक चराग़ काफ़ी है
सौ चराग़ जलते हैं इक चराग़ जलने से
एहतिशाम अख्तर
*
रौशनी फैली तो सब का रंग काला हो गया
कुछ दिए ऐसे जले हर-सू अंधेरा हो गया
आज़ाद गुलाटी
*
इश्क़ में कुछ नज़र नहीं आया
जिस तरफ़ देखिए अँधेरा है
नूह नारवी
*
कुछ अँधेरा सा हर तरफ छाया
खुल गया जब बरस के वो बादल
*
रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा
एक आदत है जिए जाना भी
कैफ़ी आज़मी
*
आ गए हो तो उजाला है मिरी दुनिया में
जाओगे तुम तो अंधेरा ही अंधेरा होगा
लैस क़ुरैशी
*
अँधेरों की शिकायत क्या अँधेरे फिर अँधेरे हैं
उजाले भी सितम इस दौर में कुछ कम नहीं करते
आज़ाद गुरदासपुरी
*
जहाँ रहेगा वहीं रौशनी लुटाएगा
किसी चराग़ का अपना मकाँ नहीं होता
वसीम बरेलवी
*
रात तो वक़्त की पाबंद है ढल जाएगी
देखना ये है चराग़ों का सफ़र कितना है
वसीम बरेलवी
*
शब-ए-विसाल है गुल कर दो इन चराग़ों को
ख़ुशी की बज़्म में क्या काम जलने वालों का
दाग़ देहलवी
*
दिल के फफूले जल उठे सीने के दाग़ से
इस घर को आग लग गई घर के चराग़ से
महताब राय ताबां
*
इस उम्मीद पे रोज़ चराग़ जलाते हैं
आने वाले बरसों ब'अद भी आते हैं
ज़ेहरा निगाह
*
रात को जीत तो पाता नहीं लेकिन ये चराग़
कम से कम रात का नुक़सान बहुत करता है
इरफ़ान सिद्दीक़ी
*
एक चराग़ और एक किताब और एक उम्मीद असासा
उस के बा'द तो जो कुछ है वो सब अफ़्साना है
इफ़्तिख़ार आरिफ़
*
कौन ताक़ों पे रहा कौन सर-ए-राहगुज़र
शहर के सारे चराग़ों को हवा जानती है
अहमद फ़राज़
*
आइना देख कर तसल्ली हुई
हम को इस घर में जानता है कोई
गुलज़ार
*
आसमाँ अपने इरादों में मगन है लेकिन
आदमी अपने ख़यालात लिए फिरता है
अनवर मसूद
*
देखा न कोहकन कोई फ़रहाद के बग़ैर
आता नहीं है फ़न कोई उस्ताद के बग़ैर
अज्ञात
*
किसी को घर से निकलते ही मिल गई मंज़िल
कोई हमारी तरह उम्र भर सफ़र में रहा
अहमद फ़राज़
*
किस तरह जमा कीजिए अब अपने आप को
काग़ज़ बिखर रहे हैं पुरानी किताब के
आदिल मंसूरी
*
काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया
बशीर बद्र
*
किताबें भी बिल्कुल मेरी तरह हैं
अल्फ़ाज़ से भरपूर मगर ख़ामोश
अज्ञात
*
तुझे किताब से मुमकिन नहीं फ़राग़ कि तू
किताब-ख़्वाँ है मगर साहिब-ए-किताब नहीं
अल्लामा इक़बाल
*
कुछ और सबक़ हम को ज़माने ने सिखाए
कुछ और सबक़ हम ने किताबों में पढ़े थे
हस्तीमल हस्ती
*
रहता था सामने तिरा चेहरा खुला हुआ
पढ़ता था मैं किताब यही हर क्लास में
शकेब जलाली
*
खुली किताब थी फूलों-भरी ज़मीं मेरी
किताब मेरी थी रंग-ए-किताब उस का था
वज़ीर आग़ा
*
जिस्म तो ख़ाक है और ख़ाक में मिल जाएगा
मैं बहर-हाल किताबों में मिलूँगा तुम को
होश नोमानी रामपुरी
*
चूम लूँ मैं वरक़ वरक़ उस का
तेरे चेहरे से जो किताब मिले
सदा अम्बालवी
*
भूखे बच्चों के लिए बेच दिया रद्दी में ,
जिन किताबों से मुझे इल्मे हुनर आया है.
*
जो जुर्म करते हैं, इतने बुरे नही होते,
सज़ा न देके अदालत बिगाड़ देती है |
*
जुर्म आदम ने किया और नस्ल-ए-आदम को सज़ा
काटता हूँ ज़िंदगी भर मैं ने जो बोया नहीं
मुनीर नियाज़ी
*
हम जुर्म-ए-मोहब्बत की सज़ा पाएँगे तन्हा
जो तुझ से हुई हो वो ख़ता साथ लिए जा
साहिर लुधियानवी
*
क्या मौसमों के टूटते रिश्तों का ख़ौफ़ है
शीशे सजा लिए हैं सभी ने दुकान पर
सय्यद अारिफ़
*
ये तो कहिए इस ख़ता की क्या सज़ा
मैं जो कह दूँ आप पर मरता हूँ मैं
दाग़ देहलवी
*
हद चाहिए सज़ा में उक़ूबत के वास्ते
आख़िर गुनाहगार हूँ काफ़र नहीं हूँ मैं
मिर्ज़ा ग़ालिब
*ते हैं, इतने बुरे नही होते, सज़ा न देके अ
हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी
जिस को भी देखना हो कई बार देखना
इन से उम्मीद न रख हैं ये सियासत वाले
ये किसी से भी मोहब्बत नहीं करने वाले
वो ताज़ा-दम हैं नए शो'बदे दिखाते हुए
अवाम थकने लगे तालियाँ बजाते हुए
ये सच है रंग बदलता था वो हर इक लम्हा
मगर वही तो बहुत कामयाब चेहरा था
मुझ से क्या बात लिखानी है कि अब मेरे लिए
कभी सोने कभी चाँदी के क़लम आते हैं
इश्क़ में भी सियासतें निकलीं
क़ुर्बतों में भी फ़ासला निकला
मेरे सय्याद की तालीम की है धूम गुलशन में
यहां जो आज फंसता है वो कल सय्याद होता है
-अकबर इलाहाबादी
बागबां ने यह अनोखा सितम ईजाद किया
आशियां फूक के पानी को बहुत याद किया
-चकबस्त
शायद मुझे निकाल कर पछता रहे हैं आप
महफिल में इस ख्याल से फिर आ गया हूं मैं
-अदम
कहां तो तय था चिरागां हर एक घर के लिए
कहां चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
-दुष्यंत कुमार
कच्चे मकान जिनके जले थे फसाद में
अफसोस उनका नाम ही बलवाइयों में था
-नईम 'जज्बी'
जंग में कत्ल सिपाही होंगे
सुर्खरू जिल्ले-इलाही होंगे
-'मौज' रामपुरी
यहां तो सिर्फ गूंगे और बहरे लोग बसते हैं
खुदा जाने यहां पर किस तरह जलसा हुआ होगा
-दुष्यंत कुमार
कैसे कैसे हैं रहबर हमारे
कभी इस किनारे, कभी उस किनारे
-'राज' इलाहाबादी
खैर हो उस मुसाफिर की जिसके लिए
आज हर राहजन पासबां बन गया
-वामिक जौनपुरी
मस्जिद की अजां हो कि शिवाले का गजर हो
अपनी तो ये हसरत है कि किसी तरह सहर हो
-कतील शिफाई
ऐ काफिले वालो, तुम इतना भी नहीं समझे
लूटा तुम्हें रहजन ने, रहबर के इशारे पर
-तरन्नुम कानपुरी
गर अम्न की खतिर हो तो जंग है बेहतर
गर जंग हो मकसद तो सियासत नहीं अच्छी
-राज नोमानी
जो बागबां फूलों का वफादार नहीं है
गुलशन की हिफाजत का वो हकदार नहीं
-फिरोज राहत
घरों पे नाम थे नामों के साथ ओहदे थे
बहुत तलाश किया कोई आदमी न मिला
-बशीर 'बद्र'
जितने भी लफ्ज हैं वो महकते गुलाब हैं
लहजे के फर्क से इन्हें तलवार मत बना
-'कतील' शिफाई
*
दोस्तों और दुश्मनों में किस तरह तफ़रीक़ हो
दोस्तों और दुश्मनों की बे-रुख़ी है एक सी
जान काश्मीरी
*
बहारों की नज़र में फूल और काँटे बराबर हैं
मोहब्बत क्या करेंगे दोस्त दुश्मन देखने वाले
कलीम आजिज़
*
दोस्तों से इस क़दर सदमे उठाए जान पर
दिल से दुश्मन की अदावत का गिला जाता रहा
हैदर अली आतिश
*
मैं आ कर दुश्मनों में बस गया हूँ
यहाँ हमदर्द हैं दो-चार मेरे
राहत इंदौरी
*
मुख़ालिफ़त से मिरी शख़्सियत सँवरती है
मैं दुश्मनों का बड़ा एहतिराम करता हूँ
बशीर बद्र
*
जो दोस्त हैं वो माँगते हैं सुल्ह की दुआ
दुश्मन ये चाहते हैं कि आपस में जंग हो
लाला माधव राम जौहर
*
सच कहते हैं कि नाम मोहब्बत का है बड़ा
उल्फ़त जता के दोस्त को दुश्मन बना लिया
जोश लखनवी
*
अब सोचते हैं लाएँगे तुझ सा कहाँ से हम
उठने को उठ तो आए तिरे आस्ताँ से हम
मजरूह सुल्तानपुरी
*
बढ़ाई मय जो मोहब्बत से आज साक़ी ने
ये काँपे हाथ कि साग़र भी हम उठा न सके
*
कैसे आकाश में सूराख़ नहीं हो सकता
एक पत्थर तो तबीअ'त से उछालो यारो
दुष्यंत कुमार
*
जो तूफ़ानों में पलते जा रहे हैं
वही दुनिया बदलते जा रहे हैं
जिगर मुरादाबादी
*
हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं
जिगर मुरादाबादी
*
हज़ार बर्क़ गिरे लाख आँधियाँ उट्ठें
वो फूल खिल के रहेंगे जो खिलने वाले हैं
साहिर लुधियानवी
*
अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा
महशर बदायुनी
*
हार हो जाती है जब मान लिया जाता है
जीत तब होती है जब ठान लिया जाता है
शकील आज़मी
*
वाक़िफ़ कहाँ ज़माना हमारी उड़ान से
वो और थे जो हार गए आसमान से
फ़हीम जोगापुरी
*
सियाह रात नहीं लेती नाम ढलने का
यही तो वक़्त है सूरज तिरे निकलने का
शहरयार
*
वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है
बिस्मिल अज़ीमाबादी
*
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है
शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है
आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार बार
आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिन के जिन के दिल में है
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
माने-ए-इज़हार तुम को है हया, हम को अदब
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-'बिस्मिल' में है
*
भुला पाना बहुत मुश्किल है सब कुछ याद रहता है
मोहब्बत करने वाला इस लिए बरबाद रहता है
अगर सोने के पिंजड़े में भी रहता है तो क़ैदी है
परिंदा तो वही होता है जो आज़ाद रहता है
चमन में घूमने फिरने के कुछ आदाब होते हैं
उधर हरगिज़ नहीं जाना उधर सय्याद रहता है
लिपट जाती है सारे रास्तों की याद बचपन में
जिधर से भी गुज़रता हूँ मैं रस्ता याद रहता है
हमें भी अपने अच्छे दिन अभी तक याद हैं 'राना'
हर इक इंसान को अपना ज़माना याद रहता है