आईने सा,
ये दिल टूटा है
मेरी क़िस्मत ने
मुझको लूटा है
ज़िंदगी तुझसे
क्या-क्या छूटा है
नींद टूटी है
ख़्वाब टूटा है
उसका अंदाज़ है
जुदा सबसे
न ख़फ़ा है
न मुझसे रूठा है!
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
आईने सा,
ये दिल टूटा है
मेरी क़िस्मत ने
मुझको लूटा है
ज़िंदगी तुझसे
क्या-क्या छूटा है
नींद टूटी है
ख़्वाब टूटा है
उसका अंदाज़ है
जुदा सबसे
न ख़फ़ा है
न मुझसे रूठा है!
अपना अपना रास्ता है कुछ नही,
क्या भला है क्या बुरा है कुछ नही !
जुस्तजू है एक मुसलसल जुस्तजू,
क्या कही कुछ खो गया है कुछ नही !
मोहर मेरे नाम की हर शय पे है,
मेरे घर मे मेरा क्या है कुछ नही !
कहने वाले अपनी अपनी कह गए,
मुझसे पुछ क्या सुना है कुछ नही !
कोई दरवाजे पे है तो क्या हुआ,
आप से कुछ मांगता है कुछ नही !!
(अख्तर नाझमी )
कुछ ज़ब्त भी कमाल है ।
कुछ दर्द भी बे'मिसाल है ।।
कुछ जिस्म की है ज़रूरतें ।
कुछ रुह का भी सवाल है ।।
कुछ ख़्वाहिशों की है बेबसी ।
कुछ दिल का भी ख्याल है ।।
कुछ खुद में हम अधूरे से ।
कुछ ज़िंदगी भी सवाल है ।।
कुछ तुझे हैं मुझसे शिकायतें ।
कुछ मुझे भी तुझसे मलाल है ।।
कुछ ज़ब्त भी कमाल है ।
कुछ दर्द भी बे'मिसाल है ।।
चलने वाले मुसाफ़िर संभल के चल
जिंदगीे के सुर-ताल में ढल के चल
तू भूल जा बीते लम्हों को
नये लम्हों से मिलके चल
न याद कर,गम की रातों को
सुबह के साथ,खिलके चल
बुराई को दिल से निकाल
भलाई से मिलकर चल
मौसम बदला ,हवायें बदली
खुद को भी बदल के चल
जिंदगी की राह बहुत मुश्किल है
तो मुश्किलों को गले लगाके चल
चलने वाले मुसाफ़िर संभल के चल
जिंदगीे के सुर-ताल में ढल के चल
जाने कौन से कल की तलाश में
आज जाग जाग कर पढ़ रहा हूं
प्रेम की कविताएं।
दूसरों की व्यथाएं जानकर
उसे अपना ही साथी मानकर
जीना चाहता हूं अतीत
मन है बहुत व्यथित
फीकी हो चुकी है
प्रेम की धानी चुनरिया
ना जाने किस स्वरूप में
है वो पतली कमरिया।
फिर भी पढ़ रहा हूं
कुछ वादे
हरश्रृंगार से महकते
और कुछ इरादे
अंगार से दहकते।
पढ़ रहा हूं मिलन के गीत
चुभन के साथ
पढ़ रहा हूं जिस्म का पिघलना
पहली छूअन के साथ।
पढ़ रहा हूं कुछ प्रेमपत्र
फिर सिसलेवार
पढ़ रहा हूं कब हुई प्रीत
कब उठा ऐतबार।
पढ़ रहा हूं कि फिर उठी है
प्रेम पढ़ने की भूख
पढ़ रहा हूं कि फिर उठी है
तुझे पाने की हूक।
नहीं मिला कोई तुम जैसा आज तक,
पर ये सितम अलग है कि मिले तुम भी नहींI
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कहाँ आ के रुकने थे रास्ते कहाँ मोड़ था उसे भूल जा,
वो जो मिल गया उसे याद रख जो नहीं मिला उसे भूल जा।
भोजना आधा पेट कर, दुगुना पानी पीव,
तिगुना श्रम, चौगुना हंसी, वर्ष सवा सौ जीव।
काका हाथरसी
छोड़ दीजिए, कुछ मौजूं को,
वक़्त की मौजों पर.
कुछ तो, थक कर दम तोड़ेगी,
कुछ किनारे से सुलह करेगी.
तू इस क़दर मुझे अपने क़रीब लगता है
तुझे अलग से जो सोचूँ अजीब लगता है
जिसे न हुस्न से मतलब न इश्क़ से सरोकार
वो शख़्स मुझ को बहुत बद-नसीब लगता है
हुदूद-ए-ज़ात से बाहर निकल के देख ज़रा
न कोई ग़ैर न कोई रक़ीब लगता हैये दोस्ती ये मरासिम ये चाहतें ये ख़ुलूस
कभी कभी मुझे सब कुछ अजीब लगता है
उफ़ुक़ पे दूर चमकता हुआ कोई तारा
मुझे चराग़-ए-दयार-ए-हबीब लगता है
फितूर तुझे पाने की
फितूर हीं रह गई।
देखते देखते तू
अश्कों के संग
बह गई।
थी उम्मीद तू
दिल की
दिल में हीं रह गई।
आती जाती थी सांसों में
तू सांसों में हीं घुल गई।
दिल का दर्द अब कुछ
कम सा हो गया है ,
लगता है की अब
तू भी मुझे भूल गई और
फितूर तुझे पाने की
फितूर हीं रह गई ।
ये दीवानापन
ये बंजारापन
ये गलियों की ख़ाक
यादों में तेरी जलकर
कब के हो गए हम राख ।
बंद कर आंखों को
अपनी
एहसासों की पंखों को
खोल
छू जाएगा फिर से
प्यार मेरा
एक बार नाम तू मेरा
बोल ।
एक बार नाम तू मेरा
बोल ।
वही राह
वही मंज़िल
वही धड़कता दिल
तन मन में रास जगाए
एक बार तो
मुझसे मिल ।
लगी है लगन तुझसे
इसे तू प्यार समझ
या फिर मेरी फितूर ।
हसरतें तमाम
हसरतें ही रह गए ।
प्यार के बाग
अब पतझड़ बन के
झड़ गए।
तेरी चाह में हम बस
तील तील जल कर
रह गए ..
मुस्कुराते हुए तू
रुकसत हो गई कहीं
हम वहीं पड़े पड़े
जड़ हो गए ।
चेतना की आवाज़
है अब भी अधूरी तेरे बिना
आ प्यार कर ले एक बार फिर से
ऐ हमदम हमराही हमनवां मेरी , कि
तेरे प्यार को हम वर्षों तरस गए।
तेरे प्यार को हम वर्षों तरस गए।