Saturday, March 21, 2020

इक सफ़र है जो बहता रहता है

कोई आहट नहीं बदन में कहीं 
कोई साया नहीं है आँखों में 

पाँव बेहिस हैं चलते जाते हैं 
इक सफ़र है जो बहता रहता है

~ गुलज़ार

वो कहें कैसे हो आप? और मैं रोने लग जाऊं।

ये भी मुमकिन है कि आँख भिगोने लग जाऊं,
वो कहें कैसे हो आप? और मैं रोने लग जाऊं।

-जौन एलिया 

सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना

सुला कर तेज़ धारों को किनारो तुम न सो जाना 
रवानी ज़िंदगानी है तो धारो तुम न सो जाना 

मुझे तुम को सुनानी है मुकम्मल दास्ताँ अपनी 
अधूरी दास्ताँ सुन कर सितारो तुम न सो जाना 

तुम्हारे दायरे में ज़िंदगी महफ़ूज़ रहती है 
निज़ाम-ए-बज़्म-ए-हस्ती के हिसारो तुम न सो जाना

तुम्हीं से जागता है दिल में एहसास-ए-रवा-दारी 
क़याम-ए-रब्त-ए-बाहम के सहारो तुम न सो जाना 

अगर नींद आ गई तुम को तो चश्मे सूख जाएँगे 
कभी ग़फ़लत में पड़ कर कोहसारो तुम न सो जाना 
तुम्हीं से बहर-ए-हस्ती में रवाँ है कश्ती-ए-हस्ती 
अगर साहिल भी सो जाएँ तो धारो तुम न सो जाना 

सदा-ए-दर्द की ख़ातिर तुम्हें 'कौसर' ने छेड़ा है 
शिकस्ता-साज़ के बेदार तारो तुम न सो जाना

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए: राहत इंदौरी

बीमार को मरज़ की दवा देनी चाहिए 
मैं पीना चाहता हूँ पिला देनी चाहिए 

अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में 
है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए 

दिल भी किसी फ़क़ीर के हुजरे से कम नहीं 
दुनिया यहीं पे ला के छुपा देनी चाहिए

मैं ख़ुद भी करना चाहता हूँ अपना सामना 
तुझ को भी अब नक़ाब उठा देनी चाहिए 

मैं फूल हूँ तो फूल को गुल-दान हो नसीब 
मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए 

मैं ताज हूँ तो ताज को सर पर सजाएँ लोग 
मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए 
मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद हो 
मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए 

मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाइए मुझे 
मैं नींद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए 

सच बात कौन है जो सर-ए-आम कह सके 
मैं कह रहा हूँ मुझ को सज़ा देनी चाहिए! 

Friday, March 20, 2020

मिर्जा गालिब शायरी

-वजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब,
जिसे खुद से बढ़ कर चाहो, वो रूलाता ज़रूर है.!

थी खबर गर्म, के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े,
देखने हम भी गए थे, पर तमाशा न हुआ.!

Unke Dekhne Se Jo,
Aa Jaati Hai Muhh Par Ronak,
Vo Samajhte Hain Ki,
Bimar Ka Haal Accha Hai.!

तेरी दुआओं में असर हो तो, मस्जिद को हिला के दिखा,
नहीं तो दो घूँट पी और मस्जिद को हिलता देख.!

बाजीचा-ऐ-अतफाल है दुनिया मेरे आगे,
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मेरे आगे.!


Hazaron Khwaishein Aisi Ki,
Har Khwashish Pe Dam Nikle,
Bahut Nikle Mere Arman Lekin,
Phir Bhi Kam Nikle.!



Ishrat-e-qatra Hai,
Dariya Mein Fanaa Ho Jaana
Dard Ka Had Se Guzarna Hai,
Dava Ho Jaana..!



Hum Ko Maalum Hai,
Jannat Ki Haqiqat Lekin,
Dil Ke Khush Rakhne Ko,
Ghalib Ye Khayal Achha Hai.!




Mohabbat Mein Nahin Hai Fark,
Jeene Aur Marne Ka,
Usi Ko Dekh Kar Jeete Hain,
Jis Kafir Pe Dam Nikle.!

Shayari Of Ghalib On Ishq



तोड़ा कुछ इस अदा से, ताल्लुक उस ने ग़ालिब,
के सारी उम्र अपना क़सूर ढूँढ़ते रहे..!


मैं नादान था जो वफ़ा को,
तलाश करता रहा ‘ग़ालिब’,
यह न सोचा के एक दिन,
अपनी साँस भी बेवफा हो जाएगी..!

लफ़्ज़ों की तरतीब मुझे
बांधनी नहीं आती “ग़ालिब”
हम तुम को याद करते हैं सीधी सी बात है..!





सबने पहना था बड़े शौक से कागज़ का लिबास,
जिस कदर लोग थे बारिश में नहाने वाले,
अदल के तुम न हमे आस दिलाओ,
क़त्ल हो जाते हैं ज़ंज़ीर हिलाने वाले

Thursday, March 19, 2020

इश्क शायरी

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है 
~ जिगर मुरादाबादी

हम इश्क़ के मारों का इतना ही फ़साना है 
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है

~ जिगर मुरादाबादी

कोई समझे तो एक बात कहूँ 
इश्क़ तौफ़ीक़ है गुनाह नहीं 

~फ़िराक़ गोरखपुरी

अदायें सीख लीं तुमनें, नज़र से क़त्ल करने की ..
 मगर तालीम न सीखी, किसी से इश्क़ करने की.

इश्क़ पर ज़ोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब' 
कि लगाए न लगे और बुझाए न बने

इक लफ़्ज़-ए-मोहब्बत का अदना ये फ़साना है 
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़ फैले तो ज़माना है 
✍️ जिगर मुरादाबादी

साहिब ए अकल हो तो एक मशविरा तो दो....
एहतियात से इश्क करुं या इश्क से एहतियात! 

नज़र मिला के मेरे पास आ के लूट लिया
नज़र हटी थी कि फिर मुस्कुरा के लूट लिया

ज़िगर मुरादाबादी

सभी अंदाज़-ए-हुस्न प्यारे हैं 
हम मगर सादगी के मारे हैं 

उस की रातों का इंतिक़ाम न पूछ 
जिस ने हँस हँस के दिन गुज़ारे हैं 

ऐ सहारों की ज़िंदगी वालो 
कितने इंसान बे-सहारे हैं

आतिश-ए-इश्क़ वो जहन्नम है 
जिस में फ़िरदौस के नज़ारे हैं

★★★
जिगर मुरादाबादी

क्या हुस्न ने समझा है क्या इश्क़ ने जाना है 
हम ख़ाक-नशीनों की ठोकर में ज़माना है 

★★★
जिगर मुरादाबादी

तुम अच्छे तेराक़ हो तैर कर निकल जाओगे 
मैं आशिक हूँ सिर्फ़ तुम्हारा,मुझे तुझ में ही डूब जाना है 

इश्क कर बैठे मगर हमने ये सोचा ही नहीं
ख़ाक हो जाएंगे हम इश्क़ के अंजाम के बाद।


‏‎करूँगा क्या जो मोहब्बत में हो गया नाकाम 
मुझे तो और कोई काम भी नहीं आता 
~ ग़ुलाम मोहम्मद क़ासिर

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह
या तो सब कुछ ही इसे चाहिये या कुछ भी नहीं! 




अंधेरा, अंधकार, स्याह, अंधियारा, तीरगी शायरी

तीरगी की अपनी ज़िद है जुगनुओं की अपनी ज़िद 
ठोकरों की अपनी ज़िद है हौसलों की अपनी ज़िद 

कौन सा क़िस्सा सुनाऊँ आप को मुश्किल ये है 
आँसुओं की अपनी ज़िद है क़हक़हों की अपनी ज़िद 
प्रबुद्ध सौरभ

तीरगी - अँधेरा

गले लग जाओगे कसकर मिलोगे जब कभी हमसे,
हमें मालूम है ये बेरुखी दो चार दिन की है।

न करिये बंद उम्मीदों की खिड़की, रौशनी होगी
हमें मालूम है ये तीरगी दो चार दिन की है।

~ डॉ. विष्णु सक्सेना

ख़ुशनुमा सुबहा थी जो अब ग़म में डूबी शाम है
रौशनी की इब्तदा का तीरगी अंजाम है

ज़िंदगी की दौड़ ही है मौत की आगोश तक
हर खिलाड़ी के लिये बस एक ही इनाम है

~धर्मेन्द्र श्रीवास्तव

दिलों की तीरगी छोड़ हंस के बोला करो 
आपका ही दिल है दिए जलाया करो 

मुस्कुराहट है हुस्न का जेवर 
रूप बढता है मुस्कुराया करो 

हुकम करना भी सखावत है 
कोई खिदमत हो तो बताया करो 

इस दुनियाँ से दिलकशी न हटे 
सो नित नए पैरहन में आया करो


न खिज़ा में है कोई तीरगी, न बहार में है कोई रौशनी=ये नज़र नज़र के चराग़ हैं, कभी बुझ गए कभी जल गए 
तीरगी - अँधेरा (Darkness)

सब ने मिलाए हाथ यहाँ तीरगी के साथ 
कितना बड़ा मज़ाक़ हुआ रौशनी के साथ 

शर्तें लगाई जाती नहीं दोस्ती के साथ 
कीजे मुझे क़ुबूल मिरी हर कमी के साथ 
— वसीम बरेलवी

मैं नज़र से पी रहा हूं ये समां बदल न जाए
न झुकाओ तुम निगाहें कहीं रात ढल न जाए


क्यूँ ना हो बात "तीरगी" की महफ़िल में
शमाँ बुझने के बाद यहाँ और क्या रह जाएगा
 





शेर गजल शायरी

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए 
- जाँ निसार अख़्तर

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में 
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता 
- बशीर बद्र

छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में 
ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता 
- प्रेम भण्डारी

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए 
शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी 
- निदा फ़ाज़ली

मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने 
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया 
- मीर तक़ी मीर
डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

ज़िंदगी भर की कमाई यही मिसरे दो-चार 
इस कमाई पे तो इज़्ज़त नहीं मिलने वाली 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
इश्क़ जिस से न हो सका उस ने
शायरी में अजब सियासत की
- सलीम कौसर

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए 
मगर सितम है कि सब को सुनाना पड़ता है 
- अज़हर इनायती

'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी 
जो हुस्न है बुतों में जो मस्ती शराब में 
- असग़र गोंडवी
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर 
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

जागीर अपनी शायरी पहले से थी मगर
इक उम्र जब रियाज़ किया साहिरी मिली
- साहिर होशियारपुरी

तुम्हारा 'नुशूर' और तुम्हारा तख़य्युल
मोहब्बत तुम्हारी तो शायर तुम्हारा
- नुशूर वाहिदी
कभी शराब कभी शायरी कभी महफ़िल
फिर इस के बाद धड़कता हुआ अकेला दिल
- जावेद नासिर

शायरी करते रहो लेकिन रहे इतना ख़याल
दुश्मनों से दोस्ती का हौसला बाक़ी रहे
- सरवर उस्मानी
शायर थे बंद एक सिनेमा के हाल में
पंछी फँसे हुए थे शिकारी के जाल में
- दिलावर फ़िगार

किसी खिड़की का शीशा भी नहीं टूटता
शायर अपना काम जारी रखते हैं मगर
- ज़ीशान साहिल

शेर गजल शायरी

हम से पूछो कि ग़ज़ल क्या है ग़ज़ल का फ़न क्या 
चंद लफ़्ज़ों में कोई आग छुपा दी जाए 
- जाँ निसार अख़्तर

हज़ारों शेर मेरे सो गए काग़ज़ की क़ब्रों में 
अजब माँ हूँ कोई बच्चा मिरा ज़िंदा नहीं रहता 
- बशीर बद्र

छुपी है अन-गिनत चिंगारियाँ लफ़्ज़ों के दामन में 
ज़रा पढ़ना ग़ज़ल की ये किताब आहिस्ता आहिस्ता 
- प्रेम भण्डारी

डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

अपने लहजे की हिफ़ाज़त कीजिए 
शेर हो जाते हैं ना-मालूम भी 
- निदा फ़ाज़ली

मुझ को शायर न कहो 'मीर' कि साहब मैं ने 
दर्द ओ ग़म कितने किए जम्अ तो दीवान किया 
- मीर तक़ी मीर
डाइरी में सारे अच्छे शेर चुन कर लिख लिए 
एक लड़की ने मिरा दीवान ख़ाली कर दिया 
- ऐतबार साजिद

ज़िंदगी भर की कमाई यही मिसरे दो-चार 
इस कमाई पे तो इज़्ज़त नहीं मिलने वाली 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़
इश्क़ जिस से न हो सका उस ने
शायरी में अजब सियासत की
- सलीम कौसर

ग़ज़ल का शेर तो होता है बस किसी के लिए 
मगर सितम है कि सब को सुनाना पड़ता है 
- अज़हर इनायती

'असग़र' ग़ज़ल में चाहिए वो मौज-ए-ज़िंदगी 
जो हुस्न है बुतों में जो मस्ती शराब में 
- असग़र गोंडवी
कहीं कहीं से कुछ मिसरे एक-आध ग़ज़ल कुछ शेर 
इस पूँजी पर कितना शोर मचा सकता था मैं 
- इफ़्तिख़ार आरिफ़

जागीर अपनी शायरी पहले से थी मगर
इक उम्र जब रियाज़ किया साहिरी मिली
- साहिर होशियारपुरी

तुम्हारा 'नुशूर' और तुम्हारा तख़य्युल
मोहब्बत तुम्हारी तो शायर तुम्हारा
- नुशूर वाहिदी
कभी शराब कभी शायरी कभी महफ़िल
फिर इस के बाद धड़कता हुआ अकेला दिल
- जावेद नासिर

शायरी करते रहो लेकिन रहे इतना ख़याल
दुश्मनों से दोस्ती का हौसला बाक़ी रहे
- सरवर उस्मानी
शायर थे बंद एक सिनेमा के हाल में
पंछी फँसे हुए थे शिकारी के जाल में
- दिलावर फ़िगार

किसी खिड़की का शीशा भी नहीं टूटता
शायर अपना काम जारी रखते हैं मगर
- ज़ीशान साहिल

Wednesday, March 18, 2020

कभी तस्वीर की सूरत भी निकल आएगी

हम हैं सूखे तालाब पे बैठे हुए हंस
जो तअल्लुक़ को निभाते हुए मर जाते हैं

इसलिए तो हवा अपने घर नहीं जाती
कि उसके बाद ये गलियां उजड़ने लगती हैं

कभी तस्वीर की सूरत भी निकल आएगी
सादा काग़ज़ पे लकीरें तो लगा दी जाएं

कौन सी मंजिल पे आ कर रुक गए अपने क़दम
कारवां पीछे है गर्द-ए-कारवां है सामने
पस्ती में गिरा मैं तो ख़याल आया ये मुझ को
शाख़ों से फूल नहीं बुलंदी से झड़े हैं

न जाने तुम्हें कब फ़ुरसत मिलेगी आने की
तुम्हारे आने के दिन तो गुज़रते जाते हैं
ये दुकानें तो उन्हें रोकती रह जाती हैं
जाने क्यों लोग गुज़र जाते हैं बाज़ारों से 

तेरे लिए चराग़ धरे हैं मुंडेर पर
तू भी अगर हवा की मिसाल आ गया तो बस
मेरे आंसू मेरे अन्दर ही गिरे
रोने से जी औऱ बोझल हो गया

हमें पछाड़ के क्या हैसियत तुम्हारी थी
वो जंग तुम भी न जीते जो हमने हारी थी


शायर - अब्बास ताबिश
किताब - रक़्स जारी है