Saturday, June 17, 2023

मैं नदी हूँ, उसको दरिया बनना था

​

मैं नदी हूँ, उसको दरिया बनना था

मेरे प्रेम का उसको ज़रिया बनना था, 
वो मेरे प्रेम का बाँध बन गया, 
बाँध नहीं बना, प्रेम मिलन में बाधा बन गया | 

अब मैं रुका-सा रहता हूँ कहीं दूर उससे, 
भ्रमित-सा रहता हूँ कई बार स्वयं से, 
यह बाँध खुलेगा भी या नहीं, 
नदी को दरिया मिलेगा भी या नहीं। 

कोई ऐसी बरसात हो जाए, 
प्रेम रूपी नदी इतना उमड़े कि बाँध खुलने को लाचार हो जाए, 
और नदी और दरिया का प्रेम मिलन साकार हो जाए।

कबीर के पद

​मन, तू पार उतर कहँ जैहौ। 

आगे पंथी पंथ न कोई, कूच-मुकाम न पैहौ। 
नहिं तहँ नीर, नाव नहि खेवट, ना गुन खैंचन हारा। 
धरनी-गगन-कल्प कछु नाहीं, ना कछु वार न पारा। 
नहिं तन, नहिं मन, नहीं अपनपौ सुन्न में सुद्ध न पैहौ। 
बलीवान होय पैठो घट में, वाहीं ठौरें होइहौ। 
बार हि बार विचार देख मन, अंत कहूँ मत जैहौ। 
कहैं कबीर सब छाड़ि कलपना, ज्यों के त्यों ठहरैहौ॥ 

भावार्थ:- 

ऐ मेरे दिल, तू पार उतरकर कहाँ जाएगा। तेरे सामने न तो कोई राही है न कोई रास्ता। न कोई प्रस्थान है न पड़ाव। वहाँ न तो पानी है, न कोई नाव, न खेवनहार। नाव को बाँधने के लिए रस्सी भी नहीं है और कोई उसे किनारे खींचने वाला नहीं है। पृथ्वी, आकाश, काल कुछ भी नहीं है। आर-पार कुछ नहीं है। न तन है, न मन, न कोई ऐसी जगह जहाँ आत्मा की प्यास बुझ सके। शून्य के निर्जन विस्तार में कुछ भी तो नहीं है। हिम्मत से काम ले और अपने घट में प्रवेश कर वहीं कोई ठौर-ठिकाना मिलेगा। अच्छी तरह सोच ले, ऐ मन, कहीं और न जाना। कबीर कहते हैं कि कल्पना को छोड़-छाड़कर अपने अस्तित्व में लीन हो जा।

वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया

​कू-ब-कू फैल गई बात शनासाई की 

उस ने ख़ुशबू की तरह मेरी पज़ीराई की 

कैसे कह दूँ कि मुझे छोड़ दिया है उस ने 
बात तो सच है मगर बात है रुस्वाई की 

वो कहीं भी गया लौटा तो मिरे पास आया 
बस यही बात है अच्छी मिरे हरजाई की 

तेरा पहलू तिरे दिल की तरह आबाद रहे 
तुझ पे गुज़रे न क़यामत शब-ए-तन्हाई की 
उस ने जलती हुई पेशानी पे जब हाथ रखा 
रूह तक आ गई तासीर मसीहाई की 

अब भी बरसात की रातों में बदन टूटता है 
जाग उठती हैं अजब ख़्वाहिशें अंगड़ाई की 

Parveen Shakir 


Wednesday, June 14, 2023

जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा

​जो चाहती दुनिया है वो मुझ से नहीं होगा

समझौता कोई ख़्वाब के बदले नहीं होगा 

अब रात की दीवार को ढाना है ज़रूरी 
ये काम मगर मुझ से अकेले नहीं होगा 

ख़ुश-फ़हमी अभी तक थी यही कार-ए-जुनूँ में 
जो मैं नहीं कर पाया किसी से नहीं होगा 

तदबीर नई सोच कोई ऐ दिल-ए-सादा 
माइल-ब-करम तुझ पे वो ऐसे नहीं होगा 

बे-नाम से इक ख़ौफ़ से दिल क्यूँ है परेशाँ 
जब तय है कि कुछ वक़्त से पहले नहीं होगा 


शहरयार

Tuesday, June 13, 2023

तेरा रंग

​जब से इस दिल में से तेरा रंग उतरा है

तब से इस दिल में कोई और रंग नही चढ़ा है 

कभी बिन कारण भी मिलो हमसे

​

कभी बिन कारण भी मिलो हमसे

जब कुछ कहना न हो कोई बात न हो 
तब भी बातें होंगी तुमसे 
जब हमारे पास कोई बात न हो 

साथ तेरे रहना ही काफी है 
गर तेरा कोई बहाना न हो 
हम बिन बोले भी रह लेंगे 
बस तू ज़ज़्बात समझने वाला हो 

कुछ दिन कुछ पल और कितने साल 
बिन तेरे कैसे दिन बिते यार 
है कुछ भी मुझको नहीं याद 
बस तू याद दिलाने वाला हो 

क्या है कौन है और कैसा है 
क्या इन सवालों का जवाब है 
तू आके कह दे एक बार 
के तू साथ निभाने वाला है

हँसने का हूनर तुम्हें कहाँ से आता है

​प्यारी सी मुस्कान,


आंखो की शरारत बन जाती है। 
फिर चाहे रोके कितना ही, 
वो कहा सुन पाती है।। 
क्योंकि 
न्योछावर है इस पर तो, 
खुशियों के खजाने। 
बीत जाती है सदियां और गुजर जाते है जमाने।। 
इसलिए 
अखरता नही है,एक भी पल। 
साथ हो जब हंसी आजकल।। 
चांद भी देखकर ये शरमा जाता है। 
पूछ बैठता है वो भी, 
हसने का हूनर तुम्हे कहा से आता है।।

क्या याद तुम्हें

​है याद मुझे

बिजली का चमकना 
बादल का कडकना 
बूंदे गिरना 
नदी की कलकल 
आंख मिलाना 
क्या याद तुम्हें 
वो भीगी सी रात। 
काली घटायें 
बगुलों का उड़ना 
मेंढक की टर टर 
वो फिसली गलियां 
गीली टहनी 
बूढ़े बरगद की 
क्या याद तुम्हें 
बगिया की बात। 
पूनम की रात 
मोती सी बूंदे 
बारिश के बाद 
पीपल के पत्तों से गिरना 
नम शाम की 
चिड़ियों का कलरव 
जीवन का अनुभव 
मन के भाव 
वो अपना गांव 
क्या याद तुम्हें 
वह नदी घाट। 
है याद मुझे 
वो मन की बात 
शर्मीली आंखे 
मिलने की चाह 
अगस्त माह 
आशा हजार 
सपनों का तार 
सब याद मुझे 
क्या याद तुम्हें 
सब बीती बात। 

हम फिर मिलेंगे

​गर महफ़िल न हो साथ तो हम फिर मिलेंगे

तन्हा हो दिन-रात तो हम फिर मिलेंगे 

दिलकश तरानों में भला दूर ही सही 
बिखर गये जज़्बात तो हम फिर मिलेंगे 

यूं तो दुवा हमेशा तेरे सुकून की मांगी 
वक्त लाये कोई उफ्ताद तो हम फिर मिलेंगे 

खुशियों में बेशक ही अपनी झूम लेना तुम 
छेड़खानी करे हालात तो हम फिर मिलेंगे 

रूठे पल में जब अपने ही गैर हो जायें 
कोई न रखे एहतियात तो हम फिर मिलेंगे 

फिर वो बरसात ध्यान में आई

​

फिर वो बरसात ध्यान में आई,

तब कहीं जान जान में आई


फूल पानी में गिर पड़े सारे 
अच्छी जुम्बिश चटान में आई 

रौशनी का अता-पता लेने 
शब-ए-तीरा जहान में आई 

रक़्स-ए-सय्यार्गां की मंज़िल भी 
सफ़र-ए-ख़ाक-दान में आई 



सरवत हुसैन