कहां जाऊगी में
मंजिल तो दूर की बात है
चार क़दम भी चल ना पाऊंगी में
तेरा प्यार है
जो समेटे हुए है "मुझे"
जो ना हो तुम साथ
तो
बिखर जाऊगी में
तुम से अलग हो कर...
आशु तो कुछ भी नहीं आसूँ के सिवा, जाने क्यों लोग इसे पलकों पे बैठा लेते हैं।
सर्दी में दिन सर्द मिला
हर मौसम बेदर्द मिला
ऊँचे लम्बे पेड़ों का
पत्ता पत्ता ज़र्द मिला
सोचते हैं क्यूँ ज़िंदा हैं
अच्छा ये सर-दर्द मिला
हम रोए तो बात भी थी
क्यूँ रोता हर फ़र्द मिला