Thursday, December 31, 2020

आरज़ू, मुराद शायरी

मंज़िल मिली मुराद मिली मुद्दआ मिला
सब कुछ मुझे मिला जो तिरा नक़्श-ए-पा मिला


तेरे जल्वों ने मुझे घेर लिया है ऐ दोस्त 
अब तो तन्हाई के लम्हे भी हसीं लगते हैं 

कैसी ताबीर की हसरत कि 'दोस्त' बरसों से
ना-मुराद आँखों ने देखा ही नहीं ख़्वाब कोई

अब क्या बताऊँ मैं तिरे मिलने से क्या मिला 
इरफ़ान-ए-ग़म हुआ मुझे अपना पता मिला 

इश्क़ इश्क़ हो शायद हुस्न में फ़ना हो कर
इंतिहा हुई ग़म की दिल की इब्तिदा हो कर

दिल हमें हुआ हासिल दर्द में फ़ना हो कर
इश्क़ का हुआ आग़ाज़ ग़म की इंतिहा हो कर

ना-मुराद रहने तक ना-मुराद जीते हैं
साँस बन गया इक एक नाला ना-रसा हो कर



शगुफ़्तगी का लताफ़त का शाहकार हो तुम 

फ़क़त बहार नहीं हासिल-ए-बहार हो तुम 

जो एक फूल में है क़ैद वो गुलिस्ताँ हो 

जो इक कली में है पिन्हाँ वो लाला-ज़ार हो तुम 

हलावातों की तमन्ना, मलाहतों की #मुराद 

ग़ुरूर कलियों का फूलों का इंकिसार हो तुम 

कैफ़ी आज़मी

दिल की मुराद है के किसी रोज़ आ के तू
बिन ईद के भी ईद का एहसास दिला दे

Wednesday, December 30, 2020

चाय शायरी

एक चाय की प्याली कितना सुकून देती है, 
दिसम्बर को जून कर देती है. 
.. 

घी मिस्री भी भेज कभी अख़बारों में
कई दिनों से चाय है कड़वी या अल्लाह
निदा फ़ाज़ली

चाय की प्याली में नीली टेबलेट घोली
सहमे सहमे हाथों ने इक किताब फिर खोली
बशीर बद्र

बिखरता जाता है कमरे में सिगरटों का धुआं
पड़ा है ख़्वाब कोई चाय की प्याली में
नज़ीर क़ैसर

उसने चलते चलते लफ़्ज़ों का ज़हराब
मेरे जज़्बों की प्याली में डाल दिया
अब्दुर्रहीम नश्तर

सामने रख के चाय की प्याली
चुस्की चुस्की तेरी कमी चक्खी
नाहिद अख़्तर बलूच

कुछ होश नहीं मुझ में रहा जब से पिलाई
उस नर्गिस-ए-मख़मूर की साक़ी ने प्याली
आफ़ताब शाह आलम सानी

सिगरटें चाय धुआं रात गए तक बहसें
और कोई फूल सा आंचल कहीं नम होता है
वाली आसी

ज़रा सी चाय गिरी और दाग़ दाग़ वरक़
ये ज़िंदगी है कि अख़बार का तराशा है
आमिर सुहैल

छोड़ आया था मेज़ पर चाय
ये जुदाई का इस्तिआरा था
तौक़ीर अब्बास 

Sunday, December 27, 2020

हम तो फ़ना हो गए उनकी आँखें देखकर

 हम तो फ़ना हो गए ग़ालिब उनकी आँखें देखकर,

ना जाने वो  आइना कैसे देखते होंगे!

कोशिशों से भी क्या नहीं मिलता ।।

क्यों मुश्किलों का हल नहीं मिलता ।

क्यों मुकद्दर पे बस नहीं चलता ।।

खुद पर बस एतबार हो तेरा ।

कोशिशों से भी क्या नहीं मिलता ।।

उन का ख़याल हर तरफ़ उन का जमाल हर तरफ़

1. इधर से देखें तो अपना मकान लगता है


इक और ज़ाविए से आसमान लगता है
जो तुम हो पास तो कहता है मुझ को चीर के फेंक

वो दिल जो वक़्त-ए-दुआ बे-ज़बान लगता है
शुरू-ए-इश्क़ में सब ज़ुल्फ़ ओ ख़त से डरते हैं
अख़ीर उम्र में इन ही में ध्यान लगता है
सरकने लगती है तब ही क़दम तले से ज़मीन
जब अपने हाथ में सारा जहान लगता है
दो चार घाटियाँ इक दश्त कुछ नदी नाले
बस इस के ब'अद हमारा मकान लगता है 

2. उन का ख़याल हर तरफ़ उन का जमाल हर तरफ़
हैरत-ए-जल्वा रू-ब-रू दस्त-ए-सवाल हर तरफ़
मुझ से शिकस्ता-पा से है शहर की तेरे आबरू
छोड़ गए मिरे क़दम नक़्श-ए-कमाल हर तरफ़
हम हैं जवाँ भी पीर भी हम हैं अदम भी ज़ीस्त भी
हम हैं असीर-ए-हल्का-ए-क़ौल-ए-मुहाल हर तरफ़
नग़्मा गिरा है बूँद बूँद फिर भी उठी है कितनी गूँज
उड़ती फिरे है ज़ेहन में गर्द-ए-ख़याल हर तरफ़
क़लब-ए-हयात-ओ-मौत से मिल न सका कोई जवाब
फेंका किए हैं गरचे हम संग-ए-सवाल हर तरफ़ .

3. बनाएँगे नई दुनिया हम अपनी
तिरी दुनिया में अब रहना नहीं है .

मेहनत ही रंग लाएगी।

कह दो दिल से, जी- जान लगाना

ये मेहनत ही रंग लाएगी।

उजड़ चुके गुलशन में मेहनत

फिर से बहारें लाएंगी।

कह दो दिल से, समय ना खोना
ये घड़ियां गुज़र जो जाएंगी।
लाख जतन कर लेना बेशक
ये लौट के फिर ना आएंगी।

कह दो दिल से, नई राहें बनाना
बेशक, मुश्किलें तो आएंगी
आखिर ये मुश्किलें ही हमको
मंजिल तक ले जाएंगी।

कह दो दिल से, धीरज ना खोना
अपनी बारी भी आएगी।
दिखती है जो बिगड़ी हुई
वो बात भी कल बन जाएगी।

बड़ा ही रोमांचक था, जीने का फंडा,

बड़ा ही रोमांचक था, जीने का फंडा,

कंचों की गोली वह गिल्ली औ डंडा।

छड़ी से चलाना तब टायर की गाड़ी,

छुकछुक-छुकछुक, चलाना रेलगाड़ी।

कमानी पतंगों संग वह डोर औ लटाई,
लोई गोंद के संग में कांच की पिसाई।
फिर कटना मांझे से हाथों की अंगुली,
और गुस्से में खाना, बापू की पिटाई।

उछल कूद डालियों पे, फल का चुराना,
अगर पकड़े गए तो खूब बहाने बनाना।
नदिया में दोपहर तक मछली पकड़ना,
कूं-कूं करता पिल्ला बाहों में जकड़ना।

जोड़-जोड़ कर गुल्लक में पैसा बचाना,
लत्ती सरकाकर दिनभर लट्टू नचाना।
वो छुप्पन छुपाई का खेल और कबड्डी,
साईकिल चलाने में, ना रहना फिसड्डी।

सोच में पड गयी क्या, अरे घोग्घो रानी,
बताओ तेरी नदिया में, कितना है पानी?
तू गोटियां उछाल, आज खेलो रे किट्टो,
फिर आँखें मूंद अपनी, खेलें मार पिट्टोI

आओ खेलें ओका, बोका तीन तड़ोका,
देखो खेल-खेल में, ना करना तू धोखा।
दौड़, जीत-हार होगी, किसकी स्पर्धा में,
फैसले की खातिर, एक सिक्का उछालें।
आज फिर यादों का, एल्बम खंगालें।

Thursday, December 24, 2020

क्यों तेरी ललक रखूं

काजल रखूं कि गजल रखूं अलक रखूं कि पलक रखूं
तू इक बार नज़र आ जाए तो मैं तेरा नाम झलक रखूं
बस अब और ना तरसा मुझपे अपने प्यार की बारिश बरसा
बता इस तरह प्यासा मैं अपने दिल को कब तलक रखूं

तेरे लिए आसमां के तारे लाऊँ जन्नत के हसीं नज़ारे लाऊँ
और तू जो कहे तो तेरे कदमों में लाकर मैं फलक रखूं

तुझ पर जिंदगी फना कर दूं तुझको कैसे मैं मना कर दूं
हो अगर तेरा इशारा तो मैं दार पर अपना हलक रखूं

बरसों से वीरान पड़ा मेरे दिल का चमन खिलना ही नहीं
तू मुझको मिलना ही नहीं तो फिर क्यों तेरी ललक रखूं

नामचीन'मुझसे अगर कहे कोई फलक लोगे या खलक लोगे
तो फिर ठुकराकर फलक को में अपने पास खलक रखूं

Wednesday, December 23, 2020

जब कभी भी तुम्हारा ख़्याल आ गया

हर रोज़ गिरकर भी,
 मुक़म्मल खड़े हैं...! 
ऐ ज़िंदगी देख, 
 मेरे हौसले तुझसे भी बड़े हैं ...!

सुनो,आओ मेरे सीने से लिपट जाओ
ये दिसम्बर की सर्द हवाए कही तुम्हे बीमार ना कर दे. 

कभी किसी का ख्याल थे हम भी
गए दिनों में कमाल थे हम भी |

शाम से आँख में नमी सी है 
आज फिर आप की कमी सी है 
~ गुलज़ार

गो ये दर्दे दिल मेरा कुछ कम नहीं
गर तेरा ग़म है तो कोई ग़म नहीं
दिल में अश्कों का समुन्दर है मेरे
क्या हुआ गर आंख मेरी नम नहीं.

याद आएगी हर रोज मगर तुझे आवाज ना दूंगा,
लिखूँगा तेरे लिए ही हर ग़ज़ल, मगर तेरा नाम ना लूंगा...

सब कुछ सुनना कुछ ना कहना कितना मुश्किल है।
तुमसे बिछड़ के जिंदा रहना कितना मुश्किल है।।

तेरे जिक्र से जहन में एक हलचल मच जाती है
आती है बात होठों पर ओर गजल बन जाती है


चाँदी सोना एक तरफ़, 
तेरा होना एक तरफ़, 
एक तरफ़ तेरी आँखें,
जादू टोना एक तरफ़।।

उस की हसरत है जिसे दिल से मिटा भी न सकूँ 
ढूँडने उस को चला हूँ जिसे पा भी न सकूँ 
~ अमीर मीनाई

ग़म मुझे हसरत मुझे वहशत मुझे सौदा मुझे
एक दिल दे कर ख़ुदा ने दे दिया क्या क्या मुझे
सीमाब अकबराबादी

हर रोज ही जुबाँ पे, तेरी बात क्यों आती है।
बादल बिना ही नैनो से, बरसात क्यों आती है।
दिन तो गुजार देते हैं, जीवन की उलझनों में।
गम का हिसाब करने को, ये रात क्यों आती है।


काग़ज़ काग़ज़ हर्फ़ सजाया करता है
तन्हाई में शहर बसाया करता है
कैसा पागल शख्स है सारी-सारी रात
दीवारों को दर्द सुनाया करता है
रो देता है आप ही अपनी बातों पर
और फिर खुद को आप हंसाया करता है...

कोई चराग़ जलाता नहीं सलीक़े से 
मगर सभी को शिकायत हवा से होती है 


कुछ न था मेरे पास खोने को 
तुम मिले हो तो डर गया हूँ मैं


आँसूओं की जहाँ पायमाली रही
ऐसी बस्ती चराग़ों से ख़ाली रही
जब कभी भी तुम्हारा ख़्याल आ गया
फिर कई रोज़ तक बेख़याली रही
चाँद तारे सभी हम-सफ़र थे मगर
ज़िन्दगी रात थी रात काली रही
मेरे सीने पे ख़ुशबू ने सर रख दिया
मेरी बाँहों में फूलों की डाली रही...

बशीर बद्र

ठीक है ख़ुद को हम बदलते हैं 
शुक्रिया मश्वरत का चलते हैं 
हो रहा हूँ मैं किस तरह बरबाद 
देखने वाले हाथ मलते हैं...

जौन एलिया

Tuesday, December 22, 2020

बस एक एहसास से हम तेरे हैं !

"ये कहाँ की रीत है, जागे कोई सोए कोई,
रात सबकी है, तो सबको नींद आनी चाहिए."

खूबसूरती जिसमे दिखी थी सारे जहा से बढ़कर ,
काश बनाने वाले ने उसमे थोड़ा वफ़ा भी दिया होता..

ना निकाह है, ना फेरे हैं
बस एक एहसास से हम तेरे हैं !

तेरा ख़्याल तेरी तलब और तेरी आरज़ू...
इक भीड़ से लगी है मेरे दिल के शहर में..

जिंदगी की कसौटी से हर रिश्ता गुजर गया,
कुछ निकले खरे सोने से,कुछ का पानी उतर गया।