Monday, November 16, 2020

तुम्हारे नील झील-से नैन

तुम्हारे नील झील-से नैन, 
नीर निर्झर-से लहरे केश। 

तुम्हारे तन का रेखाकार 
वही कमनीय, कलामय हाथ 
कि जिसने रुचिर तुम्हारा देश 
रचा गिरि-ताल-माल के साथ, 

करों में लतरों का लचकाव, 
करतलों में फूलों का वास, 
तुम्हारे नील झील-से नैन, 
नीर निर्झर-से लहरे केश। 

उधर झुकती अरुनारी साँझ, 
इधर उठता पूनो का चाँद, 
सरों, शृंगों, झरनों पर फूट 
पड़ा है किरनों का उन्माद, 

तुम्हें अपनी बाँहों में देख 
नहीं कर पाता मैं अनुमान, 
प्रकृति में तुम बिंबित चहुँ ओर 
कि तुममें बिंबित प्रकृति अशेष। 

तुम्हारे नील झील-से नैन, 
नीर झर्झर-से लहरे केश। 


जगत है पाने को बेताब 
नारि के मन की गहरी थाह— 
किए थी चिंतित औ’ बेचैन 
मुझे भी कुछ दिन ऐसी चाह— 

मगर उसके तन का भी भेद 
सका है कोई अब तक जान! 
मुझे है अद्भुत एक रहस्य 
तुम्हारी हर मुद्रा, हर वेश। 
तुम्हारे नील झील-से नैन, 
नीर निर्झर-से लहरे केश। 
कहा मैंने, मुझको इस ओर 
कहाँ फिर लाती है तक़दीर, 

कहाँ तुम आती हो उस छोर 
जहाँ है गंग-जमुन का तीर; 
विहंगम बोला, युग के बाद 
भाग से मिलती है अभिलाष; 
और... अब उचित यहीं दूँ छोड़ 
कल्पना के ऊपर अवशेष। 
तुम्हारे नील झील-से नैन, 
नीर निर्झर-से लहरे केश। 

मुझे यह मिट्टी अपना जान 
किसी दिन कर लेगी लयमान, 
तुम्हें भी कलि-कुसुमों के बीच 
न कोई पाएगा पहचान, 
मगर तब भी यह मेरा छंद 
कि जिसमें एक हुआ है अंग 
तुम्हारा औ’ मेरा अनुराग 
रहेगा गाता मेरा देश। 

तुम्हारे नील झील-से नैन, 
नीर निर्झर-से लहरे केश।

हरिवंशराय बच्चन

तिरी ख़ुशी से अगर ग़म में भी ख़ुशी न हुई

जब मिली आँख होश खो बैठे
कितने हाज़िर-जवाब हैं हम लोग 

ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे 
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है

हम इश्क के मारों का इतना ही फ़साना है 
रोने को नहीं कोई हँसने को ज़माना है 

इब्तिदा वो थी कि जीना था मुहब्बत में मुहाल
इंतिहा ये है कि अब मरना भी मुश्किल हो गया 

मुहब्बत में एक ऐसा वक़्त भी दिल पर गुज़रता है 
कि आंसू ख़ुश्क हो जाते हैं तुगयानी नहीं जाती

मोहब्बत में ये क्या मक़ाम आ रहे हैं 
कि मंजिल पे हैं और चले जा रहे हैं 

ये कह कह के दिल को बहला रहे हैं 
वो अब चल चुके हैं वो अब आ रहे हैं 


हम को मिटा सके ये ज़माने में दम नहीं 
हम से ज़माना ख़ुद है ज़माने से हम नहीं

जान कर मिन्जुमला खासाने मेखाना मुझे
मुद्दतों रोया करेंगे जाम-व-पैमाना मुझे 


यह सुनता हूँ कि प्यासी है बहुत खाक-ए-वतन साकी
खुदा हाफिज़ चला में बांध कर दार-व-रसन साकी
सलामत तू तिरा मेहखाना, तेरी अंजुमन साकी
मुझे करनी है अब कुछ ख़िदमत दार-व-रसन साकी 

तिरी ख़ुशी से अगर ग़म में भी ख़ुशी न हुई
वो ज़िंदगी तो मोहब्बत की ज़िंदगी न हुई
दुनिया के सितम याद न अपनी ही वफ़ा याद
अब मुझ को नहीं कुछ भी मोहब्बत के सिवा याद 

जहल-ए-खिरद ने दिन ये दिखाए
घट गए इंसाँ बढ़ गए साए
वफा का नाम कोई भूल कर नहीं लेता
तेरे सलूक ने चौंका दिया ज़माने को 

आदमी के पास सब कुछ है मगर
एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं
आदमी आदमी से मिलता है
दिल मगर कम किसी से मिलता है
भूल जाता हूँ मैं सितम उस के
वो कुछ इस सादगी से मिलता है
मिल के भी जो कभी नहीं मिलता
टूट कर दिल उसी से मिलता है
रूह को भी मज़ा मोहब्बत का
दिल की हम-साएगी से मिलता है
 

दिल को सुकून रुह को आराम आ गया
मौत आ गई कि दोस्त का पैग़ाम आ गया
दीवानगी हो अक़्ल हो उम्मीद हो कि यास
अपना वही है वक़्त पे जो काम आ गया
 

उन का जो फ़र्ज़ है वो अहल-ए-सियासत जानें
मेरा पैग़ाम मुहब्बत है जहां तक पहुंचे

छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार

“बिजलियाँ, लपटें आशियाँ और हम 
हर तरफ़ फैलता धुआँ और हम।” 


दीवारो-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं 
कोई नहीं बोलता जब तन्हाइयाँ बोलती हैं।  
सुनने की मुहलत मिले तो आवाज़ है पत्थरों में 
उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियाँ बोलती हैं।

चलती-फिरती धूप-छांव से चेहरा बाद में बनता है 
पहले पहले सभी ख़्यालों से तस्वीर बनाते हैं। 
आँखों देखी कहने वाले पहले भी कम-कम ही थे 
अब तो सब ही सुनी सुनाई बातों को दोहराते हैं। 
इस धरती पर आकर, अपना कुछ खो जाता है 
कुछ रोते हैं, कुछ इस ग़म में अपनी ग़ज़ल सजाते हैं। 

"मुँह की बात सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन, 
आवाज़ों के बाज़ारों में खामोशी पहचाने कौन। 
किरन-किरन अलसाता सूरज पलक-पलक खुलती नीदें 
धीमे -धीमें बिखर रहा है ज़र्रा-ज़र्रा जाने कौन।" 

"धूप में निकलो घटाओं में नहाकर देखो 
ज़िन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो। 
सिर्फ़ आंखों से ही दुनिया नहीं देखी जाती 
दिल की धड़कन को भी बीनाइ बनाकर देखो।" 

"कोई हिन्दू कोई मुस्लिम कोई ईसाई है 
सब ने इंसान न बनने की क़सम खाई है" 

"कभी किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता 
कहीं ज़मीऩ कहीं आस्मां नहीं मिलता" 

"कहां चिराग जलाएँ, कहां गुलाब रखें 
छतें तो मिलती हैं लेकिन मकां नहीं मिलता"

चाहे गीता बांचिये या पढ़िये कोरान 
तेरा मेरा प्यार ही हर पुस्तक का ज्ञान। 
लेके तनके नाप को घूमें बस्ती गाँव। 
हर चादर के घेर से बाहर निकले पाँव। 
सातों दिन भगवान के क्या मंगल क्या पीर 
जिस दिन सोये देर तक भूखा रहे फकीर। 

मेरी आवाज़ाही पर्दा है मेरे चेहरे का 
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ मुझको वहाँ से सुनिये। 

मन वैरागी, तन अनुरागी, क़दम-क़दम दुश्वारी है 
जीवन जीना सरल न जानो बहुत बड़ी फ़नकारी है। 
औरों जैसे होकर भी हम बाइज़्ज़त हैं बस्ती में 
कुछ लोगों का सीधापन है कुछ अपनी अय्यारी है। 

सफ़र में धूप तो होगी जो चल सको तो चलो। 
सभी हैं भीड़ में तुम भी निकल सको तो चलो। 
किसी के वास्ते राहें कहाँ बदलती हैं 
तुम अपने आपको ख़़ुद ही बदल सको तो चलो। 


हर तरफ़ हर जगह बेशुमार आदमी। 
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी।। 
ज़िन्दगी का मुकद्दर सफर दर सफर 
आख़िरी सांस तक बेक़रार आदमी।।

हर आदमी में होते हैं, दस बीस आदमी। 
जिसको भी देखना हो कई बार देखना।। 
 
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें 
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए


उठ के कपड़े बदल, घर से बाहर निकल जो हुआ सो हुआ। 
रात के बाद दिन, आज के बाद कल जो हुआ सो हुआ। 


"छोटा करके देखिये जीवन का विस्तार 
आँखों भर आकाश है बाँहों भर संसार।" 

"सपना झरना नींद का जागी आँखें प्यास 
पाना खोना खोजना सांसों का इतिहास।"

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला 
चिड़ियों को दाने, बच्चों को गुड़धानी दे मौला। 

फिर रोशन कर ज़हर का प्याला चमका नयी सलीबें 
झूठों की दुनिया में सच को ताबानी दे मौला।

ख़ून से तर-ब-तर कर के हर रहगुज़र थक चुके जानवर 
लकड़ियों की तरह फिर से चूल्हे में जल जो हुआ सो हुआ 
जो मरा क्यूँ मरा जो लुटा क्यूँ लुटा जो जला क्यूँ जला 
मुद्दतों से हैं गुम इन सवालों के हल जो हुआ सो हुआ 

गिरजा में मंदिरों में अज़ानों में बट गया 
होते ही सुब्ह आदमी ख़ानों में बट गया 

इक इश्क़ नाम का जो परिंदा ख़ला में था 
उतरा जो शहर में तो दुकानों में बट गया 

पहले तलाशा खेत फिर दरिया की खोज की 
बाक़ी का वक़्त गेहूँ के दानों में बट गया 

जब तक था आसमान में सूरज सभी का था 
फिर यूँ हुआ वो चंद मकानों में बट गया 

हैं ताक में शिकारी निशाना हैं बस्तियाँ 
आलम तमाम चंद मचानों में बट गया 

ख़बरों ने की मुसव्वरी ख़बरें ग़ज़ल बनीं 
ज़िंदा लहू तो तीर कमानों में बट गया 


मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है

चलो ये इश्क़ नहीं चाहने की आदत है
कि क्या करें हमें दू्सरे की आदत है

तू अपनी शीशा-गरी का हुनर न कर ज़ाया
मैं आईना हूँ मुझे टूटने की आदत है
 

मैं क्या कहूँ के मुझे सब्र क्यूँ नहीं आता
मैं क्या करूँ के तुझे देखने की आदत है


तेरे नसीब में ऐ दिल सदा की महरूमी
न वो सख़ी न तुझे माँगने की आदत है
 
विसाल में भी वो ही है फ़िराक़ का आलम
कि उसको नींद मुझे रत-जगे की आदत है
 
ये मुश्क़िलें हों तो कैसे रास्ते तय हों
मैं ना-सुबूर उसे सोचने की आदत है
 
ये ख़ुद-अज़ियती कब तक "फ़राज़" तू भी उसे
न याद कर कि जिसे भूलने की आदत है

कुछ खुशी दे देना

कुछ खुशी दे देना

ज़रूरत हो अगर चार दियों की
तो चौबीस खरीद लेना
कुछ अपने लिए रख लेना
कुछ उस गरीब को दे देना

जो बैठा होगा ये आस लगाए
कि शायद उसके घर में भी रौशनी हो जाए
पकवानों का स्वाद शायद उसे भी मिल जाए
इस बार तुम भी उसे कुछ खुशी तोहफे में देना

वो रुई बेचने वाली दादी से
ज़रा ज्यादा रुई खरीद लेना
आपकी इस खरीद से मिली खुशी
उसके चेहरे पर पढ़ लेना

वो मिट्टी के ग्वाले बेचने वाली लड़की से
थोड़े और खिलौने खरीद लेना
उसकी आंखों के उन आंसुओं को
तुम बहने से रोक लेना

हम अपनी खुशियों का तो
पूरा खयाल रखते हैं
बस इस बार कुछ उदास चेहरों पर भी
खुशियों की रौशनी कर देना

सच कहती हूं कि मदद करने में
जो सुखद अनुभूति होती है
वो दुनिया की किसी चीज़ में नहीं होती
झूठ लगे मेरी बात, तो आजमा कर देख लेना।।

मुहब्बतों को नफरतों मे बदल दिया तुमने

मुहब्बतों को नफरतों मे बदल दिया तुमने
फिर इंसानियत का चेहरा कुचल दिया तुमने

हिंदू को मुसलमान से जब जब लड़ाना चाहा
होशियारी से दांव धर्म का चल दिया तुमने

जब भी आईना बन जाने को हुआ ये दिल
हर बार कोई रंग जफा का मल दिया तुमने

अब जो देने आए हो उसकी बात करो आज
हम भुला चुके हैं उसको जो कल दिया तुमने

हमने क्या पूछा था मुहब्बत मे तुमसे और
सवाल का हमारे ये क्या हल दिया तुमने

Friday, November 13, 2020

हमें अदाएँ दिवाली की ज़ोर भाती हैं ।

हमें अदाएँ दिवाली की ज़ोर भाती हैं ।
कि लाखों झमकें हरएक घर में जगमगाती हैं ।।
चिराग जलते हैं और लौएँ झिलमिलाती हैं ।
मकां-मकां में बहारें ही झमझमाती हैं ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।1।।
 

गुलाबी बर्फ़ियों के मुँह चमकते-फिरते हैं ।
जलेबियों के भी पहिए ढुलकते-फिरते हैं ।।
हर एक दाँत से पेड़े अटकते-फिरते हैं ।
इमरती उछले हैं लड्डू ढुलकते-फिरते हैं ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।2।।
 

मिठाइयों के भरे थाल सब इकट्ठे हैं ।
तो उन पै क्या ही ख़रीदारों के झपट्टे हैं ।।
नबात[1], सेव, शकरकन्द, मिश्री गट्टे हैं ।
तिलंगी नंगी है गट्टों के चट्टे-बट्टे हैं ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।3।।
 
जो बालूशाही भी तकिया लगाए बैठे हैं ।
तो लौंज खजले यही मसनद लगाते बैठे हैं ।।
इलायची दाने भी मोती लगाए बैठे हैं ।
तिल अपनी रेबड़ी में ही समाए बैठे हैं ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।4।।
 
उठाते थाल में गर्दन हैं बैठे मोहन भोग ।
यह लेने वाले को देते हैं दम में सौ-सौ भोग ।।
मगध का मूंग के लड्डू से बन रहा संजोग ।
दुकां-दुकां पे तमाशे यह देखते हैं लोग ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।5।।
 
दुकां सब में जो कमतर है और लंडूरी है ।
तो आज उसमें भी पकती कचौरी-पूरी है ।।
कोई जली कोई साबित कोई अधूरी है ।
कचौरी कच्ची है पूरी की बात पूरी है ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।6।।
 
कोई खिलौनों की सूरत को देख हँसता है ।
कोई बताशों और चिड़ों के ढेर कसता है ।।
बेचने वाले पुकारे हैं लो जी सस्ता है ।
तमाम खीलों बताशों का मीना बरसता है ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।7।।
 
और चिरागों की दुहरी बँध रही कतारें हैं ।
और हरसू कुमकुमे कन्दीले रंग मारे हैं ।।
हुजूम, भीड़ झमक, शोरोगुल पुकारे हैं ।
अजब मज़ा है, अजब सैर है अजब बहारें हैं ।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।8।।
 
अटारी, छज्जे दरो बाम पर बहाली है ।
दिबाल एक नहीं लीपने से खाली है ।।
जिधर को देखो उधर रोशनी उजाली है ।
गरज़ में क्या कहूँ ईंट-ईंट पर दिवाली है ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।9।।
 
जो गुलाबरू हैं सो हैं उनके हाथ में छड़ियाँ ।
निगाहें आशिकों की हार हो गले पड़ियाँ ।।
झमक-झमक की दिखावट से अँखड़ियाँ लड़ियाँ ।
इधर चिराग उधर छूटती हैं फुलझड़ियाँ ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।10।।
 
क़लम कुम्हार की क्या-क्या हुनर जताती है ।
कि हर तरह के खिलौने नए दिखाती है ।।
चूहा अटेरे है चर्खा चूही चलाती है ।
गिलहरी तो नव रुई पोइयाँ बनाती हैं ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।11।।
 
कबूतरों को देखो तो गुट गुटाते हैं ।
टटीरी बोले है और हँस मोती खाते हैं ।।
हिरन उछले हैं, चीते लपक दिखाते हैं ।
भड़कते हाथी हैं और घोड़े हिनहिनाते हैं ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।12।।
 
किसी के कान्धे ऊपर गुजरियों का जोड़ा है ।
किसी के हाथ में हाथी बग़ल में घोड़ा है ।।
किसी ने शेर की गर्दन को धर मरोड़ा है ।
अजब दिवाली ने यारो यह लटका जोड़ा है ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।13।।
 
धरे हैं तोते अजब रंग के दुकान-दुकान ।
गोया दरख़्त से ही उड़कर हैं बैठे आन ।।
मुसलमां कहते हैं ‘‘हक़ अल्लाह’’ बोलो मिट्ठू जान ।
हनूद कहते हैं पढ़ें जी श्री भगवान ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।14।।
 
कहीं तो कौड़ियों पैसों की खनख़नाहट है ।
कहीं हनुमान पवन वीर की मनावट है ।।
कहीं कढ़ाइयों में घी की छनछनाहट है ।
अजब मज़े की चखावट है और खिलावट है ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।15।।
 
‘नज़ीर’ इतनी जो अब सैर है अहा हा हा ।
फ़क़त दिवाली की सब सैर है अहा हा ! हा ।।
निषात ऐशो तरब सैर है अहा हा हा ।
जिधर को देखो अज़ब सैर है अहा हा हा ।।

खिलौने नाचें हैं तस्वीरें गत बजाती हैं ।
बताशे हँसते हैं और खीलें खिलखिलाती हैं ।।16।। 

- नज़ीर अकबराबादी 

मीराबाई की पदावली


1. शबरी प्रसंग
अच्छे मीठे फल चाख चाख, बेर लाई भीलणी।
ऎसी कहा अचारवती, रूप नहीं एक रती।
नीचे कुल ओछी जात, अति ही कुचीलणी।
जूठे फल लीन्हे राम, प्रेम की प्रतीत त्राण।
उँच नीच जाने नहीं, रस की रसीलणी।
ऎसी कहा वेद पढी, छिन में विमाण चढी।
हरि जू सू बाँध्यो हेत, बैकुण्ठ में झूलणी।
दास मीरां तरै सोई, ऎसी प्रीति करै जोइ।
पतित पावन प्रभु, गोकुल अहीरणी।
 

2.
अजब सलुनी प्यारी मृगया नैनों। तें मोहन वश कीधो रे॥ध्रु०॥
गोकुळ मां सौ बात करेरे बाला कां न कुबजे वश लीधो रे॥१॥
मनको सो करी ते लाल अंबाडी अंकुशे वश कीधो रे॥२॥
लवींग सोपारी ने पानना बीदला राधांसु रारुयो कीनो रे॥३॥
मीरां कहे प्रभु गिरिधर नागर चरणकमल चित्त दीनो रे॥४॥
 

3.
अपनी गरज हो मिटी सावरे हम देखी तुमरी प्रीत॥ध्रु०॥
आपन जाय दुवारका छाय ऐसे बेहद भये हो नचिंत॥ ठोर०॥१॥
ठार सलेव करित हो कुलभवर कीसि रीत॥२॥
बीन दरसन कलना परत हे आपनी कीसि प्रीत।
मीरां के प्रभु गिरिधर नागर प्रभुचरन न परचित॥३॥
 
4.
अब तो निभायाँ सरेगी, बांह गहेकी लाज।
समरथ सरण तुम्हारी सइयां, सरब सुधारण काज॥

भवसागर संसार अपरबल, जामें तुम हो झयाज।
निरधारां आधार जगत गुरु तुम बिन होय अकाज॥

जुग जुग भीर हरी भगतन की, दीनी मोच्छ समाज।
मीरां सरण गही चरणन की, लाज रखो महाराज॥
 
5.
अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई॥
माता छोडी पिता छोडे छोडे सगा भाई।
साधु संग बैठ बैठ लोक लाज खोई॥
सतं देख दौड आई, जगत देख रोई।
प्रेम आंसु डार डार, अमर बेल बोई॥
मारग में तारग मिले, संत राम दोई।
संत सदा शीश राखूं, राम हृदय होई॥
अंत में से तंत काढयो, पीछे रही सोई।
राणे भेज्या विष का प्याला, पीवत मस्त होई॥
अब तो बात फैल गई, जानै सब कोई।
दास मीरां लाल गिरधर, होनी हो सो होई॥
 
6.
अब तौ हरी नाम लौ लागी।
सब जगको यह माखनचोरा, नाम धर्यो बैरागीं॥
कित छोड़ी वह मोहन मुरली, कित छोड़ी सब गोपी।
मूड़ मुड़ाइ डोरि कटि बांधी, माथे मोहन टोपी॥
मात जसोमति माखन-कारन, बांधे जाके पांव।
स्यामकिसोर भयो नव गौरा, चैतन्य जाको नांव॥
पीतांबर को भाव दिखावै, कटि कोपीन कसै।
गौर कृष्ण की दासी मीरां, रसना कृष्ण बसै॥ 
 
7.
बंसीवारा आज्यो म्हारे देस। सांवरी सुरत वारी बेस।।
ॐ-ॐ कर गया जी, कर गया कौल अनेक।
गिणता-गिणता घस गई म्हारी आंगलिया री रेख।।
मैं बैरागिण आदिकी जी थांरे म्हारे कदको सनेस।
बिन पाणी बिन साबुण जी, होय गई धोय सफेद।।
जोगण होय जंगल सब हेरूं छोड़ा ना कुछ सैस।
तेरी सुरत के कारणे जी म्हे धर लिया भगवां भेस।।
मोर-मुकुट पीताम्बर सोहै घूंघरवाला केस।
मीरा के प्रभु गिरधर मिलियां दूनो बढ़ै सनेस।।
 
8.
अरज करे छे मीरा रोकडी। उभी उभी अरज॥ध्रु०॥
माणिगर स्वामी मारे मंदिर पाधारो सेवा करूं दिनरातडी॥१॥
फूलनारे तुरा ने फूलनारे गजरे फूलना ते हार फूल पांखडी॥२॥
फूलनी ते गादी रे फूलना तकीया फूलनी ते पाथरी पीछोडी॥३॥
पय पक्कानु मीठाई न मेवा सेवैया न सुंदर दहीडी॥४॥
लवींग सोपारी ने ऐलची तजवाला काथा चुनानी पानबीडी॥५॥
सेज बिछावूं ने पासा मंगावूं रमवा आवो तो जाय रातडी॥६॥
मीरा कहे प्रभु गिरिधर नागर तमने जोतमां ठरे आखडी॥७॥
 
9.
आई ती ते भिस्ती जनी जगत देखके रोई।
मातापिता भाईबंद सात नही कोई।
मेरो मन रामनाम दुजा नही कोई॥ध्रु०॥
साधु संग बैठे लोक लाज खोई। अब तो बात फैल गई।
जानत है सब कोई॥१॥
आवचन जल छीक छीक प्रेम बोल भई। अब तो मै फल भई।
आमरूत फल भई॥२॥
शंख चक्र गदा पद्म गला। बैजयंती माल सोई।
मीरा कहे नीर लागो होनियोसी हो भई॥३॥ 
 
10.
आओ मनमोहना जी जोऊं थांरी बाट।
खान पान मोहि नैक न भावै नैणन लगे कपाट॥

तुम आयां बिन सुख नहिं मेरे दिल में बहोत उचाट।
मीरा कहै मैं बई रावरी, छांड़ो नाहिं निराट॥

आओ सहेल्हां रली करां है पर घर गवण निवारि॥

झूठा माणिक मोतिया री झूठी जगमग जोति।
झूठा आभूषण री, सांची पियाजी री प्रीति॥

झूठा पाट पटंबरा रे, झूठा दिखडणी चीर।
सांची पियाजी री गूदड़ी, जामें निरमल रहे सरीर॥

छपन भोग बुहाय देहे इण भोगन में दाग।
लूण अलूणो ही भलो है अपणे पियाजीरो साग॥

देखि बिराणे निवांणकूं है क्यूं उपजावे खीज।
कालर अपणो ही भलो है, जामें निपजै चीज॥

छैल बिराणो लाखको है अपणे काज न होय।
ताके संग सीधारतां है भला न कहसी कोय॥

बर हीणो अपणो भलो है कोढी कुष्टी कोय।
जाके संग सीधारतां है भला कहै सब लोय॥

अबिनासीसूं बालबा हे जिनसूं सांची प्रीत।
मीरा कूं प्रभुजी मिल्या है ए ही भगतिकी रीत॥

त्राण- 1. किसी को संकट से मुक्त करने की क्रिया 2. रक्षा; बचाव; परित्राण; हिफ़ाजत 3. भय या चिंता के कारण का निवारण; मुक्ति; राहत 4. जीवन रक्षा 5. बचाव का साधन या उपाय; वह चीज़ जिससे रक्षा हो, जैसे- शिरस्त्राण 6. शरण; आश्रय; सहायता 7. त्रायमाणा नामक लता 8. बख़्तर; कवच, जिसकी रक्षा की गई हो। 

हो रही है साँझ बेला

हो रही है साँझ बेला
चल रहा पथिक अकेला
भोर के जो साथी थे
अब न उनके साथ थे ।
ज्यों ज्यों सूर्य ढल रहा
तिमिर प्रतिपल बढ़ रहा
चेतन अचेतन में
धीरे धीरे बदल रहा ।
शनैः शनैः बिलुप्त होते
सड़क किनारे जो रौनक थी
पास न कोई आ रहा था
तिमिर प्रतिपल बढ़ रहा ।
मैं वाला अहंकार भी अब
धीरे धीरे मर रहा
वासना भी साधना में
धीरे धीरे बदल रहा ।
रवि का अवसान था पर
चंद्र अब निकल रहा
छटपट करती तपीस में
अब शीतलता चहक रहा ।
तरुणाई की अंतिम बेला
संग न कोई संगी मेला
हो रही है साँझ बेला
चल रहा पथिक अकेला ॥

Thursday, November 12, 2020

पक्षी, चिड़िया शायरी

चहचहाती चंद चिड़ियों का बसर था पेड़ पर
मेरे घर इक पेड़ था और एक घर था पेड़ पर
- सज्जाद बलूच

खोल के खिड़की चाँद हँसा फिर चाँद ने दोनों हाथों से
रंग उड़ाए फूल खिलाए चिड़ियों को आज़ाद किया
- निदा फ़ाज़ली

शायद अब मौसम के पंछी आएँ तो चहकार उड़े
चिड़ियों के घर जब से उजड़े पेड़ों पर सन्नाटा है
- मरग़ूब अली


कल रात जो ईंधन के लिए कट के गिरा है
चिड़ियों को बड़ा प्यार था उस बूढ़े शजर से
- परवीन शाकिर

अस्बाब यही है यही सामान हमारा
चिड़ियों से महकता रहे दालान हमारा
- इक़बाल पयाम

अब तो चुप-चाप शाम आती है
पहले चिड़ियों के शोर होते थे
- मोहम्मद अल्वी


उड़ जाता था रूप बदल कर चिड़ियों के
जंगल सहरा दरिया देखा करता था
- आलम ख़ुर्शीद

शायद किसी बला का था साया दरख़्त पर
चिड़ियों ने रात शोर मचाया दरख़्त पर
- अब्बास ताबिश

सूखी टहनी तन्हा चिड़िया फीका चाँद
आँखों के सहरा में एक नमी का चाँद
- जावेद अख़्तर

वो जाता रहा और मैं कुछ बोल न पाया
चिड़ियों ने मगर शोर सा दीवार पे खींचा
- अहमद फ़क़ीह

मैं इसी शहर में आँसू लिए फिरता हूँ जहाँ
पेड़ चिड़ियों की मुनाजात पे शक करते हैं
- जब्बार वासिफ़

चिड़ियों सी चहचहाएँ पनघट पे जब भी सखियाँ
चुप-चाप रो दिया है कोरे घड़े का पानी
- असलम कोलसरी

गरज-बरस प्यासी धरती पर फिर पानी दे मौला
चिड़ियों को दाने बच्चों को गुड़-धानी दे मौला
- निदा फ़ाज़ली

'जान' फिर कर के किसी रोज़ ये उड़ जाएँगी
बेटियाँ बाप के आँगन में हैं चिड़ियों की तरह
- जान काश्मीरी

मैं चिड़ियों को उलझते देख कर लड़ता समझता हूँ
मगर सच्चाई क्या है ये उन्हीं से पूछना होगा
- फ़ज़्ल ताबिश

शायद अब तक मुझ में कोई घोंसला आबाद है
घर में ये चिड़ियों की चहकारें कहाँ से आ गईं
- ज़फ़र गोरखपुरी