Sunday, December 3, 2023

यादगार खूबसूरत बना दो

 हर मुलाकात आधी

और अधूरी होती है।
क्योंकि जिंदगी का
कोई भरोसा नहीं
यह कब इंसान के
अपने हाथ होती है ?
हम जिस वक्त को
सुबह समझते हैं,कब...
शाम में तब्दील हो जाती है?

कभी-कभी पल में
उम्र यूं ही....
तमाम हो जाती है।
पता नहीं जिससे
इस पल हम शिकवा,
शिकायत कर रहे हों।
कल उसके दीदार को
हम तरसते रह जाएं।

इसलिए मुलाकातों को
आधा-अधूरा न रहने दो।
मुलाकात के कीमती पलों को,
यादगार,खूबसूरत बना दो।

आँसू भी सुकून देते हैं

कमजोरी की निशानी नहीं

ये आंसू साथ रहते हैं

हर गम में ताकत बनके

बह के दिल को सुकून देते हैं

दिल लगाना छोड़ दिया

 दिल्लगी से दिल लगाना छोड़ दिया

हमने तेरे शहर मे आना जाना छोड़ दिया

बंज़ारा बने फिरते है महफिल-ऐ-खास मे
एक शख्श ने हमको पागल बना छोड़ दिया

तेरे बेरुख लहज़े ने बड़ा ज़ख़्मी किया हमको
सो हमने तुमसे बोलना-बतियाना छोड़ दिया

ये मेहंदी ये श्रंगार किस काम के तुझ बिन
हमने सज़ने-संवरने का हर बहाना छोड़ दिया

गैरत ढूंढने निकले थे हम बैगैरत शहर मे
गैरत ने तो कबका अपना ठिकाना छोड़ दिया

ज़ब से मिटा है तू हाथ की लकीरो से मेरे
हमने मुक़ददर को आज़माना छोड़ दिया

ज़ब से तू निगाह से ओज़ल हुयी "कृष्णा"
हमने आँखों मे सुरमा सज़ाना छोड़ दिया

वो सितारे जिन की ख़ातिर कई बे-क़रार सदियाँ

वो सितारे जिन की ख़ातिर कई बे-क़रार सदियाँ 

मिरी तीरा-बख़्त दुनिया में सितारा-वार जागीं 


कभी रिफ़अ'तों पे लपकीं कभी वुसअ'तों से उलझीं 

कभी सोगवार सोएँ कभी नग़्मा-बार जागीं 


वो बुलंद-बाम तारे वो फ़लक-मक़ाम तारे 

वो निशान दे के अपना रहे बे-निशाँ हमेशा 


वो हसीं वो नूर-ज़ादे वो ख़ला के शाहज़ादे 

जो हमारी क़िस्मतों पर रहे हुक्मराँ हमेशा 


जिन्हें मुज़्महिल दिलों ने अबदी पनाह जाना 

थके-हारे क़ाफ़िलों ने जिन्हें ख़िज़्र-ए-राह जाना 


जिन्हें कमसिनों ने चाहा कि लपक के प्यार कर लें 

जिन्हें महवशों ने माँगा कि गले का हार कर लें 


जिन्हें आशिक़ों ने चाहा कि फ़लक से तोड़ लाएँ 

किसी राह में बिछाएँ किसी सेज पर सजाएँ 


जिन्हें बुत-गरों ने चाहा कि सनम बना के पूजें 

ये जो दूर के हसीं हैं उन्हें पास ला के पूजें 


जिन्हें मुतरिबों ने चाहा कि सदाओं में पिरो लें 

जिन्हें शाइ'रों ने चाहा कि ख़याल में समो लें 


हो हज़ार कोशिशों पर भी शुमार में न आए 

कभी ख़ाक-ए-बे-बिज़ाअत के दयार में न आए 


जो हमारी दस्तरस से रहे दूर दूर अब तक 

हमें देखते रहे हैं जो ब-सद ग़ुरूर अब तक 


Sahir Ludhianvi 

जिसे कह न पाऊं कहीं

एक दर्द -ए- एहसास

जिसे कह न पाऊं कहीं ।

गुज़रते वक़्त की मानिंद

गुज़र न जाऊं कहीं ।।

मेरी जिन्दगी में तुम आए तो

मेरी जिन्दगी में तुम आए तो एक नया मोड़ आ गया था।

थोड़ा मुस्कुराए तो जीने का शौक आ गया था।।

आचनक से जब तुम छोड़ कर चली गई, तब मेरे दिल ने कहा की।

अब उसके दिल में कोई ओर आ गया था।।

तक़दीर का क्या

सारी क़वायदें, बेपरवाह जु़स्तुज़ू में लग गई,

और उम्र का क्या, उसे ढलना था, ढल गई।


जवानी इत्मिनान से गुज़र रही थी, गुज़र जाती,

मगर, एक रोज़ ये कमबख़्त नज़र फिसल गई।


कल तक मेरे बाजू में खड़ी परहेज़ी दीवारें थी,

जाने जवां हवाओं के साथ,आज कहाँ बहक गई।


मैंने रखी थी किताबों के बीच, तस्वीरें अपनी,

देखा,मेरे ख़यालों की तरह, वो भी बदल गई।


ख़ुदा का क्या,रईसों के क़रीब, ग़रीबों से फ़ासले,

तक़दीर का क्या, कभी रूठी, कभी संभल गई।

काँधे पे जो सर रखकर सोए थे

तेरे ग़म के ख़ज़ाने से मुझे आधा नहीं मिल सकता

कभी भी आईने से रू-ब-रू अंधा नहीं मिल सकता

.

तेरे काँधे पे जो सर रखकर सोए थे हम कभी

अफ़सोस मेरे जनाज़े को वो काँधा नहीं मिल सकता

भरमाया तुमने

जब भी कुछ गाना चाहा

मैंने मुस्कुराना चाहा

पंखों की कामना हुई

मैंने उड़ जाना चाहा

धरती क्या आसमान नज़रों में रहे

बादलों की ओट से-

तुम बुलाते रहे


कभी चाँद बनकर लुभाया तुमने

कभी रात बनकर जगाया तुमने

कभी बादल से घिर -घिर आये

और रुलाया तुमने


मरुभूमि सा रहा मेरा जीवन

मरीचिकाओं में

ताउम्र भरमाया तुमने

Friday, December 1, 2023

सिलसिले मुलाकातों के चलते रहें

हर हाल मे, जिंदा ये रवायत रखना।

हम तुम पर, तुम हम पर, थोड़ी इनायत रखना।

सिलसिले मुलाकातों के चलते रहें।

इस बात की, बस तुम हिमायत रखना।।