Monday, January 9, 2023

मुमकिन ही नहीं होगा शायद

मैं छोड़ शहर के काम धाम 
एक रोज सफर को निकलूंगा
जिस सफर से वापिस आना फिर 
मुमकिन ही नहीं होगा शायद । 

कुछ मन ही मन खुश होंगे, कुछ मुमकिन है जश्न मनाएंगे 
कुछ तो होंगे नाराज बहुत , 
कुछ याद में अश्क बहाएंगे 
पर इन सबसे मैं दूर कहीं बीहड़ रस्तों पर चल चल के 
एक ऐसी जगह पर पहुंचूंगा , 
जिस जगह से वापिस आना फिर 
मुमकिन ही नहीं होगा शायद । 
इस रोती गाती दुनिया को बस एक गीत सुनाऊंगा 
जिस गीत में जिक्र करूंगा मैं एक नन्हीं गुड़िया रानी का 
जिसकी बस एक अम्मा थी , 
पर वो भी कैसे छोड़ चली , 
फिर कैसे कैसे एक बुढ़िया जो कैसे कैसे जीती थी 
कैसे उस नन्हीं को पाला 
और कैसे कैसे बड़ा किया ? 
मैं दुनिया को बताता जाऊंगा 
इस जहां में जिंदा लोग भी हैं , 
कांटों में फूल भी जिंदा हैं । 

फिर उजड़े उजड़े गांवों में मैं फूल लगाने जाऊंगा 
हम मिल के बसाएंगे बस्ती, हम मिल के सजाएंगे दुनिया 
फिर पन्नों पे लिखूंगा हर किस्सा 
फिर छोड़ के खुद को पन्नो में एक रोज हवा हो जाऊंगा 
जिस हवा से वापिस आना फिर , 
मुमकिन ही नहीं होगा शायद ! 
जिस सफर से वापिस आना फिर 
मुमकिन ही नहीं होगा शायद !

तेरी नज़रों ने छूआ तो हम महकने लगे हैं

तेरी नज़रों ने छूआ तो हम महकने लगे हैं
मिले बिना ही तूझसे हम तो मिलने लगे है 

पत्थर में तो फूल का खिलना नामूमकिन है 
मगर पत्थरों में फूल देखो खिलने लगे हैं। 

क्या हूआ इश्क़ में तूमसे मुलाक़ात एक दफा 
लोग चरित्र को भी ग़लत मेरे कहने लगे हैं। 

इश्क़ में खूदा है ये सूना तो था हमने बहुत 
इस हकीकत से रूबरू अब तो होने लगे हैं 

जब से हूआ है मूझे दिदार उसकी सूरत का 
उसकी झलक के खातिर हम तरसने लगे हैं।

लबों की वही अब दुआ हो गये हैं ।

जिंदगी से जैसे 
ख़फ़ा हो गये हैं 
ख़बर है हमें हम 
जुदा हो गये हैं 
क़िस्मत में जिनसे 
मिलना नहीं है 
लबों की वही अब 
दुआ हो गये हैं । 

चाहता था मैं जिसे जी जान से

जैसे हो इन्कार तक पहचान से।
देखते हैं इस तरह अन्जान से। 

कैस से आबाद थे जो कल तलक, 
दिख रहे हैं दश्त वो वीरान से। 

बात पर उनकी भरोसा क्या करूँ, 
जिनका लेना कुछ नहीं ईमान से। 

क्या पता था बेवफ़ा हो जायेगी, 
चाहता था मैं जिसे जी जान से। 

बदतरीं हालात हों कितने हमीद, 
बात करनी चाहिए सम्मान से। 

मैं वो खोई हुई इक चीज़ हूँ जिस का पता तुम हो

मिरा वक़्त मुझ से बिछड़ गया मिरा रंग-रूप बिगड़ गया
जो ख़िज़ाँ से बाग़ उजड़ गया मैं उसी की फ़स्ल-ए-बहार हूँ 


तुम्हें चाहूँ तुम्हारे चाहने वालों को भी चाहूँ
मिरा दिल फेर दो मुझ से ये झगड़ा हो नहीं सकता


कहीं ऐसा न करना वस्ल का वा'दा तो करते हो
कि तुम को फिर कोई कुछ और समझाए तो रहने दो


तुम्हारे नाम से सब लोग मुझ को जान जाते हैं
मैं वो खोई हुई इक चीज़ हूँ जिस का पता तुम हो 

मेल कुछ खेल नहीं था जो बिगाड़ा तू ने
रब्त कुछ रस्म नहीं था जो घटा बैठा है 


उन्हीं लोगों की बदौलत ये हसीं अच्छे हैं
चाहने वाले इन अच्छों से कहीं अच्छे हैं 

आप क्यूँ बैठे हैं ग़ुस्से में मिरी जान भरे
ये तो फ़रमाइए क्या ज़ुल्फ़ ने कुछ कान भरे 


वफ़ा क्या कर नहीं सकते हैं वो लेकिन नहीं करते
कहा क्या कर नहीं सकते हैं वो लेकिन नहीं करते 

पूछा कि दिल को क्या कहूँ बोले कि दीवाना मिरा
पूछा कि उस को क्या हुआ बोले कि बीमारी मिरी 


मुझ को मिटा के कौन सा अरमाँ तिरा मिटा
मुझ को मिला के ख़ाक में क्या ख़ाक मिल गया 

न किसी की आँख का नूर हूँ न किसी के दिल का क़रार हूँ
जो किसी के काम न आ सके मैं वो एक मुश्त-ए-ग़ुबार हूँ 


मोहब्बत में किसी ने सर पटकने का सबब पूछा
तो कह दूँगा कि अपनी मुश्किलें आसान करता हूँ 

गोपालदास 'नीरज' की चुनिंदा शेर

जब चले जाएँगे हम लौट के सावन की तरह 
याद आएँगे प्रथम प्यार के चुम्बन की तरह 

फूल बन कर जो जिया है वो यहाँ मसला गया 
ज़ीस्त को फ़ौलाद के साँचे में ढलना चाहिए 

बदन पे जिस के शराफ़त का पैरहन देखा 
वो आदमी भी यहाँ हम ने बद-चलन देखा 

जितना कम सामान रहेगा 
उतना सफ़र आसान रहेगा 

जितनी भारी गठरी होगी 
उतना तू हैरान रहेगा 

मेरे होंटों पे दुआ उस की ज़बाँ पे गाली 
जिस के अंदर जो छुपा था वही बाहर निकला 

क्या अजब है यही इंसान का दिल भी 'नीरज' 
मोम निकला ये कभी तो कभी पत्थर निकला

तुम चांद बनके जानम, इतराओ चाहे जितना
पर उसको याद रखना, रोशन हो जिसके पीछे

जो ज़ुल्म सह के भी चुप रह गया न ख़ौल उठा,
वो और कुछ हो मगर आदमी का रक्त न था

मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा
मैं रहूँ भूखा तो तुझसे भी न खाया जाए

जिस्म दो होके भी दिल एक हों अपने ऐसे
मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए। 

हर किसी शख़्स की किस्मत का यही है किस्सा,
आए राजा की तरह ,जाए वो निर्धन की तरह

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए 
जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए 

Sunday, January 8, 2023

अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी

अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी!

चाहता था जब हृदय बनना तुम्हारा ही पुजारी, 
छीनकर सर्वस्व मेरा तब कहा तुमने भिखारी, 
आँसुओं से रात दिन मैंने चरण धोए तुम्हारे, 
पर न भीगी एक क्षण भी चिर निठुर चितवन तुम्हारी, 
जब तरस कर आज पूजा-भावना ही मर चुकी है, 
तुम चलीं मुझको दिखाने भावमय संसार प्रेयसि! 
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी! 

भावना ही जब नहीं तो व्यर्थ पूजन और अर्चन, 
व्यर्थ है फिर देवता भी, व्यर्थ फिर मन का समर्पण, 
सत्य तो यह है कि जग में पूज्य केवल भावना ही, 
देवता तो भावना की तृप्ति का बस एक साधन, 
तृप्ति का वरदान दोनों के परे जो-वह समय है, 
जब समय ही वह न तो फिर व्यर्थ सब आधार प्रेयसी! 
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी! 

अब मचलते हैं न नयनों में कभी रंगीन सपने, 
हैं गए भर से थे जो हृदय में घाव तुमने, 
कल्पना में अब परी बनकर उतर पाती नहीं तुम, 
पास जो थे हैं स्वयं तुमने मिटाये चिह्न अपने, 
दग्ध मन में जब तुम्हारी याद ही बाक़ी न कोई, 
फिर कहाँ से मैं करूँ आरंभ यह व्यापार प्रेयसी! 
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी! 

अश्रु-सी है आज तिरती याद उस दिन की नज़र में, 
थी पड़ी जब नाव अपनी काल तूफ़ानी भँवर में, 
कूल पर तब हो खड़ीं तुम व्यंग मुझ पर कर रही थीं, 
पा सका था पार मैं ख़ुद डूबकर सागर-लहर में, 
हर लहर ही आज जब लगने लगी है पार मुझको, 
तुम चलीं देने मुझे तब एक जड़ पतवार प्रेयसी! 
अब तुम्हारा प्यार भी मुझको नहीं स्वीकार प्रेयसी!

-नीरज 

वो तेरी यादें

न भूला हूँ मैं वो तेरी यादें 

तुझे पाने के लिए जो रब से की थी 
न भूला हूँ मैं वो फरियादें 

भीगी भीगी सी फिजा में 
शहर की गलियों में तुझसे मिलना 
इक वो समां न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो बरसातें 

तेरी गली के नुक्कड़ पर बैठ कर 
तेरी इक झलक पाने को बेताब रहना 
इक वो दिन न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो गलियारे 

घर से बहाने बना कर तेरा निकलना 
चांदनी रातों में आकर मुझसे मिलना 
इक वो वक्त न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो मुलाकातें 

इक तेरे शहर को न भूल पाया हूँ मैं 
न भूला हूँ मैं वो तेरी यादें | 

Wednesday, January 4, 2023

एक रात गुजारी न गई तेरे बग़ैर

एक रात गुजारी न गई तेरे बग़ैर
एक रुस्वाई उठाई न गई तेरे बग़ैर 

बेजार हो गया तुझ से बिछड़कर 
खुशियाँ बे-स्वाद हो गई तेरे बग़ैर 

रूह बदन से रुख्सत हो गया 
रूत बेहोश हो गई तेरे बग़ैर 

क्या कहूँ कितनी विरानी है 
क्या कहूँ कितनी जहालत है तेरे बग़ैर 

बदन की पीड़ा झेल नहीं पाया 
जिंदगी अजाब हो गई तेरे बग़ैर 

बहारें उजड़ गई अपनी 
दुनियाँ नाशाद हो गई तेरे बग़ैर 

कुछ नहीं बचा है इस जिस्म में ऐ दोस्त
जिस्म जिस्म को खाता है अब तेरे बग़ैर |

Monday, January 2, 2023

मुक़द्दर में चलना था चलते रहे

मुसाफ़िर के रस्ते बदलते रहे

मुक़द्दर में चलना था चलते रहे 


मिरे रास्तों में उजाला रहा 
दिए उस की आँखों में जलते रहे 

कोई फूल सा हाथ काँधे पे था 
मिरे पाँव शो'लों पे जलते रहे 

सुना है उन्हें भी हवा लग गई 
हवाओं के जो रुख़ बदलते रहे 

वो क्या था जिसे हम ने ठुकरा दिया 
मगर उम्र भर हाथ मलते रहे 

मोहब्बत अदावत वफ़ा बे-रुख़ी 
किराए के घर थे बदलते रहे 

लिपट कर चराग़ों से वो सो गए 
जो फूलों पे करवट बदलते रहे

बशीर बद्र