Friday, March 11, 2022

इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ

नतीजा देखिए कुछ दिन में क्या से क्या निकल आया 
कहीं पे बीज बोया था कहीं पौधा निकल आया 
~ नवाज़ असीमी
नतीजा सुन के कई लोग बद-हवास हुए
ख़ुदा का शुक्र है हम इम्तिहाँ में पास हुए
~कैफ़ अहमद सिद्दीकी
अब हवाएँ ही करेंगी रौशनी का फ़ैसला
जिस दिए में जान होगी वो दिया रह जाएगा
~महशर बदायूंनी
गुफ़्तुगू देर से जारी है नतीजे के बग़ैर 
इक नई बात निकल आती है हर बात के साथ 
~ऐतबार साजिद
वफ़ा का लाज़मी था ये नतीजा
सज़ा अपने किए की पा रहा हूँ
~ हफ़ीज़ जालंधरी

Thursday, March 10, 2022

गुमसुम रात में किसी तरह नींद आई थी

रघुवीर सहाय: 

गुमसुम रात में किसी तरह नींद आई थी
इस अचानक दौड़ती बौछार ने जगा दिया
कैसा दर्द दिल में उठा इस गाने से
कोई भी कष्ट हो वह जगा देता है
ऐसे ही चौंका कर
ऐसे ही बेचारी पलकों की मजेदार नींद
उचट जाया करती है
और आज तो ऐसे कि यह लगने लगा
सभी मेरे छोटे छोटे भोर
सभी कष्ट मेरे एक हैं।

सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं

इल्म भी आज़ार लगता है मुझे
आदमी अख़बार लगता है मुझे
~ अहमद सोज़
मिरे क़बीले में ता'लीम का रिवाज न था 
मिरे बुज़ुर्ग मगर तख़्तियाँ बनाते थे 
~ लियाक़त जाफ़री
यही जाना कि कुछ न जाना हाए 
सो भी इक उम्र में हुआ मालूम 
~ मीर तक़ी मीर
हद से बढ़े जो इल्म तो है जहल दोस्तो 
सब कुछ जो जानते हैं वो कुछ जानते नहीं 
~ ख़ुमार बाराबंकवी
थोड़ी सी अक़्ल लाए थे हम भी मगर 'अदम' 
दुनिया के हादसात ने दीवाना कर दिया 
~ अब्दुल हमीद अदम

सुन के तिरा नाम मैं कुछ सोच रहा हूँ

ख़ाली है अभी जाम मैं कुछ सोच रहा हूँ 
ऐ गर्दिश-ए-अय्याम मैं कुछ सोच रहा हूँ 

साक़ी तुझे इक थोड़ी सी तकलीफ़ तो होगी 
साग़र को ज़रा थाम मैं कुछ सोच रहा हूँ 

पहले बड़ी रग़बत थी तिरे नाम से मुझ को 
अब सुन के तिरा नाम मैं कुछ सोच रहा हूँ 

इदराक अभी पूरा तआ'वुन नहीं करता 
दय बादा-ए-गुलफ़ाम मैं कुछ सोच रहा हूँ 

हल कुछ तो निकल आएगा हालात की ज़िद का 
ऐ कसरत-ए-आलाम मैं कुछ सोच रहा हूँ 

फिर आज 'अदम' शाम से ग़मगीं है तबीअ'त 

फिर आज सर-ए-शाम मैं कुछ सोच रहा हूँ  अब्दुल हमीद अदम

थकन से राह में चलना मुहाल भी है मुझे

​थकन से राह में चलना मुहाल भी है मुझे 

कमाल पर भी था मैं ही ज़वाल भी है मुझे 

सड़क पे चलते हुए रुक के देखता हूँ मैं 
यहीं कहीं है तू ये एहतिमाल भी है मुझे 

ये मेरे गिर्द तमाशा है आँख खुलने तक 
मैं ख़्वाब में तो हूँ लेकिन ख़याल भी है मुझे 

उसी के लुत्फ़ से मरने से ख़ौफ़ आता है 
उसी के डर से ये जीना मुहाल भी है मुझे


सवाद-ए-शाम-ए-सफ़र है जला जला सा 'मुनीर' 
ख़ुशी के साथ अजब सा मलाल भी है मुझे

मुनीर नियाज़ी

उनके दिल तक जाना था

​जिस्म की बात नहीं थी

उनके दिल तक जाना था

लम्बी दूरी तय करने में 

वक़्त तो लगता है


गाँठ अगर लग जाए तो फिर रिश्ते हों या डोरी

लाख करें कोशिश खुलने में वक़्त तो लगता है 


खेल ज़िंदगी के तुम खेलते रहो यारो
हार जीत कोई भी आख़िरी नहीं होती 

सामने कोई भँवर है न तलातुम फिर भी
छूटती जाए है पतवार ये क़िस्सा क्या है 


हमें पसंद नहीं जंग में भी मक्कारी
जिसे निशाने पे रक्खें बता के रखते हैं 
रंग बदलती इस दुनिया में सब कुछ बदल गया लेकिन
मेरे लबों पर तेरा फ़साना पहले भी था आज भी है 


ये तजरबा हुआ है मोहब्बत की राह में
खो कर मिला जो हम को वो पा कर नहीं मिला 
जब उस ने ही दुनिया का ये दीवान रचा है
हर आदमी प्यारी सी ग़ज़ल क्यूँ नहीं होता 


ज़माने के लिए जो हैं बड़ी नायाब और महँगी
हमारे दिल से सब की सब हैं वो उतरी हुई चीज़ें 

मंज़िल ने दिए ताने रस्ते भी हँसे लेकिन
चलते रहे अक्सर हम कुछ और तरह से भी 


सोच समझ सब ताक़ पे रख कर

प्यार में बच्चों सा मचला कर 


-हस्तीमल हस्ती




सुनते हैं के मिल जाती है हर चीज़ दुआ से

​सुनते हैं के मिल जाती है हर चीज़ दुआ से

इक रोज़ तुम्हें माँग के देखेंगे ख़ुदा से 

दुनिया भी मिली है ग़म-ए-दुनिया भी मिला है 
वो क्यूँ नहीं मिलता जिसे माँगा था ख़ुदा से 

ऐ दिल तू उन्हें देख के कुछ ऐसे तड़पना 
आ जाये हँसी उनको जो बैठे हैं ख़फ़ा से 

जब कुछ ना मिला हाथ दुआओं को उठा कर 
फिर हाथ उठाने ही पड़े हमको दुआ से 
आईने में वो अपनी अदा देख रहे हैं 
मर जाए कि जी जाए कोई उनकी बला से 

तुम सामने बैठे हो तो है कैफ़ की बारिश 
वो दिन भी थे जब आग बरसती थी घटा से 

राना अकबराबादी:

Friday, March 4, 2022

मैं अपने-आप में भरपूर हो जाऊँ

ये कब चाहा कि मैं मशहूर हो जाऊँ 
बस अपने आप को मंज़ूर हो जाऊँ 

नसीहत कर रही है अक़्ल कब से 
कि मैं दीवानगी से दूर हो जाऊँ 

न बोलूँ सच तो कैसा आईना मैं 
जो बोलूँ सच तो चकना-चूर हो जाऊँ 

है मेरे हाथ में जब हाथ तेरा 
अजब क्या है जो मैं मग़रूर हो जाऊँ 

बहाना कोई तो ऐ ज़िंदगी दे 
कि जीने के लिए मजबूर हो जाऊँ 

सराबों से मुझे सैराब कर दे 
नशे में तिश्नगी के चूर हो जाऊँ 

मिरे अंदर से गर दुनिया निकल जाए 
मैं अपने-आप में भरपूर हो जाऊँ 

Rajesh Reddy

Wednesday, March 2, 2022

मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं

मुस्तक़िल महरूमियों पर भी तो दिल माना नहीं 
लाख समझाया कि इस महफ़िल में अब जाना नहीं 

ख़ुद-फ़रेबी ही सही क्या कीजिए दिल का इलाज 
तू नज़र फेरे तो हम समझें कि पहचाना नहीं 

एक दुनिया मुंतज़िर है और तेरी बज़्म में 
इस तरह बैठे हैं हम जैसे कहीं जाना नहीं 

जी में जो आती है कर गुज़रो कहीं ऐसा न हो 
कल पशेमाँ हों कि क्यूँ दिल का कहा माना नहीं 

ज़िंदगी पर इस से बढ़ कर तंज़ क्या होगा 'फ़राज़' 
उस का ये कहना कि तू शायर है दीवाना नहीं 

Ahmad  Faraz

Tuesday, March 1, 2022

इक कहानी सी दिल पर लिखी रह गई

इक कहानी सी दिल पर लिखी रह गई
वह नज़र जो मुझे देखती रह गई

रंग सारे ही कोई चुरा ले गया
मेरी तस्वीर अधूरी पड़ी रह गई

लोग बाज़ार में आ के बिक भी गये
मेरी कीमत लगी की लगी रह गई

वह तो कमरे से उठकर चला भी गया
बात करती हुई ख़ामुशी रह गई

दो उजाले अंधेरों में खो भी गये
हाथ मलती हुई चांदनी रह गई

बस वही अब हवा की निगाहों में हैं
जिन चराग़ों में कुछ रौशनी रह गई

वह भी चाहे, तो पूरी न हो ऐ 'वसीम'
ज़िन्दगी में कुछ ऐसी कमी रह गई।