Wednesday, May 5, 2021

ये जो ज़िन्दगी की किताब है


ये जो ज़िन्दगी की किताब है ये किताब भी क्या किताब है
कहीं इक हसीन सा ख़्वाब है कहीं जान-लेवा अज़ाब है

कहीं छांव है कहीं धूप है कहीं और ही कोई रूप है,
कई चेहरे इस में छुपे हुए इक अजीब सी ये नक़ाब है
 
कहीं खो दिया कहीं पा लिया कहीं रो लिया कहीं गा लिया,
कहीं छीन लेती है हर ख़ुशी कहीं मेहरबान बेहिसाब है
 
कहीं आंसुओं की है दास्तां कहीं मुस्कुराहटों का बयां,
कहीं बर्क़तों की है बारिशें कहीं तिश्नगी बेहिसाब है

Monday, May 3, 2021

उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े

उल्फ़त का जब किसी ने लिया नाम रो पड़े
अपनी वफ़ा का सोच के अंजाम रो पड़े

हर शाम ये सवाल मोहब्बत से क्या मिला
हर शाम ये जवाब कि हर शाम रो पड़े

राह-ए-वफ़ा में हम को ख़ुशी की तलाश थी
दो गाम ही चले थे कि हर गाम रो पड़े

रोना नसीब में है तो औरों से क्या गिला
अपने ही सर लिया कोई इल्ज़ाम रो पड़े

सुदर्शन फ़ाकिर

मेरे सजदे में थे आप

पशेमान ये नजरें, खुदा से मिलाएँ कैसे. 
मेरे सजदे में थे आप, खुदा को बताए कैसे। 

Sunday, May 2, 2021

बारिशों में जल गये होते


जिंदगी ने संभलने से रोका हमें,

शराबों में क्या नशा कि बहक जाते।

सिरफिरे न होते तो शायर क्या होते,
खामियां न होती तो कुछ भी न होते।

आज ही तो उठकर चलने लगे हम,
न मिलतेे तुम तोे उम्रभर सोये रहते।

तेरी सांसों ने बुझा दी सीने की आग,
वरना हम तो बारिशों में जल गये होते।

न होता कोई हमदर्द दुनिया में मंज़र,
गर आसमां से तारे न आंगन में गिरते।

जो मिला वो कम था क्या

दिले ख्वाहिश दिल में ही दफ्न रह गई।

मिले कोई जो होकर मेरा समझता मुझे।।
जिस तरह हो के तेरा टूटकर चाहा तुझे।
जो मिलता कोई अपना जो चाहता मुझे।।
कुछ लम्हों में जी लेती मेरी तमाम जिंदगी।
गर होती रूबरू तेरे इश्क से मेरी जिंदगी।।
जो मुकम्मल होती मेरी राहें मुहब्बत की।
तो कैसे लिखती मेरी कलम बात एहसासों की।।
सोचा चलो चलते हैं , इश्क़ की मंजिल न मिली तो गम क्या।
खूबसूरत बनाएं अपने सफर को, जो मिला वो कम था क्या।।

मुझसे बात न करो

मुझसे न बात करो कोई, मन लग जाएगा..

फिर एक दिन तुम सबका भी, मन भर जाएगा..
हम फिर भी कुछ न कहेंगे किसी से
आंसू फिर पियेंगे, दर्द सहेंगे सही से..
फ़ितरत ही रही ऎसी, हमेशा हमारी
हर शख्स अपना हो, मंज़िल थी बना ली..

कभी अनकही रह जाती है।

बातें....


कभी सुनी जाती है,
या कभी अनकही रह जाती है।
फिर भी
बातें बाकी रह जाती है...
क्या किसी को पता है..
कि ये बातें कब पूरी होती है?
ये बातें इतनी चतुर होती हैं
कि मन के भेद खोल देती है।
ये जुबां से हरदम
निकलना चाहती है.....
मगर ये होंठ रोक देते है....
कभी-कभी तो ये
हृदय के राज़ को
मन के झूले से होते हुए
आंखों की झांकी से
सब प्रकट कर देती है...
इसे लज्जा भी नहीं आती....
ये बेहिसाब उड़ना चाहती हैं,
सबसे आगे जाना चाहती है....
इसे बंदिशों में रहना नहीं आता....
ये सारी बेड़ियाँ तोड़कर,
झिझक की दहलीज़ छोड़कर,
स्वतंत्रता के आंगन में
अपना घर बसाना चाहती है.....
ऐसी होती हैं...
ये 'बातें'
बेधड़क और बेझिझक...
क्योंकि जज़्बात सही या गलत नहीं होते...
जज़्बात तो बस जज़्बात होते हैं।

कुछ दिन तुम्हारे दिल में ठहर जाने दो.

प्रवासी हूँ

कुछ दिन
तुम्हारे दिल के
खूबसूरत शहर में
ठहर जाने दो.

ग़र मंजूर हो
तो धीरे से मुस्कुरा देना
ग़र तकल्लुफ़ हो तो
चुपके से बता देना.

मैं देश तुम्हारे दिल का
छोड़ चला जाऊंगा
ये वादा है मेरा
कभी लौट कर
नहीं आऊंगा.

ग़र भा गया
तुम्हारे मन को
तो दिल में बसा लेना
अपना शहर छोड़ कर
तुम्हारे दिल में बस जाऊंगा.
प्रवासी... हूँ...

हे! मजदूरों तुम्हें नमन

जो धरती की माटी लेकर
 माथे तिलक लगाते हैं

जो खेतों से राजपथों तक
 श्रम के गीत सुनाते हैं ।

जिनके भीतर जलती रहती 
सूरज जैसी कोई अगन

 हे! मजदूरों तुम्हें नमन
 हे! श्रमवीरों तुम्हें नमन।

 जिनका स्वेद, गिरे धरा पर
 वो चंदन बन जाता है।

 चट्टानों को काट काट 
जो गीत विजय के गाता है 

संघर्षों में तपकर भी
 अंदर जिंदा रखे लगन

 हे! मजदूरों तुम्हें नमन 
हे! श्रमवीरों तुम्हें नमन।
जो माटी को सींच रहे हैं 
अपने खून पसीने से ।

खूब संवरती है ये धरती
 श्रम के इसी नगीने से।

 जिनके भीतर ही पलती है 
पर्वत जैसी ठोस लगन ।

हे! मजदूरों तुम्हें नमन 
हे! श्रमवीरों तुम्हें नमन।
जिनका जीवन भी अर्पित
 राष्ट्र के निर्माणों में 

आंखों में विश्वास बसा है
मेहनत जिनके प्राणों में।

 ये माटी के, सच्चे सैनिक 
जो रखते खुशहाल वतन।

 हे ! मजदूरों ,तुम्हें नमन
 हे,श्रमवीरों तुम्हें नमन।

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया

अच्छा तुम्हारे शहर का दस्तूर हो गया 
जिस को गले लगा लिया वो दूर हो गया 

काग़ज़ में दब के मर गए कीड़े किताब के 
दीवाना बे-पढ़े-लिखे मशहूर हो गया 

महलों में हम ने कितने सितारे सजा दिए 
लेकिन ज़मीं से चाँद बहुत दूर हो गया 

तन्हाइयों ने तोड़ दी हम दोनों की अना! 
आईना बात करने पे मजबूर हो गया 

दादी से कहना उस की कहानी सुनाइए 
जो बादशाह इश्क़ में मज़दूर हो गया 

सुब्ह-ए-विसाल पूछ रही है अजब सवाल 
वो पास आ गया कि बहुत दूर हो गया 

कुछ फल ज़रूर आएँगे रोटी के पेड़ में 
जिस दिन मिरा मुतालबा मंज़ूर हो गया

बशीर बद्र